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नीतीश की मजबूरी है 'मोदी के साथ नहीं लेकिन खुलकर खिलाफ नहीं'

सोमवार को नीतीश कुमार का एक बयान जहां मोदी सरकार के समर्थन में था तो दूसरा एकदम खिलाफ

Pawas Kumar Updated On: Jun 21, 2017 03:28 PM IST

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नीतीश की मजबूरी है 'मोदी के साथ नहीं लेकिन खुलकर खिलाफ नहीं'

नीतीश कुमार फिलहाल अजीब स्थिति में हैं. अंग्रेजी में इसके लिए 'कैच 22' का शब्द इस्तेमाल किया जाता है. बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश की छवि विकास को आगे बढ़ाने वाले, बिहारी अस्मिता को बुलंद करने वाले, पिछड़ों के मददगार और आम लोगों को साथ लेकर चलने वाले नेता की है. यह कहीं न कहीं केंद्र में फिलहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि के समानांतर है. यही नीतीश की सबसे बड़ी समस्या है.

नीतीश कुमार ने सोमवार को दो बड़े बयान दिए. पहले बयान में उन्होंने रामनाथ कोविंद को एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाए जाने पर खुशी जताई तो दूसरे में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को पब्लिसिटी स्टंट बताते हुए बिहार में यह दिन न मनाए जाने की बात कही. एक बयान जहां मोदी सरकार के एक फैसले के समर्थन में था तो दूसरा एकदम खिलाफ.

कोविंद का विरोध संभव नहीं

दरअसल रामनाथ कोविंद को एनडीए उम्मीदवार बनाए जाने के फैसले का विरोध करना नीतीश के लिए बेहद मुश्किल है. वह खुद बिहार के राज्यपाल के तौर पर कोविंद के काम की तारीफ कर चुके हैं. साथ ही कोविंद दलित नेता हैं. ऐसे में सुशासन पुरुष और दलितों के हितैषी के रूप में नीतीश की छवि का तकाजा यही था कि वह इस फैसले का विरोध नहीं कर सकते थे.

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लेकिन नीतीश की मजबूरी यह भी है कि वह खुलकर मोदी सरकार के किसी फैसले के साथ खड़े नहीं नजर आ सकते. नीतीश चाहते हैं कि बीजेपी के खिलाफ भविष्य में विपक्ष के किसी भी मिले-जुले प्रयास के लिए वह सर्वमान्य नेता और पीएम मोदी के विकल्प के रूप में खड़े हों. ऐसे में वह मोदी के हर फैसले के साथ खड़े नहीं दिख सकते. योग दिवस पर उनका बयान इसी मजबूरी का प्रमाण है.

नीतीश ने योग दिवस को एक पब्लिसिटी स्टंट बताकर कहा कि योग तो प्रतिदिन करने की चीज है. अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मोदी सरकार का एक ऐसा आयोजन है जिसे देश-विदेश में अपनाया जा रहा है. योग को लेकर भारत के बाहर भी कार्यक्रम हो रहे हैं. योग एक ऐसा माध्यम है जिससे सभी लोगों का फायदा है. ऐसे में इसके विरोध का कोई सीधा कारण दिखाई नहीं देता.

पहले मोदी-नीतीश रहे हैं एकमत

ऐसा पहली बार नहीं है कि नीतीश मोदी विरोध और मोदी समर्थन के इस चक्कर में फंसे हों. बिहार में शराबबंदी पर नीतीश को मोदी से समर्थन मिला था. नोटबंदी को लेकर भी नीतीश ने पहले मोदी सरकार का समर्थन ही किया था. हालांकि बाद में उन्होंने नोटबंदी को लागू किए जाने के तरीके और कालेधन को वापस लाने में मोदी सरकार की नाकामी को लेकर निशाना भी साधा.

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दरअसल, नीतीश की मोदी से इस ‘लव-हेट रिलेशनशिप’ के पीछे खुद नीतीश की महत्वाकांक्षा है. वह जानते हैं कि देश में फिलहाल जो माहौल है, उसमें मोदी का सीधा विरोध सही रणनीति नहीं है. मोदी-शाह के नेतृत्व में बीजेपी लगातार ऐसे फैसले ले रही है जिससे विपक्ष चौंक जाता है. ऐसे में नीतीश की कोशिश यही रहती है कि वह ऐसे फैसलों के पक्ष में दिखें जो जनता को पसंद आ सकते हैं. लेकिन वह सीधे मोदी के समर्थन में भी नहीं आ सकते. सो वह बीच-बीच में ऐसे बयान भी देते रहते हैं जिससे उनकी छवि मोदी के एकमात्र व्यावहारिक विकल्प के रूप में बनी रहे. वह भविष्य में पाला बदलने के अपने विकल्प भी खुले रखना चाहते होंगे.

देखना यह है कि नीतीश का 'मोदी के साथ नहीं लेकिन खुलकर खिलाफ नहीं' का दांव उन्हें कहां तक ले जाता है.

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