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अविश्वास प्रस्ताव और विश्वास मत पर कब-कब गिरी हैं सरकारें, जानिए पूरी कहानी

केंद्र सरकार के खिलाफ कई बार अविश्वास प्रस्ताव लाए गए हैं लेकिन सरकार मात्र एक बार ही गिरी है हालांकि विश्वास मत पर कई बार सरकारें गिर चुकी हैं

Updated On: Jul 19, 2018 05:40 PM IST

FP Staff

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अविश्वास प्रस्ताव और विश्वास मत पर कब-कब गिरी हैं सरकारें, जानिए पूरी कहानी

तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आई है. बुधवार को लोकसभा में लाए गए इस प्रस्ताव को स्पीकर सुमित्रा महाजन ने स्वीकार कर लिया. शुक्रवार को अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के बाद वोटिंग कराई जाएगी. केंद्र की मोदी सरकार अविश्वास प्रस्ताव को लेकर आश्वस्त है. हालांकि केंद्र सरकार के खिलाफ कई बार अविश्वास प्रस्ताव लाए गए हैं लेकिन सरकार मात्र एक बार ही गिरी है.

अविश्वास प्रस्ताव पर भले ही एक बार सरकार गिरी हो लेकिन विश्वास मत पर कई बार सरकारें गिर चुकी हैं. पहली बार ऐसा मोरारजी देसाई के साथ हुआ था. उस समय वह बहुमत साबित नहीं कर पाए थे. इसके बाद यह सिलसिला वीपी सिंह, एचडी देवगौड़ा, आईके गुजराल और अटल बिहारी वाजपेयी तक चलता रहा.

पहली बार गिरी थी मोरारजी देसाई सरकार

1977 के चुनाव में मिली जीत के बाद जनता पार्टी की सरकार बनी थी. यह पहला मौका था जब केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकार सत्ता में थी. मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने थे. हालांकि उनके पद संभालने के कुछ महीनों बाद ही जनता पार्टी में उठापटक शुरू हो गई. चूंकि ये सरकार कई दलों को मिलाकर बनाई गई थी. लिहाजा असंतोष का दौर जल्द ही शुरू हो गया.

मोराराजी सरकार के खिलाफ कुल मिलाकर दो बार अविश्वास प्रस्ताव आए. पहला अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने में उनकी सरकार को कोई दिक्कत नहीं हुई. लेकिन दूसरे अविश्वास प्रस्ताव पर जनता पार्टी का असंतोष चरम पर था. ये प्रस्ताव कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वाई वी चव्हाण लेकर आए थे. अपनी हार का अंदाजा लगते ही मोरारजी देसाई ने मतविभाजन से पहले ही 15 जुलाई, 1979 को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और उनकी सरकार गिर गई थी.

दूसरी बार गिरी थी वीपी सिंह सरकार

1989 के आम चुनावों में विश्वनाथ प्रताप सिंह के राष्ट्रीय मोर्चा को 146 सीटें मिलीं. वो बीजेपी (86 सांसद) और वामदलों (52 सांसद) के समर्थन से देश के सातवें प्रधानमंत्री बने. अगले ही साल उन्होंने जब मंडल कमीशन की रिपोर्ट को आंशिक तौर पर लागू किया तो उनकी सरकार के खिलाफ असंतोष शुरू हो गया. वीपी सरकार ने गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद को अपहर्ताओं के चंगुल से छुड़ाने के बदले आंतकवादियों की रिहाई का फैसला किया. इसकी बहुत आलोचना हुई. हालांकि उनकी सरकार के गिरने की वजह कुछ और थी.

सीनियर नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या में राम मंदिर बनवाने के लिए रथयात्रा शुरू की. बिहार में आडवाणी को समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया था. वीपी सिंह सरकार विश्वास प्रस्ताव पर नाकाम रही. बीजेपी ने समर्थन से हाथ खींच लिया और 10 नवम्बर 1990 वीपी सिंह की सरकार गिर गई.

तीसरी बार देवेगौड़ा सरकार नहीं झेल पाई विश्वास प्रस्ताव

वर्ष 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की सरकार उस वक्त गिर गई थी जब तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने संयुक्त मोर्चा सरकार से समर्थन खींच लिया था. इसके बाद यही हश्र आईके गुजराल सरकार का हुआ. ये दोनों सरकारें विश्वास मत पर बहुमत नहीं जुटा पाईं थीं.

एक मत से गिर गई थी अटल बिहारी सरकार

प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने दो बार विश्वास मत हासिल करने का प्रयास किया. दोनों बार वे असफल रहे. हालांकि तीसरी बार उन्होंने पूरे पांच साल राष्ट्रीय गठबंधन की सरकार चलाई. 1996 में तो उन्होंने मतविभाजन से पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया. 1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी ने सरकार बनाई तो ये 13 महीने चली. इस बार विश्वास मत पर उनकी सरकार एक वोट से गिर गई थी.

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