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निर्भया कांड: पांच सालों में न बलात्कार रुके न मानसिकता बदली

ऐसा लगने लगा है कि बलात्कार जैसे अपराध की समाज में स्वीकार्यता बढ़ रही है

Swati Arjun Swati Arjun Updated On: Dec 16, 2017 10:23 AM IST

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निर्भया कांड: पांच सालों में न बलात्कार रुके न मानसिकता बदली

आज 16 दिसंबर 2017 यानि दिल्ली के निर्भया कांड की पांचवीं बरसी है. अभी-अभी कुछ समय पहले मेरी दो दोस्तों ने फेसबुक पर अपने साथ होने वाला एक बुरा अनुभव शेयर किया, वे दोनों छुट्टियां मनाने उत्तराखंड के मुक्तेश्वर गईं थीं, जहां शाम के करीब पांच बजे जब वे ट्रैकिंग के बाद एक व्यस्त रहने वाले हाईवे से वापिस लौट रहीं थीं तब, एक स्कॉर्पियो कार में सवार पांच लड़कों ने उन्हें सुनसान सड़क देखकर पहले लिफ्ट देने की पेशकश की, फिर मना करने पर उनका पीछा किया, इतना ही नहीं- वे कार रिवर्स कर उनके पीछे आने भी लगे थे- जब इन दोनों लड़कियों ने भागकर अपनी जान बचाई. खुशकिस्मत इसलिए रहीं कि वहां दूसरी गाड़ी आ गई, जिसमें कुछ लोग सवार थे और वे लड़कियों को बदहवास देखकर उनकी मदद करने के लिए रुक गए थे.

दूसरी घटना 17 साल की ज़ायरा वसीम से जुड़ी है, जिसने दंगल जैसी सुपरहिट फिल्म में पहलवान गीता फोगाट का किरदार निभाया था. ज़ायरा ने दो दिन पहले, सोशल मीडिया में एक वीडियो शेयर किया था, जिसमें उन्होंने अपने साथ हवाई-जहाज़ में छेड़-छाड़ होने की शिकायत की थी. मेरी वो दोनों महिला दोस्तों और ज़ायरा दोनों को साथ न सिर्फ सोशल मीडिया पर सवाल जवाब किए जा रहे हैं, बल्कि शिकायत को लेकर उनकी नीयत पर शक भी किया जा रहा है. ज़ायरा का सोशल कैपिटल ज्य़ादा है इसके लिए उनके समर्थन में हज़ारों लोग खड़े हैं, लेकिन उतनी ही संख्या में उन्हें झूठा भी कहा जा रहा है. मेरी ये दोनों दोस्त सामान्य नागरिक हैं, इसलिए अपनी लड़ाई खुद लड़ रहीं थीं. बाद में थक जाने पर वे फेसबुक छोड़कर चली गईं हैं.

मेरे पूछने पर उन्होंने बड़े ही सामान्य लहज़े में कहा कि वे अपनी निजी जीवन से जुड़ी बातों का प्रदर्शन नहीं करना चाहतीं हैं, क्योंकि कुछ भी कहने पर समर्थन में कम और विरोध में ज्यादा आवाज़ें उठने लगतीं हैं. उन्होंने फेसबुक पर अपना अनुभव ये सोचकर शेयर किया था कि लोग ये समझ पाएं कि मज़बूत से मज़बूत और स्वतंत्र से स्वतंत्र लड़कियां भी इन जैसे हालातों में कितनी निरीह या वल्नरेबल हो जाती हैं. पांच साल पहले- जब निर्भया उर्फ ज्योति सिंह को शारीरिक और मानसिक तौर पर अधमरा कर दक्षिणी दिल्ली की एक सड़क बिना कपड़ों के मरने के लिए फेंक दिया गया था, तब भी कुछ ऐसे लोग थे जो ये सवाल करने में ज्य़ादा समय लगा रहे थे कि- वो रात के नौ बजे अकेली क्यों थी, या फिर अगर वो अपने पुरुष मित्र के साथ थी तो ये कितना ग़लत था. इन पांच सालों में कुछ भी नहीं बदला, कमोबेश हालात बदतर ही हुए हैं.

वापस निर्भया मामले पर पहुंचते हुए, आज से छह महीने 5 मई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दोषी पाए गए सभी दोषियों को फांसी की सजा सुना दी थी लेकिन उसे आजतक अमल नहीं किया जा सका है. ऐसा सज़ा रुकवाने के लिए हमारे देश के कानून में मौजूद दर्जनों विकल्पों के कारण ही हो पा रहा है. दोषी अब राष्ट्रपति के पास दया याचिका यानि ‘मर्सी’ की अपील करने की तैयारी में हैं और वो खारिज होने पर वे फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा भी खटखटा सकते हैं.

नाम बदल जाता है पर घटना वैसी ही होती है

निर्भया की तरह ही मिलता-जुलता मामला केरल की जिशा का था जिसकी पिछले साल कुछ इसी तरह से रेप के बाद हत्या कर दी गई थी. जिशा 29 साल की थीं और कानून की छात्रा थीं. शुक्रवार को ही एर्नाकुलम की कोर्ट ने आरोपी अमीरुल इस्लाम को मौत की सज़ा सुनाई थी, लेकिन उससे पहले उसके वकील ने कोर्ट के बाहर दावा किया था कि वे अमीरुल को कम के कम सज़ा दिलाने की कोशिश करेंगे.

निर्भया कहें या जिशा कहें- ये सिर्फ एक नाम हैं, असल में ये उस तेज़ी से बढ़ती संस्कृति का हिस्सा है जहां, हर लड़कियों या यूं कहे कि महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं. इसके पीछे कोई कैटेगराईजेशन भी नहीं है- ज़रूरी नहीं है कि वे शहरी या पढ़ी लिखी हों, आधुनिक कपड़ों में हों, नौकरी करती हो;  एक बलात्कारी का शिकार बनने के लिए- सिर्फ़ ये ज़रूरी होता है कि आप महिला हों. क्या फर्क पड़ता है कि 95 साल की बूढ़ी महिला हैं या डेढ़ साल की मासूम बच्ची. अगर आपकी शारीरिक पहचान एक महिला या एक स्त्री की है... भले ही वो शरीर पूरी तरह से विकसित भी न हुआ हो, या फिर ये कि वो शरीर पूरी तरह से जीर्ण-शीन बन चुका हो, लेकिन एक हमलावर की नज़र में वो सिर्फ एक औरत का शरीर होता है.

यौन कुंठाओं से आगे निकल रही है हिंसा

जिस बच्ची ने बोलना न सीखा हो, उसके निजी अंग में अगर कोई वहशी पांच इंच की लकड़ी का टुकड़ा डाल देता है तो क्या हम इसे सिर्फ एक शारीरिक बलात्कार कह सकते हैं? एक 95 साल की वुद्धा ने किसी का क्या बिगाड़ा होगा जो दो लोग मिलकर उसे इतना प्रताड़ित करते हैं कि वो मर जाए? या फिर वो मानसिक तौर पर बीमार महिला जिसका, खुलेआम दिन की रौशनी में बेंगलुरु की किसी सड़क एक शराबी बलात्कार करता है और लोग वीडियो बना लेते हैं पर उसकी मदद नहीं करते. अपराध दरअसल बलात्कार नहीं है, बल्कि बलात्कार करने की वो मानसिकता है जिसे धीरे-धीरे समाज में स्वीकार्यता मिलती जा रही है. इतना आम हो गया किसी के बलात्कार की घटना की घटना की अखबारों के पन्नों में उनके लिए जगह कम हो गई, टीवी पर दिखाए जाने की ज़रूरत भी नहीं होती. जब तक उसमें कुछ नया न हो. रेप अब लोगों को आंदोलित नहीं करता, अगर गैंग-रेप है तब मामला थोड़ा गंभीर है, ये समाज में बनती नई सोच है.

NirbhayaConvicts

निर्भया जैसी घटना ने जहां एक तरफ लोगों को जिनमें खासकर लड़कियां हैं, उन्हें जहां अपनी आवाज़ बुलंद करने की ताक़त दी, वहीं दूसरी तरफ ऐसे अपराधियों के सामने एक मानक ला खड़ा किया कि अपराध ऐसे भी किए जा सकते हैं. इसके पीछे की मानसिकता क्या है ये शायद बता पाना आसान नहीं है, लेकिन जो नज़र आ रहा है उससे ये तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता है कि- निर्भया के मसले पर जिस तरह से पूरा देश आंदोलित हुआ था उससे देश में ऐसे हादसों में कहीं से कोई कम आयी है. हालात बदतर ही हुए हैं. कम से कम आंकड़े तो यही कहते हैं.

जब राजस्थान के राजसमंद में एक आदमी को हैवानियत की हद तक जाकर मार दिया जाता है और उसे ज़िंदा जला दिया जाता है, तब उसके समर्थन में लोग सड़कों पर उतर जाते हैं, उसका केस लड़ने के लिए उसके अकाउंट में पैसे डाले जाते हैं- तब ज़रा सोच कर देखें, किसी अघोषित डर की वजह से- अपनी खोल में छिपे किसी अपराधी को ये सब देखते हुए- अपराध करने की ताकत या प्रेरणा मिलती है कि नहीं?

rajsamand shambulal regar

जब अपराध की घटना को हम आम नागरिक की हैसियत से सोशल मीडिया पर जस्टिफाई करने की कोशिश करते हैं तो अपराध को बल देते हैं या नहीं? दिक्कत ये नहीं है कि ऐसे जघन्य अपराध बढ़ रहे हैं. समस्या ये है कि हम और आप ऐसे अपराधों को पनपने की ज़मीन तैयार कर रहे हैं. हम अपनी सुविधानुसार बलात्कार को हिंदू-मुसलमान, हताशा-निराशा, शराबी- विक्षिप्त, छोटे कपड़ों और सुनसान सड़क के विशेषणों के सहारे जस्टिफाई करने की कोशिश कर रहे हैं. ये सबकुछ हर समय, हर जगह हो रहा है, जाने-अंजाने.

निर्भया मसले पर इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है कि- घटना की पांचवी बरसी से एक दिन पहले, उसके चार गुनहगार सुप्रीम कोर्ट के दिए फैसले को चुनौती देते हुए कहते हैं कि ये फैसला न सिर्फ भेदभावपूर्ण बल्कि इसमें कानूनी ख़ामियां भी शामिल है. इस रिव्यू पिटिशन में अभियुक्तों के वकील ने दावा किया है कि सर्वोच्च अदालत की तरफ से दिया गया मौत का फैसला, देश द्वारा इंसाफ के नाम पर दो ज़िंदा इंसानों की पूर्व निर्धारित ‘कोल्ड ब्लडेड’ हत्या है.

अब देखने की ज़रूरत ये है कि अभियुक्तों के इस दावे पर कितने राष्ट्रवादी उनके खिलाफ़ खड़े होते हैं या उनका विरोध करते हैं. आख़िर क्यों हमारे देश के कानून में ऐसा प्रावधान नहीं है कि हम ऐसे अपराधियों को एक कठोर फैसले के साथ हमेशा के लिए मुंह बंद करने को मजबूर कर दें, क्यों निर्भया का वो नाबालिग अपराधी आज खुले में घूम रहा है, क्यों संसद में कानून बनने में चार साल का समय लग गया. जितनी फौरी तरीके अपराध होते हैं और उतनी ही तेज़ी से उसे सही या ग़लत ठहरा दिया जाता है- अपराधी को सज़ा मिलने में उतनी तेज़ी आज तक क्यों नहीं पा पाई? असल मुद्दा ये है...

और ये हालात जब तक ऐसे ही बने रहेंगे, तब तक हर रोज़ सैंकड़ों लड़कियां, बच्चियां, औरतें और वृद्धाएं ऐसे ही शारीरिक और मानसिक यातना की शिकार होती रहेंगी और पुलिस और अदालत के रिकॉर्ड उनका नाम भी बस एक केस के रूप में दर्ज हो जाएगा. एक ऐसा नाम जिसे शायद ‘निर्भया’ जितना याद भी न किया जाए.

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