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अविश्वास प्रस्ताव: मॉनसून सत्र की 'बारिश' नहीं झेल सकी हैं कई सरकारें

इतिहास में मॉनसून सत्र में कई बार ऐसे अविश्वास प्रस्ताव पेश हुए हैं, जिससे निपटने में सरकारों की हालत खस्ता हो गई थी

Updated On: Jul 20, 2018 07:21 AM IST

FP Staff

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अविश्वास प्रस्ताव: मॉनसून सत्र की 'बारिश' नहीं झेल सकी हैं कई सरकारें

संसद में 27वीं बार अविश्वास प्रस्ताव पर बहस होने वाली है. यह पहली बार नहीं है कि मॉनसून सत्र में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस होगी. लोकसभा में पेश पहला अविश्वास प्रस्ताव भी मॉनसून सत्र में ही पेश किया गया था. संसदीय इतिहास में पहली बार अगस्त, 1963 में आचार्य जेबी कृपलानी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया था. यह अविश्वास प्रस्ताव भारत-चीन युद्ध में भारत की हार की वजह से कृपलानी ने पेश किया था. हालांकि यह प्रस्ताव भारी अंतर से गिर गया. इस प्रस्ताव के पक्ष में केवल 62 वोट पड़े और विरोध में 347 वोट. भले नेहरू की सरकार अविश्वास प्रस्ताव में पास हो गई थी लेकिन चीन युद्ध में पराजय से नेहरू की छवि को काफी नुकसान पहुंचा था और समाजवादियों ने इस अविश्वास प्रस्ताव को नेहरू की मजबूत छवि को तोड़ने के लिए लाया था.

वैसे यह लग रहा है कि इस बार के मॉनसून सत्र में मोदी सरकार आसानी से अविश्वास प्रस्ताव का सामना कर लेगी और कोई चमत्कार ही विपक्ष के इस अविश्वास प्रस्ताव को पास करवा सकता है. लेकिन इतिहास में मॉनसून सत्र में कई बार ऐसे अविश्वास प्रस्ताव पेश हुए हैं, जिससे निपटने में सरकारों की हालत खस्ता हो गई थी.

जुलाई, 1979 में कांग्रेस नेता वाई बी चाह्वाण ने मोरारजी देसाई के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया तो राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए बिना वोटिंग करवाए मोरारजी देसाई को इस्तीफा देना पड़ा. भारत के संसदीय इतिहास में यह पहला (और अब तक का एकमात्र) मौका था जब अविश्वास प्रस्ताव की वजह से किसी प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा.

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इसी तरह की स्थिति 1993 में होते-होते बची. तब जुलाई, 1993 में मॉनसून सत्र के दौरान सीपीआई के नेता अजय मुखोपाध्याय ने नरसिम्हा राव सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया था. यह अविश्वास प्रस्ताव महज 14 वोटों के करीबी अंतर से गिर गया था और नरसिम्हा राव की सरकार पर सांसदों के खरीद-फरोख्त के आरोप लगे थे.

राजस्थान के कोटा से छपने वाले एक स्थानीय अखबार ने 1994 में यह खबर छापी की इस मामले में झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को सरकार के पक्ष में वोट करने करने के लिए रिश्वत दी गई थी. इसके बाद इस मामले को लेकर राष्ट्रीय राजनीति गरमा गई और राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा ने इसकी सीबीआई जांच की मांग की. इस मांग को लेकर राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की.

जून 1996 में झारखंड मुक्ति मोर्चा के पूर्व सांसद शैलेंद्र महतो ने यह स्वीकार किया कि अविश्वास प्रस्ताव के विरोध में और सरकार के पक्ष में वोट करने के लिए उन्हें और कई सांसदों के रिश्वत दी गई थी. सीबीआई ने अपनी जांच में पीवी नरसिम्हा राव समेत कई सांसदों का नाम चार्जशीट में डाला था. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की धारा 105 (2) का हवाला देते हुए यह फैसला सुनाया था कि संसद में सांसदों द्वारा की कार्यवाही के चलते उनपर कोई आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. इसकी वजह से जिन सांसदों के ऊपर इस केस में रिश्वत लेकर अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ मतदान करने का आरोप था वो खारिज हो गया.

लेकिन पीवी नरसिम्हा राव और बूटा सिंह के खिलाफ मुकदमा चला और निचली अदालत ने सन् 2000 में पीवी नरसिम्हा राव और बूटा सिंह को इस मामले में दोषी ठहराते हुए 3 साल के जेल की सजा सुनाई थी. जिसे राव और बूटा सिंह ने दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. बाद में सन् 2002 में दिल्ली हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए दोनों को निर्दोष करार दिया.

यह भी एक तथ्य है कि आखिरी बार जो अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था वो भी मॉनसून सत्र के दौरान ही लाया गया था. आखिरी बार अगस्त 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था और वाजपेयी सरकार के खिलाफ लाए गए इस अविश्वास प्रस्ताव में विपक्ष को भारी हार सामना करना पड़ा था.

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