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लाभ का पद: 'आप' पर गाज, लेकिन कांग्रेस और बीजेपी को अभयदान क्यों?

दिल्ली में उपचुनाव होने से कांग्रेस और बीजेपी को क्या हासिल हो जाएगा, यह बात समझ से परे है

Updated On: Jan 23, 2018 03:09 PM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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लाभ का पद: 'आप' पर गाज, लेकिन कांग्रेस और बीजेपी को अभयदान क्यों?

दिल्ली में इन दिनों आम आदमी पार्टी (आप) के 20 विधायकों की सदस्यता रद्द किए जाने का मामला खासा गर्माया हुआ है. अयोग्य करार दिए गए सभी 20 विधायकों पर लाभ के पद (ऑफिस ऑफ प्रॉफिट) पर रहने का आरोप था. चुनाव आयोग ने लाभ के पद के उल्लंघन के मामले में राष्ट्रपति से इन विधायकों की सदस्यता रद्द करने की सिफारिश की थी. जिसे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने रविवार को अपनी मंजूरी दे दी.

दरअसल, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इन विधायकों को अपनी सरकार में संसदीय सचिव बनाया था. कानूनन यह पद लाभ का पद है. लिहाजा चुनाव आयोग की सिफारिश पर संसदीय सचिव के पद पर रहे आप के नेताओं को अपनी विधायकी से हाथ धोना पड़ गया. अब दिल्ली के इन 20 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव होगा.

अतीत में अजय माकन खुद लाभ के पद पर मौज उड़ा चुके हैं

लाभ के पद मामले में दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष अजय माकन ‘आप’ के खिलाफ जमकर हमला बोलते आ रहे हैं. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि, अतीत में अजय माकन खुद लाभ के पद पर मौज उड़ा चुके हैं. अजय माकन के एक शुरुआती शैक्षिक अभिलेख और कार्य अनुभव (सीवी) के मुताबिक, साल 1999 में दिल्ली की तत्कालीन शीला दीक्षित सरकार के दौरान अजय माकन संसदीय सचिव के पद पर तैनात थे.

लिहाजा, वास्तव में इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि, एक व्यक्ति जो खुद दिल्ली सरकार में संसदीय सचिव रह चुका है, वह इसी मामले में अरविंद केजरीवाल को कठघरे में खड़ा कर रहा है. यह तो सरासर वही मिसाल होगी कि, 'छलनी कहे सूई से तेरे पेट में छेद.'

दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष अजय माकन ने केजरीवाल सरकार के खिलाफ विरोध का झंडा बुलंद कर रखा है

अजय माकन ने लाभ के पद मामले में केजरीवाल सरकार के खिलाफ विरोध का झंडा बुलंद कर रखा है

आप के 20 विधायकों की सदस्यता रद्द किए जाने को लेकर अरविंद केजरीवाल और उनकी सरकार पर अजय माकन का हमला उनके दोहरे रवैए और पाखंड को दर्शाता है. सच तो यह है कि, भारत के लगभग हर राज्य में कई पार्टियों के विधायक लाभ के पद पर बैठे हुए हैं. सत्ताधारी पार्टियों द्वारा अपने विधायकों को लाभ के पद पर बैठाने की यह पुरानी परंपरा है.

केजरीवाल से पहले दिल्ली की सत्ता पर बतौर मुख्यमंत्री काबिज रहीं शीला दीक्षित ने भी संसदीय सचिवों की नियुक्ति की थी. शीला सरकार में 19 लोग संसदीय सचिव बनाए गए थे. छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार भी अतीत में 11 लोगों को संसदीय सचिव नियुक्त कर चुकी है. लेकिन बाद में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सभी नियुक्तियों को रद्द कर दिया था.

राजस्थान में तो सरकार द्वारा विधायकों की लालसाओं और महत्वाकांक्षाओं से समझौता करने की लंबी परंपरा रही है. राजस्थान में विधायकों को खुश करने और उन्हें नवाजने के लिए न केवल संसदीय सचिव बनाया जाता है, बल्कि उन्हें विभिन्न निगमों और एजेंसियों के अध्यक्ष के तौर पर भी नियुक्त किया जाता है. राजस्थान में लाभ के पदों की यह बंदरबांट बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही की सरकारों के दौरान देखने को मिल चुकी है. वहीं, अरुणाचल प्रदेश की प्रेमा खांडू सरकार में 31 संसदीय सचिव तैनात हैं, जबकि वहां विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या 60 है.

लाभ के पद मामले में सिर्फ 'आप' के विधायकों पर ही गाज क्यों गिरी

ऐसे में, चुनाव आयोग ने सिर्फ दिल्ली सरकार को ही निशाना क्यों बनाया? लाभ के पद मामले में सिर्फ 'आप' के विधायकों पर ही गाज क्यों गिरी? चुनाव आयोग ने कांग्रेस और बीजेपी को अभयदान क्यों दे रखा है? क्या ऐसा कोई कानून है कि, बीजेपी और कांग्रेस की सरकारों में तो संसदीय सचिवों की नियुक्ति जायज है, लेकिन आप की सरकार में नाजायज? क्या ऐसा कोई प्रावधान है कि, अरुणाचल प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और यहां तक कि, दिल्ली की पूर्व शीला दीक्षित सरकार में संसदीय सचिवों की नियुक्ति वैध है, लेकिन केजरीवाल सरकार में अवैध? कैसे कोई राज्य या सत्ताधारी पार्टी बदलने के साथ ही संसदीय सचिवों के औचित्य और उनकी वैधता में बदलाव आ जाता है?

अरविंद केजरीवाल

20 आप विधायकों की सदस्यता रद्द हो जाने से अरविंद केजरीवाल के विधायकों की संख्या घटकर 44 रह गई है

उम्मीद की जाती है कि, किसी दिन अलग परिस्थितियों में चुनाव आयोग इन सवालों के जवाब निष्पक्षता के साथ देगा. चुनाव आयोग से आशा की जाती है कि, वह निष्पक्ष होकर या बिना किसी पूर्वाग्रह के सबके लिए समान कानून लागू करने की अपनी जिम्मेदारी निभाए. लेकिन, जिस तरह से बिना उचित सुनवाई के आप के विधायकों को आनन-फानन में अस्पष्टता और गोपनीयता के साथ अयोग्य घोषित किया गया, उसने चुनाव आयोग पर कई सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं. खास बात यह रही कि, 'आप' के विधायकों की सदस्यता रद्द करने का फैसला उस दिन आया, जिस दिन निवर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) के कार्यकाल का आखिरी दिवस था. यानी जिस दिन वो रिटायर होने वाले थे.

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यहां मुद्दा सिर्फ चुनाव आयोग द्वारा आम आदमी पार्टी के विधायकों को अयोग्य करार दिया जाना नहीं है. बड़ा सवाल यह है कि, क्या चुनाव आयोग मौजूदा राजनीतिक समीकरणों के आधार पर कोई विशेष कानून लागू कर सकता है? उससे भी ज्यादा मौलिक सवाल यह है कि, क्या हमें लोकतंत्र की अग्रदूत कही जाने वाली संस्था यानी चुनाव आयोग से निष्पक्षता की उम्मीद नहीं करना चाहिए?

यही वजह है कि, दिल्ली में केजरीवाल सरकार की यह लड़ाई सिर्फ राजनीतिक नहीं है. प्रथम दृटया यह लड़ाई केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी सरकार द्वारा 'आप' सरकार के खिलाफ अन्यायपूर्ण व्यवहार की है. 'आप' के विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने के मुद्दे को कानून की नजर से भी देखने की जरूरत है. चुनाव आयोग के फैसले से उठे जायज सवालों का जवाब अब अदालतें ही दे सकती हैं. लेकिन अदालतों को इस मामले में तत्परता दिखानी होगी, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि, भारतीय लोकतंत्र में सभी के लिए नियम और कानून समान हैं. अब देश की अदालतें ही इस बात की गारंटी दे सकती हैं कि, समान जुर्म के लिए सभी को समान उत्साह और समान सख्ती से सजा मिले.

'आप' विधायकों की नियुक्ति को लेकर केजरीवाल की मंशा निष्कपट नहीं थी

इसमें कोई शक नहीं है कि, अपनी सरकार के मंत्रियों के सहायक के तौर पर अपने 21 विधायकों की नियुक्ति को लेकर केजरीवाल की मंशा निष्कपट नहीं थी. अपने विधायकों को संसदीय सचिव बनाकर केजरीवाल ने एक तरह से मंत्रियों के औचित्व को दरकिनार करने और संवैधानिक पद को बिगाड़ने की कोशिश की थी. एक ऐसा मुख्यमंत्री, जिसने भ्रष्ट सिस्टम की सफाई के नाम पर चुनाव जीता हो, वह अगर कानून को छलावा देने की कोशिश करे तो इसे नैतिक और वैचारिक अपराध ही माना जाएगा. इसलिए, फिलहाल केजरीवाल सरकार के लिए जो परेशानियां औेर मुसीबतें खड़ी हुई हैं, उन्हें उनके कर्मों का फल ही माना जाएगा.

AAP Office

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बने हुए लगभग 3 साल का वक्त हो चला है (फोटो: पीटीआई)

फिर भी, केजरीवाल की नैतिक और वैचारिक गलतियों को राजनीतिक रूप से समझा जा सकता है. यही वजह है कि, वह इस मामले में अपना और अयोग्य ठहराए गए अपने विधायकों का समर्थन कर रहे हैं. संसदीय सचिवों की नियुक्ति सबसे पहले केजरीवाल सरकार ने नहीं की थी. और न ही केजरीवाल के सामने पेश आ रहीं राजनीतिक और कानूनी अड़चनों ने बीजेपी को हतोत्साहित किया है. बीजेपी शासित राज्यों में संसदीय सचिवों की नियुक्ति का खेल आगे भी जारी रहेगा. यही कारण है कि, आप के विधायकों को मिली सजा बेहद कठोर, नाजायज और उतावलेपन से भरी प्रतीत हो रही है.

आदर्श रूप से, इन नियुक्तियों को अमान्य करार देने का दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला ही पर्याप्त होना चाहिए था.

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यहां समस्या यह है कि, इस मुद्दे को तूल देकर और कथित तौर पर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन कर के चुनाव आयोग ने केजरीवाल को उनकी मनोवांछित स्थिति यानी पीड़ित के तौर पर पेश कर दिया है. सामान्य परिस्थियों में केजरीवाल अगला चुनाव अपनी सरकार के कामकाज और प्रदर्शन के आधार पर लड़ते. तब, पार्टी नेताओं की आपसी कलह के चलते हो सकता है कि, उन्हें चुनाव में नुकसान उठाना पड़ता. लेकिन अब, केजरीवाल यह कह कर मैदान मारने की कोशिश करेंगे कि, उनके साथ नाइंसाफी हुई है और वह राजनीति का शिकार बने हैं. दिल्ली की जनता के सामने खुद को पीड़ित साबित कर के केजरीवाल एक बार फिर से चुनाव जीत सकते हैं.

यह बात समझ से परे है कि, दिल्ली में उपचुनाव होने से कांग्रेस और बीजेपी को क्या हासिल हो जाएगा. अपने बड़बोलपन और प्रोपेगेंडा के चलते कांग्रेस दिल्ली की रेस से बाहर हो चुकी है. अजय माकन भले ही दिल्ली में खोई अपनी जमीन को दोबारा हासिल करने के लिए उतावले नजर आ रहे हैं, लेकिन अगर चुनाव हुए तो उन्हें करारा झटका लग सकता है.

Congress-BJP

20 आप विधायकों की सदस्यता रद्द होने पर बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने अरविंद केजरीवाल से नैतिकता के आधार पर इस्तीफे की मांग की है

‘आप’ में अरुणाचल प्रदेश की तरह विद्रोह होने पर भी बीजेपी को ज्यादा फायदा नहीं 

दिल्ली में उपचुनाव से बीजपी को भी खास कुछ हासिल होने वाला नहीं है. अगर ‘आप’ में अरुणाचल प्रदेश की तरह विद्रोह भी हो जाए तो भी बीजेपी को ज्यादा फायदा नहीं होगा. उल्टा ऐसा होने से बीजेपी को नुकसान ही होगा. इसकी तीन वजहें हैं. पहली वजह यह है कि, दिल्ली के मतदाता भले ही पक्षपाती हों, लेकिन उन्हें यह समझना मुश्किल होगा कि, केजरीवाल को निशाना बनाने की कोशिश में उनपर बेवजह उपचुनाव क्यों थोप दिए गए? दूसरी वजह यह कि, उपचुनाव होने पर केजरीवाल और उनकी टीम बीजेपी के कट्टर समर्थकों और परंपरागत मतदाताओं के पास जाकर उनकी सहानुभूति पाने की भरपूर कोशिश करेगी. यह एक ऐसा फैक्टर है, जो चुनाव में निर्णायक साबित हो सकता है. तीसरी वजह यह है कि, उपचुनाव होने पर केजरीवाल एक बार फिर से भारतीय राजनीति में चर्चा का केंद्र बन सकते हैं. जिसके लिए वह अरसे से तरस रहे हैं. दरअसल पिछले साल पंजाब विधानसभा चुनाव में ‘आप’ की करारी हार के बाद से केजरीवाल लाइम लाइट से लगभग दूर हैं.

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बीजेपी उम्मीद कर रही है कि, दिल्ली में उपचुनाव होने पर पार्टी को कुछ सीटों पर जीत हासिल हो सकती है. लेकिन, इस सवाल का जवाब मिलना बेहद जरूरी है कि, तब क्या होगा अगर कोर्ट चुनाव आयोग के फैसले को पलट दे? या, अगर विक्टिम कार्ड खेलकर केजरीवाल ज्यादातर सीटें जीतने में कामयाब हो जाएं?

अगर ऐसा हुआ, तो यह बात बीजेपी और अजय माकन दोनों के सीवी पर बेहद शर्मनाक सच्चाई के तौर पर दर्ज होगी.

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