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एक राष्ट्र, एक चुनाव: जल्दी में लिया निर्णय देश को मुश्किल में डाल सकता है

एक राष्ट्र एक चुनाव के बारे में और बहस और चर्चा की जरूरत है. इस मामले में जिस एक चीज से परहेज किया जाना चाहिए, वह है इसे हड़बड़ी में लागू करना

Updated On: Feb 02, 2018 08:52 AM IST

Dilip C Mandal Dilip C Mandal
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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एक राष्ट्र, एक चुनाव: जल्दी में लिया निर्णय देश को मुश्किल में डाल सकता है
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 69वें गणतंत्र दिवस से ठीक पहले ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की बात छेड़कर एक राष्ट्रीय बहस की शुरुआत की है. यह भारतीय संविधान और लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण बहस है, जिसके बहुत गहरे असर हो सकते हैं और इसलिए यह बहुत जरूरी है कि देश का हर सचेत नागरिक इस बहस में शामिल हो. इस बहस में हिस्सा लेने से पहले आवश्यक है कि इस प्रस्ताव के पक्ष और विपक्ष के तर्कों को जान लिया जाए, ताकि किसी सुसंगत निष्कर्ष तक पहुंचना संभव हो. मुमकिन है कि इस आलेख में तमाम तर्कों को शामिल करना संभव न हो, इसलिए इस आलेख को पूरी बहस में एक हस्तक्षेप के तौर पर ही देखा जाए.

भारत ही नहीं, दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश में चुनाव का निर्णायक महत्व है. भारत ने 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' के सिद्धांत को स्वीकार किया है, इसका मतलब है कि भारत के हर मतदाता को चुनाव में एक वोट देने का अधिकार है और हर मतदाता के वोट का मूल्य समान है. ज्यादातर भारतीय नागरिक को कम से कम दो स्तरों पर वोट देने का अधिकार है. भारतीय संविधान ने संघीय ढांचे का प्रावधान किया है, उसके तहत मतदाता लोकसभा और विधानसभा के लिए मतदान कर सकता है.

Azamgarh Voting

प्रतीकात्मक वोटिंग

संघीय ढांचे का मतलब यह है कि विधानसभाएं, लोकसभा के अधीन नहीं हैं, बल्कि उनका स्वतंत्र अस्तित्व है और उनके बीच कार्य विभाजन के लिए सूचियां बनी हुई हैं. दिल्ली और पुदुचेरी के अलावा बाकी केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव नहीं होते. वयस्क नागरिकों को स्थानीय निकायों के लिए होने वाले चुनावों में भी मतदान का अधिकार है.

'वन नेशन, वन इलेक्शन' की मौजूदा बहस में, लोकसभा और देश की तमाम विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की बात है ताकि देश में पांच साल में एक ही बार में सारे चुनाव हो जाएं.

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इस प्रस्ताव के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह है कि एक साथ सारे चुनाव करा लेने से बार-बार होने वाले चुनाव का खर्च बचेगा. भारत में चुनाव को एक खर्चीला कार्य माना जाता है. हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव के बारे में चुनाव आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि इस चुनाव में प्रति मतदाता 17 रुपए का खर्च आया था. 2009 के लोकसभा चुनाव में यह खर्च 12 रुपए प्रति मतदाता था. क्या यह बहुत बड़ी रकम है? इसका जवाब अलग-अलग हो सकता है.

चुनाव का सरकारी खर्च बढ़ने की सबसे बड़ी वजह कैंडिडेट्स की संख्या में बढ़ेतरी है. इसके अलावा मतदाताओं में जागृति फैलाने के विज्ञापनों, वोटर स्लिप के बंटवारे और अब वोटिंग मशीन के साथ कागज की पर्ची निकालने की मशीन को जोड़ने पर भी खर्च आ रहा है. लेकिन आम तौर पर पांच साल में होने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह खर्च इतना भी नहीं है कि इसे फिजूलखर्ची माना जाए.

narendra modi

प्रतीकात्मक तस्वीर

2014 में लोकसभा चुनाव कराने का कुल खर्च 3,426 करोड़ रुपए था. पिछले केंद्रीय बजट में सरकारी खर्च 19,78,060 करोड़ रुपए के हिसाब से यह रकम बेहद छोटी है. और फिर चुनाव पर होने वाले खर्च का बड़ा हिस्सा लौटकर अर्थव्यवस्था में ही जुड़ता है और चुनावी जागृति जैसे अभियान को किसी भी लिहाज से फिजूलखर्ची कहना उचित नहीं है.

एक साथ सारे चुनाव करा लेने से चुनाव का खर्च कम तो होगा, लेकिन यह बचत कितनी होगी, इसके बारे में अब तक कोई अध्ययन नहीं किया गया है. इसलिए जो लोग खर्च में कटौती की बात कर रहे हैं, वे भी अंधकार में ही हैं.

'एक राष्ट्र, एक चुनाव' के पक्ष में दूसरा बड़ा तर्क है कि बार-बार चुनाव की वजह से सरकारें लगातार चुनाव मोड में रहती हैं और वे स्थिर होकर काम नहीं कर पातीं. चुनाव की घोषणा के बाद, सरकारों पर यह पाबंदी होती है कि वे लोकलुभावन कार्यक्रमों की घोषणा न करे और ऐसा कुछ भी न करें जिससे मतदाताओं के फैसले पर असर पड़े. हालांकि, सामान्य सरकारी कामकाज पर चुनाव का कोई असर नहीं होता.

कई बार सरकारें दीर्घकालीन योजनाओं पर काम करती हैं, जिनका असर चार या पांच या उससे भी ज्यादा समय बाद आता है. तर्क दिया जा रहा है कि अगर सरकार पर हमेशा चुनाव का दबाव रहेगा तो उसके लिए दीर्घकालीन कार्यक्रमों पर काम करना मुश्किल हो सकता है.

सरकार पर चुनाव के दबाव को देखने के दो तरीके हो सकते हैं. अगर हम मानें कि सरकार की एक स्वतंत्र सत्ता है तो उसका चुनाव के डर से सहम कर रहना बुरी बात हो सकती है लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में अगर सरकार को चुनाव और आम जनता का भय है, तो इसे अच्छा मानना चाहिए. चुनाव के दबाव से अगर सरकार नीतियां बनाती हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छा ही है. चुनाव हार जाने का भय लोकतंत्र का मूल आधार है, वरना कोई भी सरकार बेलगाम हो सकती है.

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इसके अलावा, एक राष्ट्र एक चुनाव के पक्ष में एक और तर्क यह दिया जा रहा है कि बार-बार होने वाले चुनावों की वजह से सुरक्षा बलों के एक हिस्से को लगातार चुनाव कार्यों में व्यस्त रहना पड़ता है. इस तर्क में दम तो है, लेकिन एक स्थायी चुनाव बल बनाकर इसका आसानी से समाधान किया जा सकता है. वैसे भी सुरक्षा बलों के मौजूदा आकार के साथ मौजूदा व्यवस्था में चुनाव संपन्न कराने में कोई बाधा नहीं आ रही है.

इन तर्कों के मुकाबले यह भी देखना चाहिए कि 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' के खिलाफ कैसे तर्क सामने आ रहे हैं. इसके खिलाफ सबसे मजबूत तर्क यह दिया जा रहा है कि भारतीय संविधान में इसका कोई प्रावधान नहीं है. भारत के पहले लोकसभा चुनाव के साथ में तमाम विधानसभाओं के लिए मतदान करा लेने का विकल्प मौजूद था. लेकिन संविधान निर्माताओं ने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की. तब भी लोकसभा और विधानसभा के चुनाव अलग-अलग हुए. विधानसभाओं का कार्यकाल पांच साल निर्धारित किया गया है. एक बार में लोकसभा के साथ तमाम विधानसभाओं का चुनाव कराने के लिए कई विधानसभाओं के कार्यकाल में कटौती करनी पड़ सकती है.

Parliament House

बिना संविधान में बदलाव के, यह मुमकिन नहीं है. मिसाल के तौर पर यूपी में पिछला विधानसभा चुनाव 2017 में हुआ है. क्या वहां की सरकार और राजनीतिक दल 2018 या 2019 में लोकसभा चुनाव के साथ यूपी का विधानसभा चुनाव कराने को राजी होंगे? क्या केंद्र सरकार ऐसी किसी भी सरकार को भंग कर सकती है, जिसका कार्यकाल पूरा नहीं हुआ है? ऐसा वह किस कानूनी प्रावधान के तहत करेगी? एक साथ देश में सारे चुनाव करा लेने के प्रस्ताव को इन कानूनी और संवैधानिक सवालों से टकराना होगा.

लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने में एक बड़ी समस्या यह है कि लोकसभा चुनाव जहां राष्ट्रीय मुद्दों पर होते हैं, वहीं विधानसभा चुनावों में राज्य स्तर के और स्थानीय मुद्दे भी हावी रहते हैं. एक साथ दोनों चुनावों को करा देने से यह मुमकिन है कि मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो जाए. चूंकि जनमत बनाने में मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका है और मीडिया आम तौर पर राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों और राष्ट्रीय दलों को तरजीह देता है, इसलिए मुमकिन है कि दोनों चुनाव साथ होने से क्षेत्रीय मुद्दे और क्षेत्रीय दल हाशिए पर चले जाएं. संविधान के संघीय ढांचे को यह बात कमजोर कर सकती है.

'एक राष्ट्र, एक चुनाव' का एक असर यह भी हो सकता है कि अगर किसी खास समय में किसी दल की लहर हो तो एक-सी सरकारें केंद्र और राज्य में आ जाएंगी. सत्ता का किसी एक दल के हाथ में इस हद तक केंद्रीकरण लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है.

'एक राष्ट्र, एक चुनाव' का सिद्धांत राजनीतिक दलों के लिए भी दोधारी तलवार है. आज हो सकता है कि बीजेपी इसमें अपना फायदा देख रही हो, लेकिन कांग्रेस अगर आगे चलकर कभी केंद्र की सत्ता में आती है, तो वही गणित कांग्रेस को भी फायदा पहुंचाएगा. इसलिए इस मामले को पार्टी पॉलिटिक्स से ऊपर उठकर, राष्ट्र हित के नजरिए से देखना चाहिए.

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दरअसल, यह धारणा ही सवालों के दायरे में है कि बार-बार चुनाव होने से देश को कोई नुकसान होता है. बल्कि बार-बार चुनाव होना लोकतंत्र के लिए एक अच्छी बात भी है. मिसाल के तौर पर, केंद्र में किसी पार्टी की सरकार आने के बाद हुए विधानसभा चुनावों में अगर सत्ताधारी पार्टी को झटका लगता है, तो यह उसके लिए आत्मालोचना और सुधार का अवसर हो सकता है.

फिलहाल, एक राष्ट्र एक चुनाव के बारे में और बहस और चर्चा की जरूरत है. इस मामले में जिस एक चीज से परहेज किया जाना चाहिए, वह है इसे हड़बड़ी में लागू करना. इस बदलाव का भारतीय लोकतंत्र पर कई स्तरों पर प्रभाव पड़ेगा. उम्मीद की जानी चाहिए कि राष्ट्र को विश्वास में लिए बगैर मतदान की बुनियादी प्रक्रियाओं में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा.

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