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पाक समर्थित आतंकवाद को रोकने के लिए ISI के जाल को तोड़ना होगा

कश्मीर की खुफिया रिपोर्ट बताती है कि घाटी में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं और सूबा उथल-पुथल भरे नब्बे के दशक की ओर लौट रहा है

Updated On: Jun 19, 2018 12:33 PM IST

Yatish Yadav

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पाक समर्थित आतंकवाद को रोकने के लिए ISI के जाल को तोड़ना होगा

अब, जब कश्मीर में एकतरफा सीज़फायर खत्म हो चुका है, दिल्ली में कुछ दिन पहले बड़े अफसरों के साथ प्रधानमंत्री और गृहमंत्रियों की एक बैठक बड़ी प्रासंगिक हो चली है. ये बैठक दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक में कश्मीर के हालात पर चर्चा के लिए हुई थी और बैठक में कश्मीर के हालात पर कई सुझाव और बातें सामने आईं थीं.

बैठक में एक बड़े अफसर ने बताया कि 1990 के बाद पैदा हुए कश्मीरी युवा के दिलो-दिमाग पर अलगाववादी नेताओं की सोच ज़्यादा हावी हुई है. वजह बहुत साफ है. उसने जन्म लेने के बाद कश्मीर में सिर्फ खून-खराबा ही देखा है. इस अफसर ने सिर्फ समस्या ही नहीं बताई, इसे सुलझाने का तरीका भी बताया, 'घाटी में सोशल इंजीनियरिंग के ज़रिए लोगों को एक दूसरे के करीब लाने की ज़रूरत है. साथ ही कोशिश हो कि युवाओं की सोच सकारात्मक बने.'

अर्द्धसैनिक बलों के एक मुखिया ने दूसरा सुझाव दिया- 'सरकार का इकबाल जनता में बढ़ाना चाहिए और फौज की भूमिका कम से कम की जानी चाहिए.' दरअसल उनका कहना ये था कि जैसे-जैसे सरकार की भागीदारी जनता के बीच दिखेगी, उसका इकबाल बढ़ेगा और जनता का भरोसा व्यवस्था में बढ़ा तो उन गांवों और कस्बों में फौज कम की जा सकती है, जहां पाकिस्तान समर्थित आतंक का असर है.

क्या जल्दबाजी में लागू किया गया था फैसला?

अब सवाल ये कि ये कैसे मुमकिन है. रमज़ान के दौरान सीज़फायर का एकतरफा ऐलान कर एक कोशिश तो सरकार ने की ही थी. लेकिन हिंसा फिर भी रुकी नहीं. ईद के ठीक पहले एक मशहूर पत्रकार शुजात बुखारी और एक फौजी औरंगज़ेब की हत्या कर दी गई और शांति की प्रक्रिया पर बड़ा हमला किया गया. लोग अब सरकार के सीज़फायर के एकतरफा ऐलान के फैसले की चीर-फाड़ में लगे हैं कि क्या ये जल्दबाज़ी में लिया गया एक फैसला था, या अच्छा फैसला तो था लेकिन बिना तैयारी के लागू कर दिया गया. सरकार ने भी रविवार को ऐलान कर दिया कि कश्मीर में सीज़फायर फिलहाल खत्म और सेना का ऑपरेशन पहले की तरह जारी रहेगा. आने वाले दिनों में इस पर खूब बहस-मुबाहिसे होंगे. लेकिन ध्यान देने की बात है कि कश्मीर की खुफिया रिपोर्ट बताती है कि घाटी में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं और सूबा उथल-पुथल भरे नब्बे के दशक की ओर लौट रहा है.

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अलगाववादियों के डर से सड़कों पर उतरते हैं युवा

ख़ैर, नॉर्थ ब्लॉक में चल रही कश्मीर में सुरक्षा को लेकर हो रही उस खास बैठक में प्रधानमंत्री भी थे. अफसरों की बात बड़े ध्यान से सुन रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सवाल पूछा कि अगर युवा इतने आक्रोश में हैं तो दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं में सौ फीसदी भागीदारी कैसे मुमकिन हुई? अगर वे बच्चे पढ़ाई कर रहे थे तो सड़कों पर पत्थरबाज़ी के लिए कैसे निकले? प्रधानमंत्री के इस सवाल का जवाब एक अफसर ने दिया कि 'दरअसल सड़कों पर प्रदर्शन के लिए जो भी युवा निकलते हैं, वो इसलिए नहीं कि वो वाकई विरोध करना चाहते हैं. वे दरअसल अलगाववादियों के डर की वजह से सड़कों पर आते हैं. उन्हें अलगाववादी नेताओं का डर है.'

इस बड़े अधिकारी ने स्थिति को और तफसील से बताया और कहा कि सच ये है कि कश्मीर के लोग, वहां के युवा तो अमन-चैन चाहते हैं, लेकिन इन इलाकों में काम कर रहे कुछ पाकिस्तानी एजेंट अमन की कोशिशों को हमेशा पटरी से उतारना चाहते हैं. उनका एजेंडा ही यही है. घाटी के युवाओं में अलगाववादी नेताओं के प्रोपेगैंडा के तहत मायूसी भरी जा रही है और वे उग्रवाद की ओर खिंच रहे हैं, इसलिए युवाओं को लेकर कुछ ऐसा सकारात्मक काम किया जाए , ऐसी योजनाएं लाई जाएं, जिससे उनके दिलो-दिमाग पर उग्रवाद घर कर ही न सके.

एकतरफा सीज़फायर कर अमन स्थापित करने के लिए मोदी सरकार ने बहुत बडा दांव लगाया था. लेकिन ये भी सच है कि सरकार की ओर से शांति का कोई भी प्रयास किया जाए, उसका जवाब पाक समर्थित आतंकी गुट हिंसा से ही देंगे. ये सारे गुट पाक सेना और आईएसआई की साज़िशों के चलते इसी तैयारी में रहते हैं कि जैसे ही शांति की कोशिश शुरू हो, कोई बड़ा खूनी हमला कर दिया जाए. लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन और घाटी में बैठे उनके मौन समर्थक अलगाववादी नेता, ये तय करने के लिए तैयार हैं कि दिल्ली से चली शांति की किसी भी बयार को कश्मीर पहुंचने ही न दें, भले ही इसके लिए उन्हें कश्मीर के आम लोगों और युवाओं की बलि लेते रहना पड़े.

एक और बड़े सुरक्षा अधिकारी का मानना था कि भारतीय फौजों को बड़े ऑपरेशन्स लॉन्च करने चाहिए जिसके तहत आतंकी कमांडरों को पकड़ा जाए, उनको पैसा मुहैया करा रहे लोगों को धरा जाए और आईएसआई के एजेंट भी दबोचे जाएं जो घाटी में काम कर रहे हैं. 'हमें पाक एजेंटों और जो लोग युवाओं को भड़का रहे हैं, उनके दिलों में ऐसा खौफ पैदा कर देना चाहिए, कि वो ये सब करने से डरें. इसलिए पाक आतंकी फैक्ट्रियों को जड़ से उखाड़ने के लिए फौज को लंबे समय तक चलने वाली, योजनाबद्ध नीति से चलना पड़ेगा.'

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दक्षिणी कश्मीर में सेना की ताकत बढ़ानी होगी

जम्मू-कश्मीर में ही काम कर रहे एक और वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी का कहना था कि 'पाकिस्तान पिछले तीस बरस से भारत में आतंक फैलाने का काम कर रहा है. और उसे ध्वस्त करने के लिए भारत को नई सोच के तहत योजनाएं बनानी होंगी. फौजियों पर हाल ही में हुए हमले चिंताजनक हैं और इन पर अगर जल्दी ही काबू न पाया गया, तो आगामी अमरनाथ यात्रा पर भी इसका असर पड़ सकता है, आतंकी पूरी कोशिश करेंगे कि आतंक के साए में यात्रा न हो पाए.'

'अब जबकि हम घाटी में ऑपरेशन फिर शुरू करने जा रहे हैं, हमें दक्षिण कश्मीर के उस हिस्से में फौज की ताकत और बढ़ानी होगी, जहां आतंकी पनाह पाते हैं. इससे हालात सामान्य रखने में मदद मिलेगी क्योंकि जो सूचनाएं हमें मिली हैं, उनके मुताबिक पिछले एक महीने में सीमा पार से घुसपैठ भी बढ़ाए जाने की पुरज़ोर कोशिश की जा रही है. और इस एक महीने में फौज के ऊपर हमले भी बढ़े हैं. ज़रूरत इस बात की भी है कि कश्मीर में बैठकर प्रोपेगैंडा फैलाने वालों से भी हम सख्ती से निबटें, जो यहां बैठकर वहां के मंसूबों को अंजाम दे रहे हैं. हालांकि उनसे निबटना, आतंकियों से निबटने के मुकाबला ज़्यादा कठिन है, लेकिन हमें उनसे सख्ती से पेश आना ही होगा.'

क्या बीजेपी-पीडीपी अलगाववादियों के झूठे प्रचार से मुकाबले को तैयार हैं?

तो हमारा सवाल अब ये है कि कश्मीर में शांति के लिए क्या मोदी सरकार ऑपरेशन्स के साथ-साथ कुछ नई कोशिशें करेगी? हालांकि अपने हाल ही के कश्मीर दौरे पर गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने साफ कर दिया कि कश्मीर के युवाओं का भविष्य सुरक्षित करने के लिए वे कुछ ‘बोल्ड’ फैसले कर सकते हैं. लेकिन एक मुनासिब सा सवाल अब भी हवा में कायम है. क्या कश्मीर में पीडीपी और बीजेपी की मिलीजुली सरकार इस दिशा में काम करने के लिए, अलगाववादियों के झूठे प्रचार से मुकाबला करने को तैयार है?

इस सवाल का जवाब नॉर्थ ब्लॉक में हुई इस बैठक में एक बड़े सुरक्षा अधिकारी ने बड़े साफ लहज़े में दिया, 'नहीं, शायद नहीं.' उन्होंने खराब गवर्नेंस और भ्रष्टाचार की कई मिसालें देते हुए बताया कि 'सूबे के लोगों की ज़रूरत सबसे ज़्यादा ये है कि उनकी रोज़ाना की समस्याओं में मदद की जाए. जम्मू-कश्मीर के एक दूसरे अधिकारी ने कहा कि शांति को बिगाड़ने वालों के खिलाफ सूबे की पुलिस को ईमानदारी और सख्ती से काम करना चाहिए. लेकिन बेहतर हो इसे पूरी तैयारी के साथ अंजाम दिया जाए, क्योंकि अलगाववादियों की ओर से शांति की कोशिशों का विरोध भी तुरंत शुरू हो जाएगा. ज़्यादातर लोग अमन चाहते हैं और सरकार अपने वायदों पर कायम रहे तो कश्मीरी युवाओं के साथ नए रिश्ते के लिए अमन की एक नई खिड़की खुल सकती है. फौज में स्थानीय लोगों की भर्ती से भी पत्थरबाज़ी की घटनाओं में कमी आ सकती है.'

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बैठक में एक सुझाव ये भी आया कि विदेशी और स्थानीय आतंकियों से निबटने में तरीके भी अलग अपनाए जाने चाहिए. भारतीय सेना इस योजना के तहत घाटी के उन परिवारों को समझा रही है कि वे अपने बच्चों को पाकिस्तानी साजिशकर्ताओं के हाथों न जाने दें. अगर उन्होंने हथियार उठा भी लिए हैं, तो सरेंडर कर मुख्यधारा में शामिल हो जाएं. नॉर्थ ईस्ट के एक अधिकारी का कहना था कि 'कश्मीर के युवाओं को देश के बाकी हिस्सों में पढ़ने और नौकरियों के और मौके देने चाहिए, इससे वे देश के दूसरे हिस्सों को जान पाएंगे और पूरे मुल्क से अपना जुड़ाव भी समझेंगे.'

इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा कि वे जानते हैं कि पाकिस्तान आतंक के लिए रंगरूटों की भर्ती युद्ध के लिए बलि लेने को ही कर रहा है. उन्होंने इस बारे में अपना खुद के अनुभव अफसरों से साझा किए. उन्होंने बताया कि नब्बे के दशक में जब वे कश्मीर जाते थे तो कई दफा उनकी मुलाकात जेल में कैद उन पूर्व आतंकियों से हुई, जो आत्मसमर्पण कर चुके थे. प्रधानमंत्री ने कहा कि उनसे बातचीत से ये बात समझ में आई कि सबसे पहले तो आईएसआई के एजेंटों की पहचान कर उन्हें पकड़ना चाहिए. प्रधानमंत्री ने कहा कि सूबे में ऊपर से लेकर नीचे के स्तर तक सरकारी तंत्र को गृहमंत्री का वह सुझाव लागू करना चाहिए, जिसमें उन्होंने हिंसारहित कश्मीर की बात कही थी और घाटी की तस्वीर और तकदीर दोनों बदलने की बात भी.

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