S M L

बाहर पुलिस उसकी तलाश में खाक छानती रही, और ‘अतीक’ भेष बदलकर जेल में जा दुबका!

अतीक इलाहाबाद की स्थानीय अदालत में सरेंडर करके जेल चला गया. लिहाजा उसकी तलाश में कई दिन से बाहर खाक छान रही पुलिस मन मसोस कर और हाथ मलती ही रह गई

Updated On: Jan 05, 2019 09:12 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

0
बाहर पुलिस उसकी तलाश में खाक छानती रही, और ‘अतीक’ भेष बदलकर जेल में जा दुबका!

देश के सबसे बड़े सूबे यानी उत्तर-प्रदेश की कथित सुरक्षित ‘जेल की सल्तनत’ पर माफिया-डॉन और सफेदपोश जनाब अतीक भाई ‘साहब’कहूं या फिर ‘सर’!....एक बार फिर भारी पड़ गए. भीड़ भरे बाजार में नहीं. देवरिया जिले की उस चाक-चौबंद जेल की चार-दीवारी के भीतर जहां कहते हैं कि, परिंदा पर नहीं मार सकता. सात तालों के भीतर कैद ‘उस्ताद-जी’ (अतीक अहमद)! ने इस बार हिसाब-किताब बराबर करने के लिए एक बिल्डर को जेल के भीतर ही अपहरण करके ‘उठवा’ लिया.

आरोप है कि, अतीक और उसके गुर्गों ने जेल में ही पीड़ित की तबीयत से ‘कुटाई-धुनाई’ करके आगे-पीछे का सब बकाया हिसाब-किताब बराबर करके, यूपी की किसी जेल के भीतर ‘खुली-गुंडई’ का काला-इतिहास लिख और पोत डाला. जाहिर सी बात है कि, बे-वक्त जेल में मंचित हुई ‘रामलीला’ का मंचन. सरकारी तनखैया जेल-स्टाफ के ‘सहयोग’ से ही संभव हुआ होगा! ‘पड़ताल’ का बिंदु है कि, यह सब ‘नौटंकी’ जेल स्टाफ ने ‘भाई’ (माफिया अतीक अहमद) के भय के सामने नतमस्तक होकर करवाई! या फिर खुद के चंद स्वार्थों के हाथों में बंध और बिक कर!

जांच जारी है, रिजल्ट ‘जीरो’ आने की उम्मीद रखिए!

सुना है कुंभकर्णी-नींद से जागे सूबे के कुछ कथित जिम्मेदार! सरकारी ‘कारिंदों’ ने अपने गले से फंदा ढीला करने के सपने पाले-पाले ‘जांच’ बैठा दी है! ‘अतीक सर’! को ब-हिफाजत और ब-इज्जत देवरिया से बरेली-जेल में सुरक्षित ‘शिफ्ट’ करवाने के बाद. ‘अपनों’ के खिलाफ जांच, अपने ही करेंगे! सोचिए ऐसे में भला अपनों द्वारा अपनों के खिलाफ ‘पड़ताल’ का ‘अंजाम’ क्या होगा? भला अपना भी कहीं अपने को ‘मारता या नीचा’ दिखाता है? कुल जमा अब इसमें तो कोई संदेह नहीं रहा है कि, देवरिया जेल कांड का ‘स्क्रिप्ट-राइटर’, ‘भाई’ यानी अतीक अहमद ही है! आईए अब आगे पढ़ते हैं इस खास ‘पड़ताल’ में उत्तर-प्रदेश की जेलों में स्टाफ और माफिया के बीच अक्सर सामने आने वाली ‘दोस्ती-दुश्मनी’ काला और सफेद सच.

अतीक अहमद ऐसे बना ‘भाई’!

बात है सन् 1986 के आसपास की. एक दिन इलाहाबाद के ‘चकिया’ मोहल्ले में सांप्रदायिक दंगे शुरू हो गए. कई दिन तक बबाल मचा रहा. उन दंगों के पीछे जो दो नाम उभर कर पुलिस और पीएसी की आंखों में आए वो थे, अतीक मोहम्मद और सफदर रजा. यूपी पुलिस के रिकॉर्ड में अब तक इन दोनों के ऊपर 10-12 छोटे-मोटे मामले ही दर्ज थे. हालांकि दोनों इलाके के ठीक-ठाक ‘गुंडों’ में शुमार होने लगे थे. तब किसी ने नहीं सोचा था कि उन दिनों का चकिया का वही ‘गुंडा’ आने वाले वक्त में पुलिस और पॉलिटिक्स की ‘बदनाम-फिगर’ ‘अतीक-भाई’ के नाम से कुख्यात होगा. कालांतर में सफदर रजा दुनिया से कूच कर गया. पीछे बचा इकलौता ‘भाई’ यानी अतीक. सफदर की मौत के बाद अपराध की गलियों में (इलाहाबाद) अतीक के कदमों की स्पीड बेतहाशा बढ़ गई. मारपीट से लेकर और तमाम आपराधिक वारदातों में अतीक का जब, वर्चस्व दिखाई देने लगा तो वो इलाके में ‘भाई’ के नाम से कुख्यात हो गया.

ये भी पढ़ें: लाठी टूट गई मगर सांप नहीं मरा, 'तीसरी आंख' ने बेगुनाह पत्नी के कातिल को पहुंचा दिया सलाखों के 

पुलिस बाहर खाक छान रही वो ‘जेल’ में मिला

चकिया मोहल्ले में भड़के सांप्रदायिक दंगों के मामले में आरोपी गली के गुंडे अतीक और सफदर रजा की तलाश में इलाहाबाद पुलिस खाक छान रही थी. अगर कहूं कि, अतीक और रजा आगे-आगे, इलाहाबाद पुलिस उनके पीछे-पीछे थी, तो शायद गलत नहीं. इसी बीच अतीक पुलिस को गच्चा दे गया. उसने फैक्टरी के सुरक्षा-अफसर (एक मशहूर बैटरी बनाने वाली कंपनी के गार्ड की ड्रेस) की ड्रेस पहनकर अपना भेष बदल लिया. बुलेट मोटर साइकिल पर बैठकर वो कोर्ट में पहुंचा. थाना करछना के एक पुराने आपराधिक मामले में जमानत तुड़वाकर. अतीक इलाहाबाद की स्थानीय अदालत में सरेंडर करके जेल चला गया. लिहाजा उसकी तलाश में कई दिन से बाहर खाक छान रही पुलिस मन मसोस कर और हाथ मलती ही रह गई.

atique ahmed

अतीक अहमद

पुलिस के ‘वांछित’ को ‘नेता-भाई’ बना डाला!

मात खाई और अतीक के इस कदम से बौखलाई इलाहाबाद पुलिस ने गली के गुंडे को सबक सिखाने की जिद ठान ली. जिसका नतीजा यह हुआ कि, जिद्दी पुलिस ने मौका मिलते ही अतीक पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NATIONAL SECURITY ACT) लगाकर उसे खाकी की ताकत का एहसास करा दिया. एक साल तक वो लगातार जेल की सलाखों में कैद भी रहा. पुलिस के इस कदम ने मगर, जेल की सलाखों में कैद अतीक अहमद को अपराध की दुनिया में और भी ज्यादा ‘कुख्यात’ बना डाला. जेल में बंद अतीक ने बाहर मौजूद चहेतों में अफवाह फैलवा दी कि, उसे पुलिस ने बर्बाद कर दिया है. ऐसे में अब उसे अपने शुभचिंतकों का ‘नेता’ बनना ही पड़ेगा. बस अतीक की जिंदगी का यही वो टर्निंग-प्वाइंट था, जिसने पुलिस की नजर में गुंडा अतीक अहमद को, नौसिखिया ‘नेता’ बना डाला.

जेल में मैंने अपने सामने उसे गिड़गिड़ाते देखा!

‘बात है सन् 1985-86 के आसपास की. तब मैं यूपी जेल सर्विस के तहत अपर-जेल अधीक्षक के रूप में इलाहाबाद की नैनी जेल में तैनात था. उन्हीं दिनों अतीक अहमद अपने साथी गुंडा सफदर रजा, चांद बाबा आदि के साथ गिरफ्तार होकर नैनी जेल में पहुंचा था. ज्यादा तो क्या कहूं आज जिसे लोग माफिया-गुंडा या इलाहाबाद के जो कुछ, गिने-चुने लोग अतीक को लेकर ‘भाई-भाई’ का राग अलाप रहे हैं, उस अतीक को मैंने जेल में गिड़गिड़ाते और बकरी के मेमने की मानिंद मिमियाते हुए देखा-सुना है अपनी आंखों से. बाद में मैं उत्तर प्रदेश राज्य पुलिस सेवा में सिलेक्ट होकर जेल की नौकरी छोड़कर चला गया. बताते हैं पूर्व आईपीएस (1998 बैच) और रिटायर्ड पुलिस महानिरीक्षक (इंटेलीजेंस) राम कृष्ण चतुर्वेदी (आर.के. चतुर्वेदी).

जेल में नहीं इन्हें ‘काला-पानी’ भेजना चाहिए

देश के दबंग पूर्व आईपीएस और सीमा सुरक्षा बल के रिटायर्ड महानिदेशक प्रकाश सिंह देवरिया जेल के तमाशे से खासे खफा हैं. उनके मुताबिक यूपी ही क्या कुछ को छोड़कर बाकी तमाम सूबों में जेलों की व्यवस्था (इंतजाम) जर्जर है. जब जिसका वश चलता है वो, जेल पर जोर आजमा कर निकल जाता है. जहां तक बात देवरिया जेल में माफिया अतीक अहमद द्वारा किए गए तांडव की बात है तो, ऐसों के लिए जेल में तो कोई बंदिश या परेशानी होती ही नहीं है. ‘अतीकों’ को जेल के बजाए ‘काला-पानी’ जैसी जगहों पर भेजा जाए. तब इनके दिमाग दुरुस्त होने की उम्मीद है. जहां इनका खुराफाती दिमाग सोचने-समझने की ताकत को खो बैठे.

पुलिस के लिए यह सब घातक है..पूर्व आईपीएस और सीमा सुरक्षा बल के पूर्व डायरेक्टर जनरल प्रकाश सिंह

पुलिस के लिए यह सब घातक है..पूर्व आईपीएस और सीमा सुरक्षा बल के पूर्व डायरेक्टर जनरल प्रकाश सिंह

खतरनाक कौन अतीक या आफ़ताब और बबलू?

अपहरण जैसे जघन्य अपराध की दुनिया में आफ़ताब अंसारी और बबलू श्रीवास्तव से बड़ा ‘मास्टरमाइंड’ दूसरा अभी तक नहीं देखा-सुना गया है. इसी जमात में कभी शामिल रहा एक वीरेंद्र पंत था. उसे दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल (एसीपी राजवीर सिंह) ने दक्षिणी दिल्ली में ढेर कर दिया. ऐसे में अतीक अहमद इन दोनों (बबलू-आफ़ताब) के सामने कहीं नहीं टिकता. बबलू-आफताब कई साल से सजायाफ्ता कैदी के रूप में बंद हैं. नवंबर सन् 2000 में आफ़ताब अंसारी ने दुबई में बैठे-बैठे ही भास्कर पारेख जैसे सनसनीखेज अपहरण कांड को अंजाम दे डाला था.

ये भी पढ़ें: नौसिखिया ‘शार्प-शूटर' ने बनवा डाली थी भारत की पहली 'स्पेशल टास्क फोर्स'!

बबलू श्रीवास्तव ने 1990 के दशक (मार्च 1993-94) में दुबई में बैठे-बैठे ही दक्षिणी दिल्ली के व्यवसायी एस.एल. पाहवा का पांच करोड़ की फिरौती के लिए अपहरण करा लिया. जहां तक मुझे याद आ रहा है दुबई में बैठकर ही आफ़ताब अंसारी ने जुलाई 2001 में, हिंदुस्तान में मौजूद ख़ादिम शूज़ के मालिक (मैनेजिंग डायरेक्टर) पार्था प्रतिम रॉय बर्मन का अपहरण करवा लिया था. जबकि उस जमाने में दुबई में बैठे आफताब ने, कोलकता (भारत) में मौजूद बर्मन फैमिली से करोड़ों की ‘डील’ कर डाली थी. उस पूरी डील को बाकायदा अपने कानों से बजरिए टेलीफोन सुनने वाले पुलिस अफसर राजीव कुमार आज भी मौजूद हैं.

जब घिघ्घी बंध गई थी अपहरणों के ‘उस्ताद’की!

जहां तक मुझे याद आ रहा है कि, तेज-तर्रार राजीव उस वक्त पश्चिम बंगाल पुलिस के क्राइम इंवेस्टीगेशन डिपार्टमेंट (सीआईडी) कोलकता में पोस्टिड थे. 22 जनवरी 2002 को कोलकता में अल-सुबह अमेरिकी सेंटर पर हुए घातक आतंकवादी हमले में चार पुलिसकर्मी गोलियों से भून डाले गए. हमले के तुरंत बाद ही राजीव कुमार के घर लैंड-लाइन फोन पर एक ‘कॉल’ आई. टेलीफोन करने वाले ने राजीव से कहा कि, ‘मैं फ़रहान मलिक बोल रहा हूं. अमेरिकी सेंटर पर हमला हम लोगों ने ही किया है.’ गजब का पुलिसिया-याददाश्त वाले दिमाग के स्वामी और किसी भी इंसान की एक बार सुनी हुई आवाज के पहचानने में माहिर राजीव ने पलटकर जो जबाब दिया,‘क्यों आफ़ताब अंसारी आज तुम्हें आवाज बदलकर खुद का असली नाम छिपाकर फ़रहान मलिक बताने की जरूरत क्यों आन पड़ी?’ उसे सुनकर दूसरी ओर फोन लाइन पर मौजूद आफ़ताब अंसारी की घिघ्घी बंध गई थी.

आफताब-बबूल के सामने नहीं टिकता अतीक!

हाल ही में लखनऊ के बिल्डर को अपहरण करा, देवरिया जेल में बुलाकर हिसाब बराबर करने वाले अतीक अहमद के दुस्साहसिक कारनामे में यहां आफताब-बबलू का जिक्र करना, मैंने इसलिए जरूरी समझा कि, तमाम सनसनीखेज अपहरण कांडों को अंजाम देने वाले इन दोनों अपराधियों के सामने अतीक कहीं नहीं टिकता! हां, यहां इसे भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता है कि, शायद कभी जेल में बैठकर ही देवरिया जेल जैसे कांड को अंजाम देने की जरूरत आफताब और बबलू भी नहीं कर पाए होंगे. दिल दहलाने वाली वारदात को अंजाम देकर देवरिया जेल के ढीले इंतजामों को सर-ए-आम नंगा करने का दुस्साहस अतीक ने ही दिखाया है.

शरीफों को जहन्नुम, गुंडों की ‘जन्नत’ है जेल

वाकई शरीफ इंसान के लिए जेल जहन्नुम होती होगी. तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि, अपराधियों के लिए जेल से ज्यादा दूसरी कोई और महफूज जगह नहीं होती है. इसलिए जब गुंडों को लगता है कि, बाहर पुलिस उन्हें निपटा देगी! तो वे फटाफट जोड़-तोड़ करके किसी पुराने आपराधिक मामले में अपनी जमानत खुद ही तुड़वाकर जेल में जा छिपते हैं. क्योंकि जेल में ही उन्हें खुद की जिंदगी महफूज दिखाई देती है. जहां पुलिस द्वारा पांव में न गोली ‘ठोंके’ जाने का डर. न ही किसी सुनसान स्थान पर पुलिसिया मुठभेड़ में ढेर होने का खौफ. यह अलग बात है कि, पुलिस के सामने फंसने पर जिंदगी की भीख मांगने वाले यही बदमाश जेल में पहुंचते ही ‘बेकाबू’ हो जाते हैं!

जेल में ‘अतीकों’ से दुश्मनी यानी नुकसान तय!

1980 के दशक में इलाहाबाद की नैनी जेल में बतौर अपर-जेल अधीक्षक तैनात रह चुके रिटायर्ड दबंग पूर्व जेल अफसर आर.के. चतुर्वेदी के मुताबिक, ‘नैनी जेल में तैनाती के दौरान मेरी आंखों में हर वक्त खौफ उतरा रहता था. जब मैंने जेल की नौकरी जॉइन की तो, पहले दिन से ही वहां बंद करके रखे गए अपराधी मुझे खूंखार समझने लगे. दो-तीन महीने की जेल की नौकरी में मेरी इमेज ऐसी हो गई कि मैं अगर दाएं चलता तो, मेरे सामने आया कैदी डर के मारे बाएं रास्ता काटकर निकल जाने में भलाई समझता.’ जेल की नौकरी के अनुभव बेबाकी से बांटने वाले राम कृष्ण चतुर्वेदी बताते हैं कि, ‘जान सबको प्यारी होती है. जेल की नौकरी करने वालों का, क्या परिवार बीबी-बच्चे नहीं हैं? नैनी जेल में पोस्टिंग के दौरान मैं बेधड़क होकर अक्सर स्कूटर से ही बाजार चला जाता था. यह बात जेल-अधीक्षक को पता चली तो, उन्होंने हिदायत दी. वे बोले जेल में दबंगई दिखाते हो. बाजार स्कूटर पर चले जाते हो. तुम्हारा जेल का कोई चहेता किसी दिन...’

यूपी के मौजूदा पुलिस महानिदेशक ओम प्रकाश सिंह के साथ 1990 के दशक में दबंग रिटायर्ड आईपीएस और कभी नैनी जेल इलाहाबाद के अपर जेल अधीक्षक रहे आर.के. चतुर्वेदी

यूपी के मौजूदा पुलिस महानिदेशक ओम प्रकाश सिंह के साथ 1990 के दशक में दबंग रिटायर्ड आईपीएस और कभी नैनी जेल इलाहाबाद के अपर जेल अधीक्षक रहे आर.के. चतुर्वेदी

जेल की जिंदगी में कुछ मर गए कुछ बच गए

जेल में हुए हर बवाल के बाद सरकार और समाज के निशाने पर होता है जेल स्टाफ. सब यही सोचते हैं कि जेल वालों की मिली-भगत के बिना जेल के अंदर परिंदा भी पर नहीं मार सकता. हर मामले में ऐसा नहीं है. अगर ऐसा होता तो फिर भला लखनऊ में जेल अधीक्षक आर.के. तिवारी को जान से हाथ क्यों धोना पड़ता? मेरठ में तो जेल के भीतर ही डिप्टी जेलर के मुंह में हथियार घुसाकर गोली मार दी गई. बीते सप्ताह ही इलाहाबाद में जेल-वार्डन की हत्या कर दी गई. बीते दो-तीन साल में कम से कम 8-10 जेल अफसर और कर्मचारी मारे जा चुके हैं.

ये भी पढ़ें: नैना साहनी तंदूर कांड : एक लाश की दो ‘पोस्टमॉर्टम-रिपोर्ट’ ने बदल डाली थी 'हत्याकांड' की दिशा

10-12 साल पहले वाराणसी में जेल के डिप्टी सुपरिटेंडेंट सूर्य मणि चौबे पर हमला किया गया. हमले में मौत के मुंह में जाने से तो बच गए, लेकिन शारीरिक रूप से अपंग हो गए. बाराबंकी जेल अधीक्षक को यूपी की स्पेशल टास्क फोर्स ने वक्त रहते बचा लिया. वरना उन्हें निपटाने का इंतजाम भी जेल में बंद चंदन सिंह ने बना लिया था. एसटीएफ ने बदमाशों की बातचीत सुन ली. जिससे जेल-अधीक्षक की जान वक्त रहते बचा ली गई. इन तमाम उदाहरणों के सामने पूर्व आईपीएस आर.के. चतुर्वेदी सवाल दागते हैं, ‘इन बदतर हालातों में सोचिए कि जेल की नौकरी कैसे की जाए?’

पुलिस अगर अपनी पर उतर आए तो...

आईपीएस सेवा से रिटायर होने से पहले आर.के. चतुर्वेदी इलाहाबाद रेंज के पुलिस महानिरीक्षक हुआ करते थे. उन दिनों भी इलाहाबाद में अतीक की गुंडई का दबदबा किसी से कमतर नहीं था. बकौल आर.के. चतुर्वेदी, ‘एक दिन बालसन चौराहे पर भारत सरकार का किराए की बिल्डिंग में होने वाला दफ्तर निजी इमारत में शिफ्ट हो रहा था. खाली की जा रही बिल्डिंग पर अतीक अहमद एंड कंपनी यानी उसके गुर्गों की नजर थी. वे उस बिल्डिंग को कब्जाने पर तुले थे. मैंने एसएसपी इलाहाबाद, इंस्पेक्टर और सीओ कर्नलगंज को साफ-साफ बता दिया था, अगर ऐसा हो गया तो फिर आगे-पीछे की सब सोच लीजिए. मेरे कहे का असर यह हुआ कि जैसे ही अतीक के गुंडे मौके पर पहुंचे वहां पहले से मौजूद पुलिस देखकर खिसक गए. पुलिस अगर अपनी पर उतर आए तो वही होगा जो कानून और पुलिस चाहेगी. हालांकि ऐसा हो नहीं रहा है.’

अतीक की ‘मनोकामना’ मैंने पूरी नहीं होने दी!

पुलिसिया और जेल की नौकरी में कई बार अतीक से सीधा मुचैटा लेने वाले आर.के. चतुर्वेदी के मुताबिक, ‘इलाहाबाद के दबंग विधायक राजू पाल हत्याकांड के चश्मदीद को गवाही से ठीक पहले अतीक और उसके गुर्गे जेल में डलवाना चाहते थे. इसके लिए उसके मददगार पुलिस वाले हो सकते थे. चूंकि मैं इलाहाबाद में तैनात था. इसलिए लाख नाक रगड़ने के बाद भी मैंने उसकी (अतीक) यह मनोकामना पूरी नहीं होने दी.’ मौजूदा पुलिसिंग से खफा चतुर्वेदी कहते है कि, ‘गुंड़े मजबूत नहीं होते हैं. उन्हें मजबूत बनाया जाता है. वरना यह बात कतई झूठ नहीं है कि, पुलिस के आगे भूत भी भागते हैं. बशर्ते पुलिस चाहे तब. वरना अपराधियों के चक्कर में पुलिस ही भूत बनी रहती है.’

(लेखक वरिष्ठ खोजी पत्रकार हैं)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi