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अपने अविश्वास प्रस्ताव की रणनीति में फेल रहा विपक्ष, 2019 का एजेंडा भी साफ नहीं

ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस प्रस्ताव पर बहस ने भी वो तस्वीर साफ नहीं की जिसके आधार पर 2019 का चुनाव मोदी बनाम मोदी विरोधियों के बीच लड़ा जाएगा

Updated On: Jul 21, 2018 03:47 PM IST

Aakar Patel

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अपने अविश्वास प्रस्ताव की रणनीति में फेल रहा विपक्ष, 2019 का एजेंडा भी साफ नहीं

विपक्ष का लाया गया अविश्वास प्रस्ताव 325 के मुकाबले 126 से वोटों से गिर गया. निश्चित रुप से इन आंकड़ों को देखकर नहीं बताया जा सकता है कि कौन- कौन से मुद्दे पर कौन किस पर भारी पड़ा लेकिन वोटों के इन आंकड़ों पर किसी को आश्चर्य तो बिल्कुल भी नहीं हुआ. यह परिणाम संभावित था. शिवसेना के मतदान में हिस्सा नहीं लेने के फैसले को अगर छोड़ दें तो शायद ही सदन के अंदर कोई ऐसी बात होगी जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में नहीं गई होगी. हम लोग शिवसेना के मकसद की बात आगे करेंगे.

विपक्ष के आरोपों में धार का अभाव

वैसे विपक्ष के द्वारा लाए गए इस अविश्वास प्रस्ताव का मुख्य मकसद था क्या? दरअसल इस कवायद के तहत विपक्ष 2019 के लोकसभा चुनावों के कैंपेन की नींव रखना चाहता था. लेकिन क्या विपक्ष का यह प्रयास सफल रहा? इसको हमलोग समझने की कोशिश करते हैं.

अगर इस अविश्वास प्रस्ताव का मकसद इस मौके का इस्तेमाल सरकार पर ऐसा अचूक और तीखा हमला करना था जिसके साथ आम लोग भी अपने आप को जोड़ सकें तो विपक्ष शायद इस मौके को ठीक से भुना नहीं पाया. दोनों तरफ से कोई नई जानकारी देश की जनता के सामने नहीं रखी गई. सभी मामले पुराने थे और उनको सदन में उठाने का तरीका भी पहले जैसा ही था. कहने का मतलब यह कि विपक्ष ने सरकार पर आरोप तो लगाए लेकिन उसमें धार का अभाव था. मोदी के लिए यह बिल्कुल मुश्किल नहीं था क्योंकि वो इस तरह के मामले पिछले 6 वर्षों से सफलतापूर्वक संभालते आ रहे हैं. मौका विपक्ष के लिए था उसे कुछ रचनात्मकता दिखा कर चीजों को नए तरीके से लोगों के सामने रखना चाहिए था लेकिन वो ऐसा करने में विफल रहा.

6 साल और उससे कुछ पहले इंडिया अगेंस्ट करप्शन मूवमेंट और उसके बाद निर्भया मामले ने लोगों को सरकार की नीतियों के खिलाफ एकजुट कर दिया था. उस समय की सरकार भ्रष्ट और नाकारा थी और अपने लोगों की सुरक्षा करने में नाकाम साबित हो रही था. उस समय सरकार केवल कुछ लोगों के लिए काम कर रही थी. मोदी ने इस दौरान अपने को उभारा और मजबूती से अपनी बात रख कर लोगों के दिलों पर छा गए. उस समय के मोदी और अभी के मोदी में कम से कम थोड़ा सा तो बदलाव अवश्य हुआ है. अगर राजनीति भ्रष्ट हो रही है तो उन्होंने उसको संभालने और बदलने का प्रयास किया. अगर राजनीति वंशवाद की ओर झुक रही थी तो उसे उन्होंने ध्वस्त करने की कोशिश की. अगर सिस्टम कमजोर है और आतंकवाद और पाकिस्तान के खिलाफ लचर है तो उसे वो अपने व्यक्तित्व की ताकत से बदलने का प्रयास कर रहे हैं.

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विपक्ष को इस बहस का इस्तेमाल करना चाहिए था

इसमें बहुत कुछ दिखावा है क्योंकि एक व्यक्ति पूरे देश को किसी तरह से नहीं बदल सकता. खास कर के भारत जैसे विशाल और विविधताओं भरे देश में तो यह और भी मुश्किल है. लेकिन अगर इस कहानी में थोड़ा बदलाव हुआ है.

हमारे देश में प्रेस (मीडिया) साधारणतया गहराई से पार्लियामेंट कवरेज नहीं करता है. जबकि ब्रिटेन में ऐसा नहीं है, वहां पर बेहद संजीदगी के साथ संसद की कवरेज होती है. ब्रिटेन में पार्लियामेंट की रुप-रेखा को प्रस्तुत किए जाने की परंपरा रही है. इसके तहत अखबार का रिपोर्टर सदन के अंदर घटने वाली घटनाओं की रिपोर्टिंग राजनीतिज्ञों के व्यक्तित्व के आधार पर करता है. इस तरह की रिपोर्टिंग शानदार और रंगीन होती है जिसे पाठक भी रस लेकर पढ़ता है. लेकिन भारतीय पाठकों को यह सब हमेशा नसीब नहीं होता है क्योंकि जब संसद चल रही होती है तो उसमें शोर-शराबा ज्यादा होता है. उन दिनों जब संसद चल रही होती है, जैसा कि विश्वास मत के दौरान हुआ, तब इस तरह के मौके का इस्तेमाल किया जाना चाहिए था जो कि हो न सका.

राहुल के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गले लगने के अलावा मीडिया पक्ष-विपक्ष के डिबेट से कुछ भी खास निकालने में सफल नहीं रहा. राहुल गांधी के अचानक आकर गले लग जाने ने मोदी को चौंका दिया क्योंकि इसकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी. मोदी इस तरह के शारीरिक संपर्क से अछूते रहे हैं जिसमें पहल उनकी तरफ से न की गई हो. इस एपिसोड ने अप्रत्याशित रूप से यह बता दिया है कि मोदी नॉन स्क्रिप्टेड इंगेजमेंट्स में कमजोर हैं.

विपक्ष को साफ नजरिए की जरूरत

नए तरीके से मुद्दे पेश करने के अलावा भी विपक्ष के पास बहुत कुछ था जिसे वो संसद में धारदार तरीके से सामने रख सकता था. लेकिन उसके लिए सबसे पहले विपक्ष को एक ऐसे धागे का निर्माण करना था जिसमें आपसी विरोधों के बाद भी बीजेपी विरोधी सभी दल आकर उसमें जुड़ जाएं. लेकिन इस वक्त ऐसा लग नहीं रहा कि वो किसी भी तरह से एक-दूसरे से जुड़ने के लिए तैयार हैं. विचारधारा और महत्वाकांक्षा उन्हें आपसे में जोड़ने में सबसे बड़ी बाधक है.

इसके लिए एक स्पष्ट नजरिए की आवश्यकता है. एक ऐसा नजरिया जो कि अस्पष्ट और खुला हुआ भी है तो उसे काव्यात्मक और आकर्षक तरीके से पेश किया जाए. यही वो चीज है जो कि मंजे हुए राजनेता अक्सर करने में सफल रहते हैं. 2014 में निश्चित रुप से नरेंद्र मोदी इसको करने में सफल रहे थे.

अगर 2019 चुनावों की मुख्य थीम मोदी बनाम मोदी विरोध की रहेगी और मोदी के खिलाफ मोदी विरोधी गठबंधन पूरे देश में उन्हें चुनौती देगा तो इसके लिए विपक्षी पार्टियों को अभी से तैयारी करनी पड़ेगी.

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दूसरी तरफ बीजेपी गठबंधनों को लेकर हमेशा से सहज नहीं रही है. गठबंधन करने और बनाने में बीजेपी बहुत अच्छी नहीं है और वो इस तथ्य को मानती भी है. बीजेपी अपने गठबंधन के सहयोगियों से सामने झुकना पसंद नहीं करती है जब भी उसके सहयोगी हठपूर्वक किसी बात पर अड़ जाते हैं. मैंने देखा है कि बीजेपी और शिवसेना महाराष्ट्र में 1995 में चुनाव जीतने का बाद से किस तरह से लागातर गठबंधन में रहे हैं.

2019 का एजेंडा साफ होना चाहिए था

लेकिन उस समय से ही जब भी चुनाव का समय आता है शिवसेना अपने सहयोगी बीजेपी से उसी तरह से व्यवहार करती आई है जैसा वो अभी कर रही है. चुनाव से पहले वो हमेशा अकेले चुनाव लड़ने की धमकी देती है. वो बीजेपी को भला-बुरा कहने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती. इस दौरान बीजेपी और उसके नेतागण चुप्पी साध लेते हैं. आखिर में चुनाव की तारीख नजदीक आते ही शिवसेना के तेवर ढीले पड़ जाते हैं और उसे समझ में आ जाता है कि उसका भला इसी में है कि वो बीजेपी से गठबंधन कर ले. तो चुनाव दर चुनाव बीजेपी के खिलाफ आग उगलने और लाख आलोचना करने के बाद भी अंत में शिवसेना, चुनाव में उतरती बीजेपी के साथ ही है. ऐसा पहले भी हुआ है और इस बात की पूरी संभावना है कि 2019 में भी ऐसा ही होगा.

यह अभी निश्चित नहीं है कि क्या 2019 चुनावों से पहले हमारे देश कि राजनीति में इस तरह से आमने-सामने वाद विवाद का मौका आएगा कि नहीं क्योंकि हमारे देश में उम्मीदवारों के बीच टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले आमने-सामने के डिबेट के होने की परंपरा नहीं रही है. ऐसे में अब यह उम्मीद नहीं है कि प्रधानमंत्री और उनकी कुर्सी की ख्वाहिश रखने वालों के बीच आमने-सामने का मुकाबला 2019 के चुनावों से पहले एक बार फिर देखने को मिलेगा. हमारे लिए अविश्वास प्रस्ताव बहुत महत्वपूर्ण था लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस प्रस्ताव पर बहस ने भी वो तस्वीर साफ नहीं की जिसके आधार पर 2019 का चुनाव मोदी बनाम मोदी विरोधियों के बीच लड़ा जाएगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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