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ऑनलाइन ट्रोलिंग: आखिर क्या है ये बला?

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए ये बेहद हताशा भरी और खतरनाक स्थिति है

Updated On: Mar 04, 2017 07:53 AM IST

Rakesh Kayasth Rakesh Kayasth

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ऑनलाइन ट्रोलिंग: आखिर क्या है ये बला?

असली बात शुरू करने से पहले एक छोटी सी कहानी जो बहुत साल पहले मुझे दिल्ली के एक वरिष्ठ पत्रकार ने सुनाई थी. बात 1980 की है, जनता पार्टी की सरकार गिर चुकी थी और देश में फिर से चुनाव हो रहे थे.

गर्म राजनीतिक माहौल में डीटीसी की बस में एक बुजुर्ग और नौजवान चुनावी बहस कर रहे थे. बुजुर्ग जनता पार्टी के समर्थक थे जबकि नौजवान संजय गांधी का भक्त यानी पक्का कांग्रेसी था. बहस लगातार गर्म हो रही थी और पूरी बस तमाशा देख रही थी. अचानक नौजवान के जज्बात इस कदर बेकाबू हुए कि उसने बुजुर्ग को तमाचा जड़ दिया.

भरी बस में थप्पड़ खाकर तिलमिलाए सीनियर सिटीजन ने बस रुकवाई और उतरते वक्त जनता को साक्षी मानकर उस नौजवान से कह गए कि कभी अपनी मनहूस शक्ल लेकर मेरे घर मत आना. अपनी बेटी से तुम्हारी सगाई मैं आज ही तोड़ता हूं.

इस कहानी में ना कांग्रेस अहम है, ना जनता पार्टी...सबसे ज्यादा अहमियत है उस तमाचे की जिसने संस्कारों की सीमा के साथ रिश्ते को भी तोड़ दिए. 37 साल बाद आज भी तमाचे लगभग उसी तरह बल्कि कहीं ज्यादा तादाद में बरस रहे हैं. रिश्ते आज भी टूट रहे हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि हमारी दुनिया बदल चुकी है और हम रियल से वर्चुअल हो गये हैं.

वैचारिक विरोध से ट्रोलिंग तक

देश आजकल एक नई तरह की हिंसा देख रहा है, कहने को तो ये हिंसा सोशल मीडिया पर है यानी कि ये सिर्फ शाब्दिक हिंसा है लेकिन सच पूछा जाए तो इसका असर शारीरिक हिंसा से कम नहीं है.

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इस हिंसा का ताजा शिकार बनी हैं 20 साल की गुरमेहर कौर. कॉलेज कैंपस में होनेवाली गुंडागर्दी और युद्ध का रचनात्मक ढंग से विरोध करने वाली गुरमेहर ने उस हिंसा के आगे हथियार डाल दिए हैं, जिसे इंटरनेट की भाषा में ट्रोलिंग कहा जाता है.

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अश्लील और अभद्र टिप्पणियां ही नहीं गुरमेहर कौर को बलात्कार तक की धमकी दी गई. जिन लोगों ने गुरमेहर के समर्थन में पोस्ट किए, उनके फेसबुक वॉल पर भी गालियों के अंबार लगे हैं. नतीजा ये हुआ कि गुरमेहर को ये कहना पड़ा कि अब वह खुद को इस बहस से अलग कर रहीं हैं.

आखिर क्या बला है ट्रोल?

स्कैंडेनेविया की लोक-कथाओं में एक ऐसे बदशक्ल और भयानक जीव का जिक्र आता है, जिसकी वजह से राहगीर अपनी यात्रा पूरी नहीं कर पाते थे. इस विचित्र जीव का नाम ट्रोल था.

इंटरनेट की दुनिया में ट्रोल का मतलब उन लोगों से होता है, जो किसी भी मुद्दे पर चल रही चर्चा में कूदते हैं और आक्रामक और अनर्गल बातों से विषय को भटका देते हैं. अगर ये नहीं तो फिर इंटरनेट पर दूसरों को बेवजह ऐसे मामले में घसीटते हैं, जिससे उन्हे मानसिक परेशानी हो.

लोक-कथाओं के राहगीरों की तरह फेसबुक या ट्वविटर के यात्रियों का सफर भी ट्रोल की वजह से अधूरा रह जाता है, क्योंकि उनकी बात जिस दिशा में जानी थी वहां ना जाकर पूरी तरह भटक जाती है

अंग्रेजी में ट्रोल शब्द संज्ञा और क्रिया दोनो रूपों में इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन व्याकरण से परे सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वालों के लिए ट्रोल का सीधा मतलब सिरदर्द और अपमान है.

ट्रोलिंग की मानसिकता क्या होती है?

आखिर ट्रोल कौन लोग होते हैं और वे क्यों अपना सारा कामकाज छोड़कर औरों के पीछे क्यों पड़े होते हैं? पूरी दुनिया में इस सवाल के मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय पहलुओं पर बात हो रही है.

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मनोवैज्ञानिकों की मानें तो जो मानसिकता बिना बात चलती ट्रेन पर पत्थर फेंकने वालों की होती है या पुराने जमाने में ब्लैंक-कॉल करके लोगों को परेशान करने वालों की होती थी, लगभग वही मनोवृति एक ट्रोल की भी होती है.

कई मनोवैज्ञानिक इस प्रवृति को आइडेंटिटी क्राइसिस से जोड़कर देखते हैं. पहचान के संकट से जूझ रहे लोग अक्सर, ये रास्ता अपनाते हैं ताकि उन्हें समाज का अटेंशन मिल सके.

ट्रोल और मूर्ख में फर्क है

लेकिन मामला सिर्फ यही नहीं है. एक्सपर्ट्स ने ट्रोल्स की अलग-अलग कैटेगरी बना रखी हैं, हो सकता है कि कोई आदमी सोशल मीडिया पर बेवजह आपके पीछे पड़ जाए, वो बेहद आक्रमक भाषा में ऐसी बातें करने लगे जिसका आपके मुद्दे से कोई लेना-देना ना हो.

लेकिन जरूरी नहीं है कि ऐसा करने वाला आदमी ट्रोल ही हो, वो खालिस मूर्ख भी हो सकता है, जिसे विशेषज्ञों की भाषा में एक्सीडेंटल ट्रोल कहा जाता है

विशेषज्ञ इस बात पर लगभग एकमत हैं कि ट्रोलिंग तभी मानी जाएगी जब इसके पीछे सोची-समझी रणनीति या नीयत हो. परम-जिज्ञासु, चाटू या ज्ञान-पिपासु व्यक्ति को तकनीकी तौर पर आप तब-तक ट्रोल नहीं कह सकते, जब तक ये साफ न हो कि वो मुद्दा भटकाने के इरादे से आपको पका या डरा रहा है.

आर्गेनाइज्ड ट्रोलिंग सबसे ज्यादा खतरनाक

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइंटिस्ट गैरी किंग का कहना है कि पूरी दुनिया में प्रायोजित और आर्गेनाइज्ड किस्म की ट्रोलिंग का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है.

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इसका मतलब ये है कि कुछ कंपनियां, राजनीतिक दल और सरकारें सोची-समझी रणनीति के तहत ट्रोल्स की फौज खड़ी कर देती हैं ताकि उनके खिलाफ सोशल मीडिया में कोई निगेटिव राय न बन पाए.

प्रोफेसर किंग का दावा है कि पिछले साल चीन में सोशल मीडिया पर 44 करोड़ पोस्ट सरकारी नीतियों के पक्ष में करवाए गए. ये पूरी तरह से प्रायोजित कार्यक्रम था और इसके लिए छुट्टी वाले दिन कर्मचारियों को काम पर लगाया गया ताकि माहौल सरकार के पक्ष में बना रहे.

भारत में सरकार प्रायोजित ट्रोलिंग की खबरें ज्यादा नहीं है. लेकिन किसी खास पार्टी और विचारधारा के लिए सोशल मीडिया को मैनेज करने के ढेरों आरोप हैं

कथित तौर पर बीजेपी की साइबर सेल में काम कर चुकी साध्वी खोसला ने अपनी किताब में इस बात का खुलासा किया था कि किस तरह पार्टी ने कुछ खास लोगों की हिट-लिस्ट तैयार कर रखी है और उन्हें निशाना बनाने के लिए ट्रोल्स काम पर लगाए गए हैं.

साध्वी खोसला ने बाकायदा आरोप लगाया था कि आमिर खान के असहिष्णुता वाले बयान के बाद उनसे ये कहा गया था कि वो आमिर के खिलाफ कैंपेन चलवाए ताकि स्नैपडील्स कंपनी पर अपना ब्रैंड अंबैसडर बदलने का दबाव बढ़े.

साध्वी खोसला के दावे अगर सच न हों, तब भी आप समय-समय पर महसूस कर सकते हैं कि कुछ खास लोगों को निशाना बनाकर किस तरह से व्यवस्थित ट्रोलिंग की जा रही है. सोशल मीडिया के इस खेल में बीजेपी अकेली नहीं है.

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अन्य राजनीतिक पार्टियों के भी अपने साइबर विंग है. लेकिन ये सच है कि मुद्दे उठाने, गिराने और लोगों को सुनियोजित ढंग से टारगेट करने के मामले में बीजेपी बाकी पार्टियों के मुकाबले बहुत आगे है.

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एक लाइलाज मर्ज

सोशल मीडिया पर बहुत-कुछ चलता रहता है, ज्यादा ध्यान मत दीजिए. ये एक आदर्श वाक्य है, जो ट्रोलिंग से परेशान हरेक आदमी दूसरे से जरूर कहता है. लेकिन क्या मौजूदा दौर में सोशल मीडिया को नजरअंदाज किया जा सकता है?

देश के प्रधानमंत्री तक व्हाट्सऐप पर चल रही खबरों का हवाला देते हैं. गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने तो पाकिस्तानी आतंकवादी हाफिज सईद के फर्जी ट्ववीट पर भी बकायदा रिएक्ट किया और देश को ये बताया कि जेएनयू के आंदोलनकारियों को हाफिज का समर्थन हासिल है.

जब सोशल मीडिया का असर सरकार और समाज पर इतना बड़ा हो तो कोई इसे नजरअंदाज कैसे करे. लेकिन अब सवाल ये है कि इसके बुरे असर से बचने का रास्ता क्या है. जवाब बेहद मुश्किल है.

कम्युनिकेशन के इस नए मीडियम ने आम आदमी के हाथों में एक अलग किस्म की ताकत दी है, लेकिन साथ ही एक ऐसा माहौल भी पैदा कर दिया है जहां सबकुछ शक के दायरे में है.

कोई व्यक्ति और कोई खबर आज विश्वसनीय नहीं है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए ये बेहद हताशा भरी और खतरनाक स्थिति है.

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