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अभिव्यक्ति की आजादी के लिए जरूरी है पद्मावती की समय पर रिलीज़

पूरे मामले में केंद्रीय मंत्री सिर्फ लीपापोती करते नजर आ रहे हैं

Updated On: Nov 18, 2017 02:02 PM IST

Sreemoy Talukdar

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अभिव्यक्ति की आजादी के लिए जरूरी है पद्मावती की समय पर रिलीज़

संजय लीला भंसाली की पद्मावती को लेकर पैदा हुआ विवाद चिंताजनक हालात में पंहुच गया है. ‘भावनाओं को ठेस लगने’ का हवाला देते हुए दक्षिणपंथी समूह हिंसा, तोड़फोड़, चित्तौड़गढ़ किले में पर्यटकों को जाने से रोकने, बंद का ऐलान करने और फिल्म के एक्टरों और डायरेक्टरों को शारीरिक नुकसान पहुंचाने की खुलेआम धमकियां दे रहे हैं.

दूसरी ओर, मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां या तो इन हिंसक तत्वों की मददगार बनी हुई हैं या इस मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं. ऐसे में किसी को भी शायद लगेगा कि पद्मावती की रिलीज रोकने के लिए बेरोकटोक गुंडागर्दी करते और हर किसी को धमकाते ये दक्षिणपंथी तत्व चुनावी माहौल में कांग्रेस के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं.

हालांकि, नरेंद्र मोदी को किसी भी चीज के लिए चुटीले बयानों से छेड़ने का मौका न छोड़ने वाले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी इस पर खामोश बने हुए हैं. उनका यह मौन अचरज भरा है. प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखने वाले राहुल गांधी के ट्विटर फीड में करणी सेना के एक्टिविस्ट्स को तत्काल अरेस्ट करने की कोई मांग नहीं है. न ही इनमें पद्मावती को लेकर एक भी शब्द कहा गया है. वह कलाकारों की अभिव्यक्ति की आजादी सुनिश्चित करने में प्रधानमंत्री की नाकामी पर कोई टिप्पणी क्यों नहीं कर रहे हैं.

मरसेल के समय चुप नहीं थे राहुल गांधी

तमिल मूवी मरसेल के दौरान पैदा हुए विवाद पर कांग्रेस उपाध्यक्ष ने मोदी को विरोध के स्वरों को दबाने की कोशिश न करने की चेतावनी दी थी. उनके ट्वीट में कहा गया था, ‘मिस्टर मोदी, सिनेमा तमिल कल्चर और भाषा की एक गहरी अभिव्यक्ति है. मरसेल में दखल देकर तमिल अस्मिता को चोट पहुंचाने की कोशिश मत करिए.’

इस बार भी तो यही वजह है, फिर वह विपक्ष के नेता की भूमिका क्यों नहीं निभा रहे हैं. बेहद निराश करने वाले जवाब हमें भंसाली की मुश्किल में फंसी फिल्म पर पैदा हुए विवाद की तह तक लेकर जाते हैं.

किसी भी पार्टी के नेता विचारधारा से ऊपर उठे हुए होते हैं. उनका पहला संबंध सत्ता के साथ होता है. बीजेपी, कांग्रेस और अन्य मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों ने यह समझ लिया है कि भारतीय राजनीति एक मोड़ पर पहुंच गई हैं. दशकों तक धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की राजनीति करने के बाद अब राजनीति की दिशा बदल रही है. चुनावी हथकंडे राजनीतिक तौर पर बेमतलब के हो गए थे. ऐसे में खुद को दुरुस्त कर मध्यमार्ग पर आने की बजाय राजनीति दायीं ओर मुड़ गई है और मुध्यधारा की राजनीतिक पार्टियां अपने वैचारिक रुझान को छोड़कर दायीं और रुझान बढ़ाने को लेकर ज्यादा उत्सुक नजर आ रही हैं.

महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा और झारखंड समेत कई राज्यों में दक्षिणपंथी तत्व इस मामले में कूद पड़े हैं और भावनाओं को भड़का रहे हैं. कुछ जगहों पर हिंसा भी की जा रही है. इन गतिविधियों पर पार्टी नेताओं या प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं है.

ऐसा नहीं है कि ये धमकियां डर नहीं पैदा करतीं. राजपूत करणी सेना के महिपाल सिंह मकराना ने मूवी को रिलीज करने पर धमकी दी है कि अगर ऐसा किया गया तो दीपिका पादुकोण को विकलांग कर दिया जाएगा.

उन्होंने अपने बनाए वीडियो में कहा है, ‘राजपूत कभी किसी महिला पर हाथ नहीं उठाते, लेकिन अगर जरूरत पड़ी तो हम दीपिका के साथ वही करेंगे जो लक्ष्मण ने सूपर्णखा के साथ किया था.’

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अखिल भारतीय क्षत्रिय युवा महासभा के ठाकुर अभिषेक सोम ने पादुकोण और भंसाली के सिर काटने वाले को 5 करोड़ रुपये देने का ऐलान किया है. हालांकि, इस संगठन के बारे में कम ही लोगों ने सुना होगा. खुलेआम दी जा रही इन धमकियों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए था. इन पर कार्रवाई की जानी चाहिए थी और इन अनियंत्रित तत्वों को कानून की ताकत से परिचित कराना चाहिए था. हालांकि, ऐसा करने की बजाय केंद्रीय मंत्री और प्रमुख नेता केवल मामले की लीपापोती करते और यहां तक कि इस हिंसा को उचित ठहराने का काम कर रहे हैं.

सीएनएन-न्यूज18 से बात करते हुए नितिन गडकरी ने फिल्म निर्माताओं पर आरोप लगाया कि वे सांस्कृतिक संवेदनाओं का सम्मान नहीं कर रहे हैं और इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं. उन्होंने उपदेश दिया कि अभिव्यक्ति की आजादी असीमित नहीं है और उन्होंने संकेत दिया कि लोगों के पास विरोध करने का अधिकार है.

हमें ऐसे केंद्रीय मंत्री की जरूरत नहीं है जो हमें बताए कि अभिव्यक्ति की आजादी उचित पाबंदियों के अधीन है. उन्हें यह बताना चाहिए कि कैसे गुंडों को राज्यों और खासतौर पर बीजेपी शासन वाले राज्यों में खुलेआम उपद्रव करने की छूट मिली है. लेकिन, वह इस चीज का जवाब नहीं देते.

कांग्रेस ने इस विवाद के लिए बीजेपी को दोषी ठहराने की कोशिश की है. लेकिन उसने गुंडों को खुली छूट देने की बजाय फिल्म को बनने देने के लिए बीजेपी की आलोचना की है.

कांग्रेस के प्रवक्ता आरपीएन सिंह ने कहा है, ‘मैंने अभी तक फिल्म नहीं देखी है, लेकिन निश्चित तौर पर सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन का गठन भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकार ने किया है और इसे देखा है और बिना कट के इसे पास किया है...लेकिन अगर कोई फिल्म किसी समुदाय के सेंटीमेंट्स को चोट पहुंचाती है...किसी फिल्म को किसी समुदाय की भावनाओं को चोट पहुंचाने के लिए नहीं बनाया जाना चाहिए.’

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राजनेताओं का यही रुझान हिंसा को, हिंसा की धमकियों को बढ़ावा देता है. मीडिया ने भी बड़ी भूमिका निभाई है. मीडिया ने इन अराजक तत्वों की आवाज को कई गुना बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया है और इस तरह से वह इनके हाथों का खिलौना बनकर रह गई है. क्रिएटिव फ्रीडम पर एक तार्किक बहस पूरी तरह से इन भयंकर तत्वों के पक्ष में मुड़ गई है. जब अपराधी किसी को मारने की धमकी देते हैं तो उनकी जगह टीवी स्टूडियो में नहीं होती, बल्कि उनका ठिकाना जेल होती है.

यह अहम है कि मूवी को वक्त पर रिलीज किया जाए. सही संदेश देने की जरूरत है. लोकतंत्र में क्रिएटिव फ्रीडम और विरोध दोनों की जगह है, लेकिन निश्चित तौर पर हिंसा की इसमें कोई जगह नहीं है.

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