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जब एक वोट से गिर गई थी पीएम मोदी के मार्ग दर्शक वाजपेयी की सरकार

मोदी सरकार के खिलाफ लाए गए टीडीपी के अविश्वास प्रस्ताव पर शुक्रवार को चर्चा होनी है लेकिन एक बार मोदी के मार्ग दर्शक रहे वाजपेयी की सरकार 1999 में मात्र एक वोट से विश्वास मत हार गई थी

Updated On: Jul 19, 2018 07:47 PM IST

FP Staff

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जब एक वोट से गिर गई थी पीएम मोदी के मार्ग दर्शक वाजपेयी की सरकार

1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने विश्वास मत पेश किया था लेकिन वाजपेयी सरकार मात्र एक वोट के कारण गिर गई थी. अब एक बार फिर वैसी ही स्थिति है लेकिन विश्वास मत की जगह मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है. हालांकि उनके मार्ग दर्शक वाजपेयी की सरकार भले ही इस कारण गिर गई हो लेकिन मोदी के पास पर्याप्त नंबर है जिस कारण उन्हें इसको लेकर कोई दिक्कत नहीं होने वाली.

मोदी सरकार के खिलाफ टीडीपी अविश्वास प्रस्ताव लेकर आई है. 1999 में तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने अपनी पार्टी को एनडीए से अलग कर लिया था और वाजपेयी सरकार विश्वास मत साबित करने के लिए मजबूर हो गई थी.

इससे पहले इस तरह के प्रस्ताव पर आखिरी बार 2008 में चर्चा हुई थी. अमेरिका से हो रहे परमाणु समझौते को लेकर सीपीएम ने तत्कालीन यूपीए सरकार को छोड़ने का फैसला कर लिया था. इसी कारण यूपीए सरकार बहुमत साबित करने के लिए विश्वास मत लेकर आई और जीती भी.

जब मात्र एक वोट से गिर गई थी वाजपेयी सरकार

आखिरी बार अविश्वास प्रस्ताव 2003 में सोनिया गांधी, एनडीए की वाजपेयी सरकार के खिलाफ लेकर आई थीं. इस प्रस्ताव के खिलाफ 314 और पक्ष में 189 मत पड़े थे और वाजपेयी सरकार पर इसका कोई असर नहीं हुआ.

आजादी के बाद पहले दो लोकसभा में कोई अविश्वास प्रस्ताव पेश नहीं हुआ. पहली बार 1963 में कृपलानी ने जवाहर लाल नेहरू सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था. इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ 15 बार अविश्वास प्रस्ताव पेश हुआ. लेकिन इन सबमें सबसे चर्चित रहा 1999 में वाजपेयी सरकार का गिर जाना.

17 अप्रैल, 1999 को वाजपेयी सरकार मात्र एक वोट के अंतर से विश्वास मत साबित नहीं कर पाई थी. यह अबतक की सबसे कम अंतर की हार थी. सरकार के साथ रहे नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद सैफुद्दीन सोज ने बगावत कर एनडीए के खिलाफ वोट कर दिया था.

इसके अलावा दो महीने से ओडिशा के मुख्यमंत्री रहे गिरधर गमांग ने सदन में आकर सरकार के खिलाफ वोट किया था. गमांग मुख्यमंत्री बन गए थे लेकिन उस समय वह विधायक नहीं थे और लोकसभा के सदस्य थे. मुख्यमंत्री बनने के दो महीने बाद भी उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा नहीं दिया था. नियम के मुताबिक मुख्यमंत्री बनने के 6 महीने के भीतर आपको विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य होना अनिवार्य होता है.

अविश्वास प्रस्ताव और विश्वास मत में अंतर

अविश्वास प्रस्ताव और विश्वास मत में अंतर होता है. अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष द्वारा लाया जाता है जबकि मत प्रस्ताव सरकार द्वारा अपने बहुमत को साबित करने के लिए. यह दो स्थितियों में सरकार द्वारा लाया जाता है, पहली स्थिति में सरकार के गठन के वक्त और दूसरी स्थिति में राष्ट्रपति के कहने पर. अब तक राष्ट्रपति के दिशा-निर्देश पर 11 बार विश्वास मत पेश किए जा चुके हैं. जिसमें से 6 बार सरकारें सफल हुई हैं और 5 बार असफल.

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