S M L

पन्नीरसेल्वम वही कर रहे हैं जो 1988 में जयललिता ने किया था- बगावत

ओपीएस कम से कम अगले हफ्ते तक राज्य के मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं.

Updated On: Feb 08, 2017 11:16 AM IST

G Pramod Kumar

0
पन्नीरसेल्वम वही कर रहे हैं जो 1988 में जयललिता ने किया था- बगावत

मंगलवार देर रात तमिलनाडु के कार्यकारी मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम (ओपीएस) ने सनसनीखेज आरोप लगाया कि उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया था. इसके साथ ही अपने पहले के रुख के उलट पैंतरा बदलते हुए पनीरसेल्वम ने वीके शशिकला के खिलाफ बगावत का मोर्चा खोल दिया है.

पार्टी पर नियंत्रण हासिल करने के बाद शशिकला सरकार को भी अपने हाथ में लेने से बस एक कदम दूर हैं.

शशिकला को बदलनी पड़ेगी रणनीति

हालांकि, पनीरसेल्वम के खुलकर मैदान में आने से शशिकला और उनके परिवार को निश्चित तौर पर अब अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा क्योंकि ओपीएस ने यह दांव मजबूत स्ट्रैटेजी और केंद्र के सपोर्ट के बगैर नहीं खेला होगा.

Tamilnadu

दलबदल कानून के तहत हो सकता है कि एआईएडीएमके में तत्काल कोई दोफाड़ न हो और ओपीएस के पास शशिकला को पछाड़ने के लिए शायद तत्काल संख्याबल न हो, लेकिन सही वक्त पर उनका बगावत का बिगुल बजाना और इसके आगे होने वाले परिणाम शशिकला की विस्तारवादी योजनाओं को फिलहाल रोकने के लिए काफी होंगे.

अब राज्यपाल की भूमिका अहम

राज्य के गवर्नर विद्यासागर राव के पास अपने विवेक का इस्तेमाल करने का मौका होगा. ओपीएस उनके इस दौरान कुछ वक्त की मांग कर सकते हैं.

ओपीएस निश्चित तौर पर गवर्नर को बताएंगे कि उन्हें इस्तीफा देने के लिए धमकाया गया. वह राज्यपाल से कहेंगे कि विधायकों का सपोर्ट अभी भी उनके साथ है. इसके आधार पर गवर्नर उनसे विधानसभा में बहुमत साबित करने का मौका दे सकते हैं. शशिकला के सरकार बनाने का अपना दावा पेश करने के बावजूद गवर्नर ओपीएस को सदन में पहले बहुमत साबित करने के लिए कह सकते हैं.

sasikala

अगले एक हफ्ते तक ओपीएस का सीएम रहना तय  

अगर राज्यपाल अपने विवेक का इस्तेमाल करते हैं और उचित नजरिए से चीजों को देखते हैं तो वह इस मामले को शशिकला के दावे बनाम ओपीएस के दावे के तौर पर देख सकते हैं. वह दोनों पक्षों से असेंबली में अपने-अपने दावे साबित करने के लिए कह सकते हैं. इस तरह की स्थिति में ओपीएस कम से कम अगले हफ्ते तक राज्य के मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला शशिकला के लिए होगा निर्णायक

तब तक उच्चतम न्यायालय एक बेहद अहम आय से अधिक संपत्ति के मामले पर अपना फैसला सुना सकता है जिसमें शशिकला सह-अभियुक्त हैं. अगर यह फैसला शशिकला के खिलाफ जाता है तो यह उनकी कहानी का अंत साबित होगा.

अपने परिवार के साथ इस वक्त पूरे राजनीतिक शो को चला रहीं शशिकला को कोई प्रॉक्सी उम्मीदवार ढूंढना पड़ेगा. ओपीएस के सामने कई अन्य संभावनाएं भी मौजूद हो सकती हैं.

भारतीय राजनीतिक ऐसी ही है. सत्ता का संतुलन सबकुछ बदल देता है.

केंद्र के सपोर्ट के बगैर ओपीएस ने नहीं चला होगा दांव

ओपीएस के दिमाग में इस वक्त चल रही सबसे प्रमुख रणनीति यही होगी क्योंकि केंद्र के बगैर सपोर्ट के उन्होंने इतना बड़ा कदम नहीं उठाया होता. राज्यपाल ने तमिलनाडु से ऐसे वक्त पर बाहर रहने का चुनाव किया जब शशिकला मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना चाहती थीं. यह पहला संकेत था कि केंद्र खुश नहीं है और सत्ता पर काबिज होने की शशिकला की कोशिशों को सफल नहीं होने देना चाहता है. राज्यपाल की गैरमौजूदगी ने ओपीएस को अपनी योजना बनाने और अमल में लाने का मौका दे दिया.

Panneerselvam

एक दिन में ही पूरा खेल बदल गया और अब शशिकला और उनके परिवार के लिए चीजें वैसी नहीं रह गई हैं जैसी उन्होंने प्लान की थीं.

शशिकला को रोकने से भी ज्यादा बड़ी कामयाबी ओपीएस के लिए मंगलवार को जनता के साथ जुड़ने और जयललिता की मौत के बाद पैदा हुए शून्य में राज्य में एक वैकल्पिक नेता के तौर पर खुद को साबित करने की रही.

लोगों का सपोर्ट ओपीएस के साथ

मरीना बीच पर जयललिता की स्मृति पर जाना और उसके बाद एक प्रेस मीट बुलाने का काम बेहद कम वक्त में किया गया, लेकिन भीड़ उनके इर्दगिर्द खुद से उमड़ पड़ी. लोग उनके साथ उनके घर ग्रीनवेज रोड तक आए और उनके समर्थन में नारे लगाते रहे.

सोशल मीडिया पर भी ओपीएस तत्काल एक हीरो के तौर पर ट्रेंड करने लगे. यह सबकुछ ठीक वैसा ही था जैसा कि कुछ हफ्तों पर राज्य में जलीकट्टू के समर्थन में उठे आंदोलन के दौरान दिखाई दिया था.

ओपीएस के इस कदम से उस संभावना का द्वार खुल गया है जिसका इंतजार लोग जयललिता की मौत के बाद से कर रहे थे. उन्होंने मौका गंवाया नहीं और अपने लिए एक भूमिका तय कर ली ताकि लोग उनके इर्दगिर्द आ सकें.

शशिकला की महत्वाकांक्षा से लोग खुश नहीं

लोग शशिकला की सत्ता की जिद को लेकर खुश नहीं हैं. विधायकों और पार्टी की पहली कतार के नेताओं को छोड़कर, शायद ही शशिकला को कहीं से सपोर्ट हासिल है. हकीकत यह है कि उनका पॉपुलर सपोर्ट शून्य है.

ओपीएस ने खुलासा किया कि जयललिता उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहती थीं और शशिकला ने उन्हें एक घटिया योजना के तहत बेदखल करने की कोशिश की है. इस खुलासे से ओपीएस ने पिछले कई दिनों से चल रही साजिशों की कहानियों की पुष्टि करने की कोशिश की है.

शशिकला के खिलाफ तीन फैक्टर

आम लोगों की नजर में ओपीएस के शब्द शशिकला के मुकाबले कहीं ज्यादा विश्वसनीय हैं. इसकी कई वजहें हैं. पहला, जयललिता ने कभी भी आम लोगों के बीच शशिकला को अपना उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया या उनके लिए कभी किसी राजनीतिक भूमिका का संकेत नहीं दिया. जयललिता ने उनकी भूमिका केवल घर पर उन्हें पार्टी मामलों में मदद देने तक सीमित रखी. उन्होंने हमेशा यह चीज कायम रखी कि शशिकला एक ऐसी शख्सियत हैं जो उनका ख्याल मां की तरह रखती हैं.

शशिकला और जयललिता

शशिकला और जयललिता

दूसरा, दो बार उन्हें जयललिता के घर से धोखे के आरोपों में बाहर निकाल दिया गया. तीसरा, शशिकला के परिवार को जयललिता ने हमेशा दूर रखा. उनके कुछ लोग जो आजकल परदे के पीछे से चालें चल रहे हैं, उन्हें जयललिता ने जेल में डाल दिया था.

जयललिता के वफादार रहे ओपीएस

इसके मुकाबले ओपीएस हमेशा से जयललिता के खास व्यक्ति रहे हैं. दो बार जब जयललिता को कानूनी वजहों से सत्ता छोड़नी पड़ी, उस वक्त ओपीएस उनके वफादार के तौर पर खड़े रहे. जयललिता ने हमेशा उनकी तारीफ की. शशिकला और उनके सपोर्टर्स जितनी ओपीएस की बुराई करेंगे, उतना ही ओपीएस का कद ऊंचा उठेगा.

हालांकि, ओपीएस के हमले के जवाब में शशिकला ने दावा किया है कि सभी एमएलए उनके साथ हैं और पार्टी में कोई संकट नहीं है, लेकिन पार्टी में पनीरसेल्वम के सपोर्टर्स की भी कमी नहीं है. इनमें राज्यसभा मेंबर डॉ मैत्रियन भी शामिल हैं जो कि शशिकला के खिलाफ सबसे पहले आवाज उठाने वालों में रहे हैं. मैत्रियन ने मरीना शो के बाद ओपीएस से मुलाकात भी की. शुरुआत में निश्चित तौर पर उन्हें कुछ सपोर्ट मिलेगा और अगर शशिकला के खिलाफ माहौल जोर पकड़ता है, खासतौर पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश अगर उनके खिलाफ आता है, तो और ज्यादा लोग पाला बदलकर ओपीएस के साथ आ सकते हैं.

शशिकला के लिए रास्ता आसान नहीं

यहां तक कि अगर शशिकला इस अचानक हुए हमले और आय से अधिक संपत्ति वाले मामले से उबर भी जाती हैं तब भी उनके लिए आगे का रास्ता वाकई मुश्किल भरा होगा. आम लोगों का समर्थन उनके साथ दिखाई नहीं देता. साथ ही उनके परिवार की मौजूदगी को 1996 में जयललिता के पहले कार्यकाल के बाद उनकी मुश्किलों के लिए बड़े तौर पर जिम्मेदार माना जाता है. इससे भी लोग उनसे दूर होंगे.

ओपीएस के खुलासे से शशिकला और उनके परिवार के लिए हालात मुश्किल ही होंगे और चुनाव जीतना उनके लिए आसान नहीं होगा. भले ही वह दक्षिणी इलाके में दबदबे वाले थेवर समुदाय से आती हैं, इसके बावजूद उनके लिए वोट हासिल करना आसान नहीं होगा. ओपीएस भी थेवर हैं और ऐसे में वह भी जाति कार्ड खेल सकते हैं.

ओपीएस ने संकल्प लिया है कि वह इस लड़ाई को जारी रखेंगे भले ही वह इसमें अकेले क्यों न रह जाएं. अगर काडर और पार्टी के अधिकारी उनके साथ हैं तो यह शशिकला के लिए एक बुरी खबर है क्योंकि आम लोगों का रुझान तेजी से ओपीएस के पक्ष में बनना शुरू हो गया है.

एमजीआर के बाद के इतिहास की पुनरावृत्ति

तमिलनाडु में ठीक वैसे ही हालात पैदा हो रहे हैं जैसे 1987 में एमजीआर की मौत के बाद थे. उस वक्त एमजीआर की पत्नी वीएन जानकी को एआईएडीएमके के ज्यादातर विधायकों का समर्थन हासिल था. 1988 में एक महीने बाद जब उन्होंने असेंबली में विश्वास मत साबित करना चाहा तो जया धड़े के 33 विधायक गैरहाजिर हो गए और इन्हें स्पीकर पीएच पांडियन ने अयोग्य ठहरा दिया. इसके पहले वह डीएमके के 10 एमएलएको अयोग्य ठहरा चुके थे. बदले हुए गणित में जानकी आसानी से विश्वास मत जीत गईं. लेकिन, राजीव गांधी ने विधानसभा में अव्यवस्था का हवाला देकर उन्हें बर्खास्त कर दिया.

अपने प्रशंसकों के बीच अम्मा के नाम से मशहूर जयललिता का जन्म 24 फरवरी 1948 को हुआ था.

इसके बाद हुए चुनावों में डीएमके जीती, लेकिन उसे भी बर्खास्त कर दिया गया. 1991 में जयललिता पहली बार सत्ता में आईं. राजीव गांधी की हत्या से पैदा हुई सहानुभूति लहर का उन्हें फायदा मिला. शायद ओपीएस भी अपने संरक्षक की तपकर सोना बनने की सीख पर आगे चलना चाहते हैं. अगर तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी जयललिता के पक्षधर थे, तो आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ओपीएस के पक्षधर हैं. मीडिया रिपोर्ट्स में इस तरह के संकेत दिए गए हैं.

कांग्रेस के सबक दोहरा रही बीजेपी

1988 में एक लीडर की पराजय पर दूसरे का साम्राज्य खड़ा होना था. क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है? क्या केंद्र और बीजेपी कांग्रेस की किताब से सबक ले रहे हैं? यह महज संयोग ही है कि 1988 में जानकी की जीत सुनिश्चित करने वाले पीएच पांडियन ने इस बार अपना साथ ओपीएस को दिया है. वह भी अपनी मूल्यवान सलाह ओपीएस को दे सकते हैं.

अब नतीजा चाहे जो भी हो, मगर एक चीज तय है. तमिलनाडु को ओपीएस के रूप में एक नया राजनीतिक सितारा मिल गया है. राज्य के लोगों ने उन्हें पसंद करना शुरू कर दिया है. आने वाले दिनों में कई फिल्मी सितारे और मशहूर शख्सियतें उनकी तारीफ करेंगी. तमिलनाडु में पब्लिक सेंटीमेंट इसी तरह काम करता है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi