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मुख्तार अंसारी की पुरानी 'मुख्तार' रही हैं मायावती

पहली बार बीएसपी के टिकट पर ही विधायक बने थे मुख्तार अंसारी

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Jan 27, 2017 11:09 PM IST

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मुख्तार अंसारी की पुरानी 'मुख्तार' रही हैं मायावती

मायावती ने आखिरकार वह कर दिखाया जो शिवपाल यादव पिछले कई महीनों से करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए थे. मायावती ससम्मान मुख्तार अंसारी को अपनी पार्टी में ले आई हैं. सिर्फ मुख्तार ही नहीं, उनके भाई सिगबतुल्लाह और बेटे अब्बास भी बहुजन समाज की लड़ाई में मायावती के खेमे में शामिल हो गए हैं.

कहा जाता है सपा विवाद की अहम वजहों में एक वजह कौमी एकता दल का विलय किया जाना भी था. अखिलेश यादव विरोध में थे और शिवपाल यादव सपोर्ट में. अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी की छवि चमकाने के लिए मुख्तार को पार्टी में नहीं आने दिया.

मतलब शिवपाल फेल हो गए. मुख्तार भी फेल ही हो गए थे. कौमी एकता दल की कोई सियासी पूछ गाजीपुर-मऊनाथ भंजन से इतर तो है नहीं. मुख्तार को बड़ी पार्टी का सहारा चाहिए था जो मायवती ने उन्हें दे दिया है.

अखिलेश हुए कामयाब

अपनी आपराधिक छवि के दम पर चुनाव जीतने वाले मुख्तार को अखिलेश यादव ने दूर रखकर भले ही अपना दामन बचा लिया हो लेकिन यूपी की राजनीति बिना अपराधियों के चले, ऐसा हाल के इतिहास में नहीं दिखता. मुख्तार को सपा से दुत्कारा गया तो बीएसपी ने पूरी इज्जत दी. उनके लिए तो मायावती ने अपने तीन घोषित प्रत्याशियों के टिकट काटे हैं.

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मायावती के पास ऐसा करने का कारण भी है. ये एक तरह से मुख्तार की घरवापसी है. दरअसल मुख्तार अंसारी पहली बार मऊ से विधायकी का चुनाव 1996 में बीएसपी के टिकट पर ही जीत कर आए थे. उसके बाद 2002 और 2007 में वे निर्दलीय विधायक बने. 2007 में मुख्तार ने फिर बीएसपी ज्वाइन की. तब मायावती ने मुख्तार को ‘गरीबों का मसीहा’ तक कह डाला था.

फिर 2010 में गाजीपुर जेल रेड पड़ी तो पाया गया कि मुख्तार अंसारी पूरे ऐशो आराम से जेल में रह रहे थे. बीएसपी से उन्हें निकाल दिया गया. पार्टी ने सफाई दी कि अंसारी भाईयों को पार्टी में इसी शर्त पर लाया गया था कि वो अब किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं होंगे.

किसी पार्टी ने नहीं स्वीकारा अंसारी भाईयों को

स्थिति ये बनी कि किसी राजनीतिक पार्टी ने दोनों भाईयों को स्वीकार तक नहीं किया. नतीजतन मुख्तार ने अपना पार्टी बनाई और 2012 का चुनाव जीते. अब जब से विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हुई तो शिवपाल उन्हें सपा में शामिल कराना चाह रहे थे. लेकिन ये हो नहीं सका.

इधर बहुजन से सर्वजन की नेता बनने की ओर कदम बढ़ा चुकीं मायावती को मुख्तार अंसारी में अल्पसंख्यक वोटों की बदौलत तीन सीटें लाने की ताकत तो दिख रही थी. उन्होंने सोचा कि अपने पार्टी के पुराने साथी को वापस ले आते हैं. मुख्तार को बीएसपी में लाकर मायावती ने उन्हें फिर से राजनीतिक पुनर्जीवन देने की कोशिश कर डाली है. संभव है अतीक अहमद भी मुख्तार की सफलता से लालायित हो बीएसपी को ललचाई निगाहों से देख रहे होंगे.

Lucknow: BSP Supremo Mayawati is greeted by brother and son of mafia-turned-MLA Mukhtar Ansari his Quami Ekta Dal (QED) merged with the BSP, in Lucknow on Thursday. PTI Photo by Nand Kumar (PTI1_26_2017_000350B)

कौमी एकता दल के बहुजन समाज पार्टी में विलय के बाद मायावती का इस्तकबाल करते मुख्तार अंसारी के भाई और बेटे. फोटो: पीटीआई

मायावती के इस कदम से इतर अगर यूपी के आम लोगों की धारणा उनके बारे अलग है. यूपी अधिसंख्य लोगों का यह मानना होता है कि एसपी की तुलना में मायावता का शासन-प्रशासन अच्छा होता है. 2007 के चुनाव में एक नारा खूब चला था- चढ़ गुंडन की छाती पर...बटन दबाना हाथी पर.

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अपने वोटरों और आम लोगों की धारणाओं को लेकर मायावती भले ही निश्चिंत हों लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि धारणाएं बदलने में बहुत कम समय लगता है. चुनाव नजदीक है और वोटरो ने अभी तक वोट नहीं डाले हैं. गुंडों को प्रश्रय देने वाली एसपी अपनी छवि सुधारने में लगी है और बीएसपी अपराधियों को सम्मानित कर रही है.

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