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उत्तर प्रदेश: सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बाद उदास हो गए पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगले

उत्तर प्रदेश की सियासत के सिरमौर रहे 6 पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास से बेदखली का फरमान राजधानी में चर्चा का विषय बना हुआ है.

Updated On: May 07, 2018 09:35 PM IST

Y.S. Murari

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उत्तर प्रदेश: सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बाद उदास हो गए पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगले
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उत्तर प्रदेश की सियासत के सिरमौर रहे 6 पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास से बेदखली का फरमान राजधानी में चर्चा का विषय बना हुआ है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की जहां एक ओर आम लोग सराहना कर रहे हैं, वहीं सियासतदानों खासकर पूर्व मुख्यमंत्रियों के समर्थकों के लिए यह फैसला किसी सदमे से कम नहीं है. इस सदमे का असर उन बंगलों की चहारदीवारियों के भीतर भी साफ देखा जा सकता है, जहां मौजूद लोगबाग कोई भी टिप्पणी करने से कतरा रहे हैं.

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने आज स्वयंसेवी संस्था लोक प्रहरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों के सरकारी आवासों को लेकर बड़ा फैसला लिया है. सुप्रीमकोर्ट ने कहा है कि प्रदेश के सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को अपने आवंटित आवासों को खाली करना होगा. इस महत्त्वपूर्ण फैसले की जद में समाजवादी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव, वर्तमान केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती, पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी, राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव आ रहे हैं.

RAJNATH SINGH

मालूम हो कि मुलायम सिंह यादव को 5-विक्रमादित्य मार्ग, राजनाथ सिंह को 4-कालीदास मार्ग, कल्याण सिंह को 2-माल एवन्यू, मायावती को 13-ए, माल एवन्यू और अखिलेश यादव को 4-विक्रमादित्य मार्ग स्थित सरकारी आवास आवंटित हैं.

भूतपूर्व मुख्यमंत्री निवास स्थान आवंटन नियमावली 1997 में तीन संशोधान किए गए. उस नियामवली के प्रावधानों के मुताबिक भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों को उनके पूरे जीवनकाल भर के लिए सरकारी आवास की सुविधा प्रदान की गई है. इस सुविधा के तहत उन्हें राज्य सम्पत्ति विभाग द्वारा निर्धारित भवन टाइप 6 और 7 दिए जाने का प्रावधान है. स्वयंसेवी संस्था लोक प्रहरी के कर्ताधर्ता एस.एन. शुक्ला ने इस सरकारी आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीमकोर्ट में याचिका दायर की थी.

इस याचिका पर नवम्बर, 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने आपनी सुनवाई पूरी की. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को के अपने फैसले में यह साफ किया कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को जीवन भर सरकारी आवास में रहने का कोई औचित्य और अधिकार नहीं है.

यहां पर इस बात का भी जिक्र जरूरी है कि पूर्व मुख्यमंत्रियों की मृत्यु उपरान्त उनके परिजन अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए उसी आवास को ट्रस्ट के रूप में आवंटित करा लेते हैं. पूर्व मुख्यमंत्री राम प्रकाश गुप्ता का आवास इसका उदाहरण है. पूर्व मुख्यमंत्री राम नरेश यादव की मृत्यु के बाद भी उनके परिजन अभी भी उसी आवास में रह रहे हैं.

जहां तक सुप्रीम कोर्ट के सोमवार के फैसले का असर देखा जाए तो यह सब कुछ वर्तमान मुख्यमंत्री की मंशानुरूप ही माना जा रहा है, क्योंकि योगी के मुख्यमंत्री के शपथ लेने के बाद भी यह बात उठी थी कि योगी पूर्व मुख्यमंत्रियों से उनके बंगले खाली करवाएंगे. मामला सुप्रीम कोर्ट में था, सो उन्होंने खामोशी अख्तियार रखी थी. अब तो सुप्रीम कोर्ट का अनुपालन योगी सरकार का दायित्त्व भी बनता है.

MAYAVATI

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर इन आवासों में रह रहे अतःवासी कुछ भी कहने को तैयार नहीं हैं. राजनीति में सक्रिय पूर्व मुख्यमंत्रियों के आवासों पर चहल-पहल तो है, लेकिन लोगों के मन में यह आशंका मौजूद है कि यह आशियाना भी छिन जाएगा.

इस बात को लेकर उनमें मायूसी है. बी-7 निरालानगर स्थित लोक प्रहरी के कार्यालय में कोई उपयुक्त टिप्पणी देने वाला नहीं मिला. लोक प्रहरी के मुख्य कर्ताधर्ता एस.एन. शुक्ला केस के सिलसिले में दिल्ली में ही मौजूद हैं.

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