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नीतीश कुमार के नए 'प्यार' के पुराने किस्से बड़े संगीन हैं

नीतीश के चार सालों का गैर-संघवाद राजनीति का सफर.

FP Staff Updated On: Jul 27, 2017 04:47 PM IST

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नीतीश कुमार के नए 'प्यार' के पुराने किस्से बड़े संगीन हैं

नीतीश कुमार छठी बार बिहार के मुख्यमंत्री का पद संभाल रहे हैं वो भी बीजेपी के साथ घर वापसी करके. नीतीश कुमार का आरजेडी और कांग्रेस के साथ महागठबंधन 20 महीने में ही अपने अंत तक आ पहुंचा.

नीतीश कुमार 2013 से पहले 17 साल तक बीजेपी के साथ रहे थे लेकिन 2015 में कांग्रेस और आरजेडी के साथ महागठबंधन बनाने के बाद उन्होंने संघमुक्त भारत का नारा दे डाला. नीतीश विपक्ष के सबसे मजबूत नेता बनकर उभरे यहां तक कि दबी जुबान उन्हें पीएम मोदी का प्रतिद्वंदी भी बताया जा रहा था. लेकिन अब उन्होंने खुद जाकर मोदी का हाथ थाम लिया है.

लेकिन नीतीश के संघमुक्त नारे और विपक्षी एकता का क्या हुआ? इन चार सालों में वक्त-वक्त पर नीतीश संघ और बीजेपी पर निशाना साधते रहे हैं.

कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना

- 2011 में जब वो बीजेपी के साथ सत्ता में थे, तब उन्होंने मोदी की सद्भावना यात्रा में मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार करने पर जमकर तंज कसे थे. उन्होंने कहा था कि आपको भारत जैसा देश साथ में लेकर चलना है तो कभी टोपी पहनना होगा, तो कभी तिलक लगाना होगा.

- 2013 में बीजेपी से अलग होने के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले चली मोदी लहर को नीतीश ने विंड ब्लोअर से निकली हवा बताया था. उन्होंने कहा था कि 'ये कुदरती हवा नहीं, ब्लोअर का हवा है.' ये दूसरी बात है कि लोकसभा चुनावों में मोदी लहर ने सबको उड़ाकर रख दिया था.

- 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश-मोदी में जमकर घमासान हुआ था. दोनों बड़े नेता मैदान में एक दूसरे के आमने-सामने उतर गए थे. बिहार में रैली के दौरान मोदी ने कहा था कि नीतीश का डीएनए खराब है, इसलिए उन्होंने अपने दोस्तों को छोड़ दिया था. नीतीश ने इसे अपमान बताया और बिहार के 50 लाख लोगों को अपना डीएनए सैंपल मोदी को भेजने को कहा.

- विधानसभा चुनाव में बीजेपी को बुरी तरह हराने के बाद फिर नीतीश ने बीजेपी पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि आरएसएस बीजेपी का सुप्रीम कोर्ट है. बीजेपी कितनी भी विकास की बातें कर ले, करती वहीं है जो आरएसएस कहता है. वो विकास की बातें करते हैं लेकिन करते हैं जाति और धर्म की राजनीति.

संघमुक्त राजनीति, बीजेपी का दामन

- अभी इसी अप्रैल में पटना के एडवांटेज कॉन्क्लेव में नीतीश कुमार ने फिर संघमुक्त भारत का नारा दिया. उन्होंने कहा कि देश को संघमुक्त बनाने के लिए सभी विपक्षी पार्टियों को साथ आना होगा. उनके शब्द थे, 'अब ऐसी परिस्थिति में, आज सीधे दो धुरी होगी. बीजेपी एक तरफ और बाकी लोगों को एक साथ आना होगा. अलग-अलग होंगे तो बीजेपी सबका बुरा हाल कर देगी. एक साथ आकर ही संघमुक्त भारत बनाया जा सकता है. एक बार लोहियाजी ने गैर कांग्रेसवाद की बात की थी. अब हमें गैर-संघवाद की बात करनी होगी.'

- इसी साल फरवरी में नीतीश कुमार ने फियरलेस इन अपोजिशन पैनल डिस्कशन में विपक्षी एकता पर जोर दिया था. उन्होंने कहा था कि ये वक्त विपक्ष के एकजुट होने का है. उन्होंने बीजेपी के एजेंडे के सवाल पर कहा था कि बीजेपी क्यों एजेंडा तय करेगी? राहुल अभी विपक्ष का एजेंडा तय करें. बस विपक्ष एक बार मजबूती से खड़ी हो जाए तो फिर देखिए क्या होता है. हमें अपने एजेंडे पर 90% और दूसरों के एजेंडे पर 10% ध्यान देना चाहिए.

खैर, चार सालों तक एंटी-मोदी और एंटी-संघ की बात करते-करते आखिरकार नीतीश फिर वापस चले गए हैं बीजेपी के पास. और विपक्ष के बड़े नेताओं में से एक लालू प्रसाद यादव फिलहाल अकेले भ्रष्टाचार के आरोपों, ईडी के मामलों से जूझ रहे हैं. वहीं कांग्रेस भी बेबस नजर आ रही है. अब देखना है कि 2019 में विपक्ष गैर-संघवाद और बीजेपी के खिलाफ अपनी लड़ाई कैसे जारी रखती है.

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