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वन नेशन, वन इलेक्शन: आखिर कांग्रेस को किस बात का डर सता रहा है

कांग्रेस को दरअसल इस बात का डर सता रहा है कि साल 1967 में जिस तरह उसकी 6 राज्यों में सत्ता छिनी, उसी तरह लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होने पर कहीं उसके कब्जे के बचे हुए राज्यों से भी सफाया न हो जाए

Updated On: Aug 14, 2018 04:15 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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वन नेशन, वन इलेक्शन: आखिर कांग्रेस को किस बात का डर सता रहा है
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ऐसी सियासी सूरत बन रही है कि लोकसभा और 11 राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ हो सकते हैं. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने विधि आयोग को लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाने की वकालत करते हुए चिट्ठी लिखी है. इससे पहले पीएम मोदी भी कई मौकों पर आम चुनाव और सभी विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की बात कर चुके हैं. वहीं राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी बजट सत्र के पहले दिन अपने अभिभाषण में ये बात दोहराई थी.

देखा जाए तो एक साथ चुनाव कराए जाने को लेकर बीजेपी या पीएम मोदी कुछ नया नहीं कह रहे हैं. साल 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त के बीजेपी के घोषणापत्र में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एकसाथ कराए जाने का जिक्र है. घोषणा-पत्र में बीजेपी ने लिखा था कि वो सभी दलों के साथ आम सहमति के जरिये ऐसा तरीका निकालना चाहेगी जिससे लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जा सकें.

दरअसल ये विचार उस इतिहास और व्यवस्था की तरफ वापस लौटने का है जिसकी शुरुआत साल 1952 में हुई थी और जो व्यवस्था साल 1967 तक पूरे देश में रही थी. इसके बावजूद कांग्रेस का विरोध समझ से परे है. कांग्रेस में इस विचार को लेकर कोहराम मचा हुआ है. कांग्रेस का कहना है कि इससे संवैधानिक व्यवस्था खतरे में पड़ जाएगी. कांग्रेस इसे अव्यवाहारिक और अतार्किक बता रही है. उसका कहना है कि ऐसा करने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा.

IndiraGandhi

लेकिन ऐसा कहने से पहले कांग्रेस को इतिहास के आईने में झांकना जरूरी है. आजादी के बाद से साल 1967 तक देश में आम चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव हुए हैं. लेकिन इस संवैधानिक परंपरा को तोड़ने का काम खुद कांग्रेस ने ही किया है. देश में साल 1952 से लेकर 1967 तक चार लोकसभा चुनावों के साथ ही विधानसभा चुनाव भी हुए. तय नियम के मुताबिक पांच साल बाद यानी साल 1972 में लोकसभा चुनाव होने थे. लेकिन इंदिरा गांधी की तत्कालीन सरकार ने समय से पहले ही साल 1971 में मध्यावधि चुनाव करा दिए. जाहिर तौर पर मध्यावधि चुनाव करा कर हालात का सियासी फायदा उठाने की कोशिश की गई.

दरअसल साल 1969 में कांग्रेस में फूट पड़ने के बाद कांग्रेस के पास लोकसभा में बहुमत नहीं था. सरकार बचाने के लिए इंदिरा गांधी को कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थन लेना पड़ा था. लेकिन तब इंदिरा गांधी ये नहीं चाहती थीं कि कम्युनिस्टों के समर्थन से बनी सरकार को तय समय तक जैसे-तैसे खींचा जाए. उस वक्त उन्हें लगा कि उनके फैसलों की वजह से देश में कांग्रेस के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ा है. तभी प्रीवी पर्स की समाप्ति, बैंकों के राष्ट्रीयकरण और गरीबी हटाओ जैसे नारों का चुनावी फायदा उठाने के लिये मध्यावधि चुनाव का फैसला किया. इसके पीछे के दूसरी बड़ी वजह ये भी थी कि लगातार चार लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का ग्राफ गिरता जा रहा था. यहां तक कि साल 1967 में छह राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को भारी हार का सामना करना पड़ा था. क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस की सरकारों का सफाया कर दिया था.

कांग्रेस का ग्राफ साल 1952 में 74 फीसदी से गिरकर 1967 तक 54 फीसदी हो गया था. साल 1971 के आम चुनाव में ये 40 फीसदी ही रह गया था. उस वक्त आम चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव होने की वजह से कांग्रेस का ग्राफ गिर रहा था. वहीं साल 1967 में छह राज्यों में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा था. तमिलनाडु में पूर्व मुख्यमंत्री कामराज की हार चौंकाने वाली थी. कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले तमिलनाडु में क्षेत्रीय पार्टी डीएमके ने मैदान मार लिया था. इसी तरह केरल, ओडीशा, गुजरात, और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था.

कांग्रेस को डर था कि यही गिरता ग्राफ साल 1972 में होने वाले लोकसभा चुनाव को प्रभावित कर सकता है. तभी उसने मध्यावधि चुनाव का फैसला लेकर लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग अलग करने की शुरुआत कर डाली.

इसके बाद तय नियम के मुताबिक साल 1976 में होने वाले लोकसभा चुनावों को भी 1977 तक ढकेल दिया गया. इसके पीछे इमरजेंसी का हवाला दिया गया. कांग्रेस के इस फैसले को विपक्ष ने असंवैधानिक करार दिया. शरद यादव और समाजवादी नेता मधु लिमये जैसे नेताओं ने इसके विरोध में लोकसभा से इस्तीफा दे दिया था. ये और बात है कि आज शरद यादव कांगेस की छांव तले महागठबंधन बनाने की कवायद में जुटे हुए हैं.

1980 में इंदिरा गांधी ने सत्ता में वापसी की थी. सत्ता पर दोबारा काबिज होने के बाद उन्होंने सबसे पहले राज्यों की गैर कांग्रेसी सरकारों को भंग करने का काम किया. किसी सरकार के विश्वास मत खोने या फिर किसी आपातकाल की स्थिति में ही उस राज्य में चुनाव कराने का प्रावधान होता है.

जबकि ऐसा काम तो इन साढ़े चाल सालों में मोदी सरकार ने कभी नहीं किया. 22 राज्यों में बीजेपी अपने बूते या फिर गठबंधन के दम पर चुनाव जीतती आई है. उसने किसी गैर बीजेपी राज्य सरकार को बर्खास्त करने जैसा असंवैधानिक अपराध नहीं किया है.

ऐसे में बीजेपी पर आरोप लगाने से पहले कांग्रेस को अपने अतीत में तोड़ी गई संवैधानिक परंपरा का जवाब देना चाहिये. दरअसल कांग्रेस विरोध के पीछे साफतौर पर मोदी लहर का डर देखा जा सकता है. कांग्रेस अब केवल 4 राज्यों में सीमित है. कांग्रेस को लगता है कि एक साथ चुनाव कराए जाने से उसका पूरी तरह सफाया न हो जाए.

सबसे पहले साल 1983 में चुनाव आयोग ने सुझाव दिया था कि देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाने की प्रणाली विकसित की जानी चाहिये. उसके बाद बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने देश में एक साथ सारे चुनाव कराने की मांग की थी. एक देश-एक चुनाव के समर्थन में पूर्व चुनाव आयुक्त एचएस ब्रह्मा और एसवाई कुरैशी भी उतरे. उन्होंने माना कि बार-बार चुनावों की वजह से विकास की रफ्तार थम जाती है. चुनावों की वजह से सामान्य कामकाज पर असर पड़ता है. खुद पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी लगातार चुनावों पर अपनी चिंता जता चुके हैं. विधि मंत्रालय और चुनाव आयोग भी केंद्र और राज्य के चुनावों को साथ-साथ कराए जाने के पक्ष में अपने विचार पहले ही जता चुके हैं.

BJP National President Amit Shah in Jammu

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने लॉ कमीशन को लिखी अपनी चिट्ठी में ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ के फायदे गिनाते हुए कहा कि इससे चुनाव पर बेतहाशा खर्च पर लगाम लगाने और देश के संघीय स्वरूप को मजबूत बनाने में मदद मिलेगी.

दरअसल देश में हर साल चुनाव होते हैं. चुनावों की वजह से देश का विकास बाधित होता है. चुनाव के चलते लगने वाली अचार संहिता की वजह से कई काम प्रभावित होते हैं. न सिर्फ सरकारी खजाने पर असर पड़ता है बल्कि विकास पर भी बुरा असर पड़ता है.

साल दर साल चुनावों पर होने वाला खर्च बढ़ता जा रहा है जिसका असर देश के खजाने पर पड़ता है. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में जहां चुनाव आयोग का खर्च 3426 करोड़ था तो वहीं तकरीबन कुल खर्च 35 हजार करोड़ का था. जबकि ठीक दस साल पहले यानी साल  2004 में चुनाव आयोग का खर्च 1114 करोड़ हुआ था जबकि तकरीबन कुल खर्च 10 हजार करोड़ हुआ था.

ऐसे में एक देश एक चुनाव के पीछे के वाजिब तर्कों को सियासी नजरिये से देखना देशहित में नहीं होगा. कांग्रेस के विरोध पर सवाल उठता है कि अगर एक देश-एक चुनाव या फिर साल 2019 के लोकसभा चुनाव के साथ 11 राज्यों का विधानसभा चुनाव कराया जाना लोकतंत्र का अपमान है तो फिर साल 1971 में कांग्रेस ने क्या किया था?

बहरहाल, अगले साल 11 राज्यों के साथ ही लोकसभा चुनाव कराए जा सकते हैं. जिन राज्यों में चुनाव एक साथ कराए जाने की बात हो रही है उनमें अधिकतर बीजेपी शासित राज्य हैं. इस साल के आखिर में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में इन तीनों राज्यों के चुनाव को टालकर 2019 में लोकसभा चुनाव के साथ ही कराए जाने के कयास हैं.

ये राज्य कुछ समय तक के लिए राज्य में राज्यपाल शासन की सिफारिश कर सकते हैं ताकि इन राज्यों के चुनाव भी लोकसभा चुनाव के साथ हो सकें. इसी तरह महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा के विधानसभा चुनाव भी लोकसभा चुनाव के साथ कराए जा सकते हैं. इन राज्यों में लोकसभा चुनाव के बाद चुनाव होने हैं. वहीं आंध्र प्रदेश, ओडिशा और तेलंगाना के विधानसभा चुनाव भी लोकसभा चुनाव के साथ ही होने हैं. ऐसे में चुनावी खर्च को कम करने के लिए मोदी सरकार एक बड़ा फैसला ले सकती है.

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