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तीन तलाक पर सरकार की मंशा कानूनी कम और राजनीतिक ज्यादा है

तीन तलाक के मसले पर सख्त कानून लाकर सरकार मुस्लिम महिलाओं के एक बड़े तबके को रिझाने की कोशिश करना चाहती है

Sushil K Tekriwal Sushil K Tekriwal Updated On: Jan 08, 2018 07:11 PM IST

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तीन तलाक पर सरकार की मंशा कानूनी कम और राजनीतिक ज्यादा है

सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन तलाक को असंवैधानिक और गैरकानूनी घोषित किए जाने के बाद केंद्र सरकार तीन तलाक देने के मसले को गंभीर अपराध बनाना चाहती है. इस बाबत केंद्र द्वारा प्रस्तावित कानूनी मसौदा एक ज्वलनशील मुद्दा बनता दिख रहा है. लोकसभा में पारित होने के बाद भी यह कानूनी मसौदा फिलहाल सियासत के गलियारों में लटक गया है. यह मसला अब महज एक कानूनी प्रावधान न होकर सियासी रंग में आकंठ डूबता फलसफा बन गया है.

केंद्र सरकार ने वर्तमान मसौदे के मार्फत एक तीर से कई शिकार किए हैं. यह मसौदा न केवल समान आचार संहिता के अस्पृश्य परिसर में पिछले दरवाजे से घुसने का रास्ता बनेगा बल्कि रिवाजों और प्रथाओं पर बने कानूनी प्रावधानों को संरक्षण देने के लिए बनाए गए पर्सनल ला बोर्ड की स्वायत्ता पर भी नकेल कसेगा. साथ ही मुस्लिम समाज में लिंग के आधार पर झगड़े की चिंगारी सुलगाने और तुष्टीकरण के बीज बोने के प्रयासों से लैंगिक समरसता खत्म होगी.

वैवाहिक संस्थान का पोषण होने की बजाए इसकी जड़ों का उन्मूलन शुरु हो जाएगा. इसका नतीजा शायद यह भी होगा कि यह कानून काफी खतरनाक शक्ल अख्तियार कर ले जिसका दुरूपयोग और दुष्प्रयोग होना शुरु हो जाए और इसके कल्याणकारी कानून होने के दावे खत्म हो जाएं.

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सरकार का पेश किया गया तीन तलाक विधेयक लोकसभा में आराम से पास हो गया था (फोटो: पीटीआई)

पहले ही हमने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498 (ए) के संदर्भ में इस तरह के कानून के दुरूपयोग और दुष्प्रयोग का दंश झेला है. और रोज झेल भी रहे हैं. तीन तलाक से निबटने के लिए बनाए गए कानूनी मसौदे का इस्तेमाल एक उपकरण के रूप में न हो. यह सुनिश्चित करना भी सबसे ज्यादा जरूरी है. मुस्लिम महिलाओं की रहनुमाई की आड़ में इस तरह के कानून का असली उपयोग कितना हो पाएगा, यह आज एक बहुत बड़ा सवाल है.

मुस्लिम समाज में दोबारा शादी करने की प्रक्रिया काफी जटिल है

तलाक उल बिद्दत के नाम से तीन तलाक की प्रक्रिया को जाना जा सकता है. इसके तहत कोई भी मुस्लिम व्यक्ति अपनी बीवी को सिर्फ तीन बार तलाक कह कर अपनी शादी किसी भी समय तोड़ सकता था. इस तरह के किसी को तलाक देने की प्रक्रिया से शादी तत्काल प्रभाव से खत्म मानी जाती थी. साथ ही उसी दंपति द्वारा दोबारा शादी करने की प्रक्रिया भी काफी जटिल थी जिसे हलाला कहते हैं.

हलाला का अर्थ है कि यदि तीन बार तलाक बोलकर तलाक दे दिया गया है और यदि दंपति एक साथ रहना चाहता है तो सबसे पहले महिला को किसी दूसरे मुस्लिम व्यक्ति से दूसरी शादी करनी पड़ेगी. उसके साथ कुछ दिन बिताने के बाद वह उसे तलाक देकर फिर से पुराने शौहर से दोबारा शादी कर सकती है.

A veiled Muslim bride waits for the start of a mass marriage ceremony in Ahmedabad, India, October 11, 2015. A total of 65 Muslim couples from various parts of Ahmedabad on Sunday took wedding vows during the mass marriage ceremony organised by a Muslim voluntary organisation, organisers said. REUTERS/Amit Dave - RTS3Z5U

मुस्लिम समाज में किसी तलाकशुदा महिला के दोबारा शादी की प्रकिया काफी जटिल है

तलाक उल बिद्दत की वजह से मुस्लिम महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और भावनात्मक परेशानियों का सामना करना पड़ता था. ज्यादातर महिलाएं शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ सिर्फ इसीलिए आवाज नहीं उठा पाती थीं कि न जाने कब उसका शौहर अपने गुस्से का इजहार तीन बार तलाक बोल कर कर दे और उसकी जिंदगी हमेशा के लिए नर्क से भी बदतर बन जाए.

इस्लामिक विद्वानों ने तीन तलाक की खिलाफत की है, इसे इस्लाम विरोधी माना है

दुनिया के कई इस्लामिक विद्वानों ने तीन तलाक की पुरजोर खिलाफत की है और इसे इस्लाम विरोधी माना है. कई देशों में तीन तलाक पर पाबंदी भी लगी है. पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित विश्व के 22 देशों में तीन तलाक प्रक्रिया पर पहले से रोक है. बावजूद इसके भारत में यह प्रक्रिया बड़े पैमाने पर चलती आ रही है.

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यही कारण है कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में इस कुप्रथा को असंवैधानिक करार दिया है. यानी अब कोई भी मुस्लिम व्यक्ति अपनी बीबी को सिर्फ तीन बार तलाक कह कर अपनी शादी तुरंत नहीं तोड़ सकता है. यह फैसला एक क्रांतिकारी फैसला है. निश्चित रूप से इस फैसले का मुस्लिम समाज की महिलाओं पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा. यह फैसला मुस्लिम महिलाओं को समानता का हक भी देगा.

नए कानूनी मसौदे में तीन तलाक देने को अपराध बना दिया गया है जिसके लिए 3 साल की कैद और जुर्माने का भी प्रावधान है. साथ ही, पीड़ित महिला अदालत से भरण-पोषण का दावा भी कर सकती है. इस कानून को लाने के पीछे सरकार का यह तर्क है कि ठोस और सख्त कानून के बगैर सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू करना मुश्किल है. लेकिन सरकार की मंशा कानूनी कम और राजनीतिक ज्यादा है.

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मुस्लिम महिलाओं के एक बड़े तबके को रिझाने की कोशिश 

तीन तलाक के मसले पर सख्त कानून लाकर सरकार मुस्लिम महिलाओं के एक बड़े तबके को रिझाने की कोशिश करना चाहती है. तीन तलाक के मसले को खालिश कानूनी नजर से ही देखा जाना चाहिए. यदि इसमें सियासत को मिला दिया गया तो इस प्रकार का कानून कामयाबी कम और दुरूपयोगिता ज्यादा की नजीर बनेगा.

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सरकार को चाहिए कि वो कानून की संपूर्णता के लिए दूसरे मुस्लिम देशों में हुए तलाक कानून संबंधी सुधारों का तुलनात्मक न्याय-दर्शन का सघन और सकारात्मक मंथन करे. साथ ही बगैर किसी सियासती मंशा के एक संतुलित कानून बनाए ताकि पारिवारिक-वैवाहिक संस्थान की पवित्रता भी बनी रहे. इससे कानून के दुरूपयोग और दुष्प्रयोग की संभावना भी खत्म हो सकेगी. तभी मुस्लिम महिलाओं के लिए सतत रूप से न्याय सुनिश्चित हो पाएगा.

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं और रायन स्कूल मामले में प्रद्युम्न पक्ष से मुकदमा लड़ रहे हैं)

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