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बिहार में एक बार फिर अपराध बन सकता है चुनावी मुद्दा

इस जवाब में कोई दम नहीं रह गया है कि आरजेडी के शासन काल को जंगल राज कहा जाता था. उस दौर की तुलना में अपराध कम ही हो रहे हैं. यहां तो तुलना नीतीश के पहले, दूसरे और तीसरे शासन के बीच हो रही है

Updated On: Jun 24, 2018 09:11 AM IST

Arun Ashesh

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बिहार में एक बार फिर अपराध बन सकता है चुनावी मुद्दा

अपराध के आंकड़े भले ही नीतीश कुमार को सकून दे रहे हों, पर राज्य के आम लोग इन दिनों सुशासन को पहले की तरह भरोसे के साथ नहीं देख पा रहे हैं. यह बेवजह नहीं है. कभी-कभी ऐसी घटनाएं हो जा रही हैं, जिसे देख-सुनकर सिहरन पैदा हो जाती है. कुछ दिन पहले गया में एक व्यक्ति की मौजूदगी में उसकी पत्नी और बेटी के साथ रेप की खबर आई. शुक्रवार को बेतिया में एक शिक्षक के सामने उनके इकलौते बेटे की हत्या कर दी गई.

ये ऐसी घटनाएं हैं, जिनके बारे में सोचकर ही धारणा बनती जा रही है कि अपराधियों के मन से पुलिस और कानून का डर जा रहा है. अगर ऐसा है तो यह नीतीश कुमार के लिए बड़ी चुनौती है. उन्हें याद होगा कि 2005 में राज्य की जनता ने एनडीए के पक्ष में मतदान किया था, उस वक्त कानून का राज और सुशासन बड़ा चुनावी मुद्दा था. विकास का नंबर दूसरे पायदान पर था. शाम ढलने के बाद लोग घर से बाहर निकलना मुनासिब नहीं समझते थे. जिनके पास थोड़ी पूंजी थी और राज्य के बाहर कहीं कारोबार का विकल्प था, उन सबों का पलायन हो रहा था.

ताजा हाल यह है कि मुख्य विपक्षी दल आरजेडी अपराध को राजनीतिक मुद्दा बना चुका है. इस जवाब में कोई दम नहीं रह गया है कि आरजेडी के शासन काल को जंगल राज कहा जाता था. उस दौर की तुलना में अपराध कम ही हो रहे हैं. यहां तो तुलना नीतीश के पहले, दूसरे और तीसरे शासन के बीच हो रही है.

पहले दौर में नीतीश ने वादा निभाया

24 नवंबर 2005 को सत्ता में आने के तुरंत बाद नीतीश ने अपराधियों की नकेल कसनी शुरू कर दी. असर अगले दिन से दिखने लगा. वह डर जो आम लोगों के दिल में था, भागकर अपराधियों के दिमाग में पैठ गया. अपहरण के धन से अमीर बने कई सरगनाओं ने दक्षिण के राज्यों का रुख किया. उसी दौर में राजधानी सहित राज्य के दूसरे बड़े शहरों में रात की गतिविधियां शुरू हो गईं. होटल, रेस्तरां और आइसक्रीम पार्लर देर रात तक खुलने लगे. बदमाशों के डर से बंद सिनेमा के नाइट शो भी चालू हो गए. दूसरे राज्यों में भाग गए कारोबारी लौटने लगे.

अपराध कम हुए तो विकास भी शुरू हुआ. सड़क और बिजली की हालत सुधरने लगी. लगा कि सबकुछ ढर्रे पर आ गया. सरकारी अफसर भी चैन की सांस लेने लगे थे क्योंकि बदले हुए निजाम में राजनीतिक नेता-कार्यकर्ता के भेष में कोई आदमी इन अफसरों को डरा-धमका नहीं पा रहा था. उसके पहले के शासन में तो आइएएस अफसर तक की उनके चैंबर में ही पिटाई हो चुकी थी.

nitish kumar

क्यों बढ़ रहा है अपराधियों का मनोबल

राहत की बात यह है कि कानून-व्यवस्था की हालत में गिरावट के बावजूद चीजें हाथ से बाहर नहीं निकल गई हैं. पड़ताल हो रही है कि नीतीश के पहले कार्यकाल में वह कौन सा कदम था, जिसने अपराध के ग्राफ को कम किया. इसका जवाब भी सरकारी रिकार्ड में दर्ज है. नीतीश की टीम में उन दिनों अभयानंद जैसे काबिल आईपीएस अफसर को तरजीह मिली हुई थी. सीएम खुद पुलिस अफसरों के साथ बैठकर अपराध नियंत्रण की योजना बनाते थे. उसी बैठक में स्पीडी ट्रायल की योजना बनी थी. सरकार की सहमति पर इसे लागू किया गया. पुराने मामलों को खंगाल कर निकाला गया. स्पीडी ट्रायल की रफ्तार देखिए-2005-10 के बीच 52343 अपराधियों को सजा दी गई. इनमें पूर्व सांसद और विधायक भी थे. 109 को सजा ए मौत दी गई. करीब 20 फीसदी अपराधियों को उम्र कैद की सजा सुनाई गई.

स्पीडी ट्रायल ने अपराधियों के मन में यह खौफ पैदा कर दिया कि अगर अपराध करेंगे तो बच नहीं पाएंगे. परिणाम सामने था. 2010 के विधानसभा चुनाव में एनडीए 243 में से 206 सीट पर काबिज हो गया. यह लालू प्रसाद की 1995 के चुनाव की ऐतिहासिक कामयाबी पर भारी पड़ा, जब एकीकृत बिहार की 324 सदस्यीय विधानसभा में 167 सीटों पर लालू को सफलता मिली थी.

भूल गए स्पीडी ट्रायल

2010 की जबरदस्त चुनावी कामयाबी ने नीतीश का आत्मविश्वास बढ़ाया. लेकिन, धीरे-धीरे अपराध नियंत्रण का दावा जमीन से अधिक जुबानी रह गया. उनके दूसरे कार्यकाल में, जिसमें कुछ महीनों के लिए जीतनराम मांझी सीएम बन गए थे, स्पीडी ट्रायल की रफ्तार बेहद धीमी हो गई. 2010-15 के बीच इसमें 60 फीसदी से अधिक की गिरावट आ गई.

यह समझने वाली बात है कि विकास की अपेक्षाकृत ठीकठाक गति के बावजूद नीतीश की चुनावी सफलताएं धीमी क्यों पड़ने लगीं. 2014 के लोकसभा चुनाव में बमुश्किल दो सीटों पर उनके उम्मीदवार की जीत हुई. 2015 का विधानसभा चुनाव, जिसे नीतीश कुमार के लोग अपनी सबसे बड़ी जीत समझते हैं, उसका विश्लेषण भी उनके हक में नहीं जा रहा है. 2010 में 115 सीट जीतने वाले नीतीश चुनाव मैदान में जाने से पहले ही 14 सीट गंवा चुके थे. यानी उन्होंने तालमेल के तहत अपनी जीती हुई ये सीटें दूसरे दलों के लिए छोड़ दी. 101 सीटों पर उनके उम्मीदवार खड़े हुए. 71 पर जीत हुई. इनमें से भी एक जोकीहाट की सीट उपचुनाव में आरजेडी के पास चली गई. पांच साल में वो 115 से 70 विधायकों की संख्या पर आ गए. यह कैसी उपलब्धि हुई.

NITISH KUMAR

अपराध बनेगा चुनावी मुद्दा

आरजेडी के कथित जंगलराज को कोसने और उसके नाम पर वोट लेने का टोटका शायद अब नहीं चल पाएगा. वे बच्चे जो 2005 में पांच-छह साल के रहे होंगे, वो नीतीश कुमार के राजकाज में ही जवान हुए. उन्हें आरजेडी के जंगलराज के बारे में अधिक जानकारी नहीं है. इनके मन में अगर अपराध को लेकर कोई अवधारणा बनती है तो यह नीतीश की चुनावी सेहत के लिए ठीक नहीं होगी.

बेशक नीतीश की यह छवि कभी नहीं बन पाई कि उन्होंने अपराधियों को संरक्षण दिया या उन्हें अपनी मंडली में बिठाकर महिमामंडित किया. लेकिन, सकल परिणाम के तौर पर ऐसी छवि का चुनाव के दिनों में बहुत मतलब नहीं रह जाता है. खासकर उस हालत में जबकि उनके सुधार के अधिक फैसले रोजगार सृजन पर नकारात्मक असर डाल रहे हैं और बेरोजगारों को अपराध करने के लिए मजबूर कर रहे हैं.

शराबबंदी बहुत अच्छी चीज है. लेकिन, इसने लाख से अधिक लोगों को रातोंरात बेरोजगार कर दिया. वायदे के बावजूद उनके लिए रोजगार के वैकल्पिक उपाय नहीं किए गए. इसी तरह बालू कारोबार में माफियागिरी को रोकने के लिए उठाए गए कदमों का बुरा असर मजदूरों और छोटे कारोबारियों पर पड़ा है. ये

आंकड़े बस दिल को थोड़ी राहत दे सकते हैं कि 2005 में जब जंगलराज चरम पर था, 3428 लोगों की हत्या हुई थी और 2017 में सिर्फ 2803 लोग ही मारे गए. इस साल के मार्च तक पुलिस रिकॉर्ड के हत्या वाले कालम में 667 का आंकड़ा दर्ज है. आखिर कभी तो नीतीश अपने अफसरों को कहें कि शराब पकड़ने के अलावा भी कई काम हैं.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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