S M L

1963 में नेहरू ने भी झेला था अविश्वास प्रस्ताव का दंश, मौका था भारत-चीन युद्ध

देश के इतिहास में पहली बार 1963 में आचार्य कृपलानी ने लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव आगे बढ़ाया था. मौका था 1962 में भारत-चीन युद्ध में भारत की करारी हार का. तब प्रधानमंत्री थे पंडित जवाहर लाल नेहरू

Updated On: Jul 19, 2018 05:12 PM IST

FP Staff

0
1963 में नेहरू ने भी झेला था अविश्वास प्रस्ताव का दंश, मौका था भारत-चीन युद्ध

केंद्र की मोदी सरकार पर अविश्वास प्रस्ताव की तलवार लटक रही है. कांग्रेस और टीडीपी सहित कई छोटे-बड़े दलों ने सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया है जिसपर शुक्रवार को मतदान होगा. सरकार जहां दमखम के साथ कह रही है कि उसे विपक्ष के 'अविश्वास' की जरा भी परवाह नहीं, तो दूसरी ओर कांग्रेस को लग रहा है कि सरकार के खिलाफ उसके पास अच्छी-खासी संख्या है.

बात आगे बढ़े उससे पहले यह जान लेना जरूरी है कि अविश्वास प्रस्ताव क्या है और इससे पहले भारत में कब-कब लाया गया. यहां यह भी जान लेना चाहिए कि अविश्वास प्रस्ताव की पूरी प्रणाली क्या है जिस पर किसी सरकार की बुनियाद टिकी है.

क्या है अविश्वास प्रस्ताव?

भारत जैसे देश में अविश्वास प्रस्ताव सिर्फ और सिर्फ लोकसभा (संसद का निचला सदन) में लाया जा सकता है. प्रस्ताव पर चर्चा का नियम यह है कि इसे कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन प्राप्त होना चाहिए. अगर प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो सदन इस पर चर्चा करता है और फिर उसपर मतदान का विधान है. अगर सदन के बहुमत सदस्य प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करते हैं तो यह प्रस्ताव पारित माना जाता है. फिर सरकार को सत्ता छोड़नी पड़ती है.

इससे पहले कब आया यह प्रस्ताव?

देश के इतिहास में सबसे पहली बार 1963 में आचार्य कृपलानी ने लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव आगे बढ़ाया था. मौका था 1962 में भारत-चीन युद्ध में भारत की करारी हार का. तब प्रधानमंत्री थे पंडित जवाहर लाल नेहरू.

अब तक के आंकड़ों पर गौर करें तो जुलाई 2018 तक भारत में 27 अविश्वास प्रस्ताव लाए जा चुके हैं. तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सबसे ज्यादा अविश्वास प्रस्ताव झेला और यह संख्या 15 है. उसके बाद नंबर आता है लाल बहादुर शास्त्री (3), नरसिम्हा राव (3), मोरारजी देसाई (2), जवाहर लाल नेहरू, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी (1 अविश्वास प्रस्ताव). हालांकि ये सभी प्रस्ताव सदन में धराशायी हो गए. अपवाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सरकार रही. 12 जुलाई 1979 को चर्चा के दौरान देसाई ने इस्तीफा दे दिया था.

तब नेहरू को झेलनी पड़ी थी शर्मिंदगी

1963 में नेहरू सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था. चीन के हाथों युद्ध में करारी हार ने अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में उनकी किरकिरी कराई तो घरेलू स्तर पर अविश्वास प्रस्ताव ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा. भारत के इतिहास में यह पहला मौका था जब किसी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था. नीतियों के कई मोर्चों पर नाकामी को लेकर नेताओं ने नेहरू को संसद से लेकर बाहर तक घेरा. नतीजा यह रहा कि विरोध करने वाले छह मंत्रियों को नेहरू के दबाव में इस्तीफा देना पड़ा. उस वक्त मामला भले लीपापोती कर संभाल लिया गया लेकिन कांग्रेस के भविष्य पर एक बदनुमा दाग हमेशा-हमेशा के लिए लग गया.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
#MeToo पर Neha Dhupia

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi