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पीएनबी घोटाला : कुछ सवालों के जवाब आने अभी बाकी हैं

अगर ध्‍यान से देखा जाए तो पता चलता है कि मामले महज धोखाधड़ी का नहीं है... इससे आगे और भी कुछ है

Naresh Malhotra Updated On: Feb 20, 2018 04:33 PM IST

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पीएनबी घोटाला : कुछ सवालों के जवाब आने अभी बाकी हैं

पीएनबी (पंजाब नेशनल बैंक) को धोखा देने के आरोपी गोकुलनाथ शेट्टी और मनोज खरात की गिरफ्तारी से ये बात सामने गई है कि 11,400 करोड़ रुपए का घपला अरबपति नीरव मोदी ने फर्जी लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (एलओयू) के जरिए किया है और ये महज धोखाधड़ी ही है, इसके अलावा कुछ नहीं. लेकिन, मामले को अगर ध्‍यान से देखा जाए तो पता चलता है कि मामला इससे आगे और भी कुछ है. पीएनबी में हुई ये घटनाएं कुछ अर्सा पहले हुई ‘विनसम डायमंड धोखाधड़ी’ की याद दिलाती हैं. इससे कई गंभीर सवाल उठते हैं.

सबसे पहले धोखाधड़ी को समझें, दरअसल इतने बड़े पैमाने की धोखाधड़ी तब ही हो सकती है जब बैंक अफसर, रेग्‍युलेटर्स और ऑडिटर्स वगैरह सभी लोग अपने आंखें बंद रखे और इस गुब्‍बारे को फूलने दें. इस मामले में एक अहम मसला ये सामने आया है कि स्विफ्ट प्लेटफार्म सीबीएस (कोर बैंकिंग सिस्टम) से जुड़ा नहीं था, इसी वजह से जूनियर अफसरों ने खातों में दर्ज किए बगैर ही लेनदेन को अंजाम दिया. यह तरीका खामी भरा है क्योंकि स्विफ्ट और सीबीएस स्टैंड-अलोन प्लेटफॉर्म हैं और उनमें आपसी तालमेल नहीं हैं. बेनामी लेनदेन का पता लगाने के लिए सिस्टम में कई चेक-बैलेंस हैं. इनमें से कुछ नीचे लिख रहा हूं;

1- हरएक स्विफ्ट इनपुट लेनदेन में कम से कम तीन अफसर शामिल होते हैं: मेकर, चेकर और अधिकारी. एक सिंगल आदमी कोई एलओयू ऑथोराइज्ड नहीं कर सकता. तो सवाल ये उठता है कि फिर ये धोखाधड़ी हुई कैसे?

2- स्विफ्ट सिस्‍टम एक डेली रिपोर्ट बनाता है. जिसमें सभी इनकमिंग और आउटगोइंग मैसेज, चाहें वे फाइनेंशियल हों या फिर नॉन फाइनेंशियल, उसमें शामिल होते हैं. ये फाइनेंशियल लेनदेन इसकी लिस्‍ट पर दिखते हैं और सीबीएस उसका मिलान करता है. सवाल ये है कि उन रिपोर्टों का क्‍या हुआ?

3- एलओयू के खाते में देनदारी वाले खाते सभी वाउचर्स, जो उस ब्रांच में आते हैं, उनका मिलान सिस्‍टम से बनी रिपोर्टों से मैन्‍युली वैरीफाई किया जाता है. तो क्या यह भी फेल हो गया?

Nirav Modi

4- हर एक नॉस्ट्रो खाते की घरेलू ब्रांच में जानकारी होती है. बैंकिंग के सामान्‍य कामकाज के मुताबिक, नॉस्ट्रो खाते में दिखाई देने वाले क्रेडिट और डेबिट रोजाना के आधार पर दिखते हैं. इस तरह, एलओयू जो क्रेडिट ऑफर करता है उसकी जांच रोजाना होनी जरूरी है. सीबीएस में इस तरह की गड़बडी अगले ही दिन ही पता लग सकती है, बशर्ते रोजाना इसका मिलान ठीक से किया जाए.

5- भले ही बेईमान अधिकारी अनऑथोराइज्‍ड स्विफ्ट मैसेज भेज रहे हों, पर वे इस तरह के लेनदेन पर कमीशन बना रहे होंगे. इस तरह गुपचुप होने वाली इन्‍कम के स्रोत का पता लगाना चाहिये था तो तब ही इस तरह की धोखाधड़ी का पता लग जाता.

6- साल 2011 के बाद से सभी लेनदेन, एक साल पहले तक, एलएयू की परिपक्वता अवधि पर कुछ खातों को (ज्यादातर कर्ज लेने वाले) को विभिन्न एलओयू के तहत विदेशी बैंकों को पीएनबी से उधारी की भरपाई के लिए डेबिट दिया गया. ये संदेह उठना चाहिए था कि पीएनबी के दस्‍तावेज में किसी भी तरह की जानकारी के बिना कैसे भरपाई की जा रही थी.

7- शाखा की आकस्मिक देनदारी, आवाजाही और बिल्ड-अप को साप्ताहिक/मासिक/त्रैमासिक रिपोर्टों के आधार पर शाखा के शीर्ष प्रबंधन और नियंत्रकों द्वारा ट्रैक पर रखा जाना चाहिए था.

8- मासिक अनियमितता रिपोर्ट नियंत्रकों के पास जमा की जाती है, जो इन लेनदारी को निश्चित रूप से दिखाएगा. क्या बैंक ऐसा करने में विफल रहा? इन जांच के तरीकों में से कोई भी, पीएनबी से धोखाधड़ी को रोकने में कैसे फेल हुआ?

9- जैसा कि कहा जा रहा है कि धोखाधड़ी-लेनदेन कई सालों से चल रहा है, तो फिर ऑडिटरों / निरीक्षकों की फौज वहां क्या कर रही है? आमतौर पर, शाखा के उस समय के ऑडिट को आरबीआई के नियुक्त बाहरी ऑडिटरों (प्रतिष्ठित सीए फर्म) द्वारा तिमाही आधार पर किया जाता है. और हेडक्‍वार्टर के ऑडिटर/ इंस्‍पेक्‍टर पाक्षिक ऑडिट भी करते हैं. आरबीआई ये ऑडिट सेक्‍शन 35 और फेमा ऑडिट के तहत करता है.

इनमें से कोई भी अनियमितता को नहीं पकड़ सका. चाहे पीएनबी में हुई लेनदेन संबंधी धोखाधड़ी हो या फिर अनियमितता वाला काम हो, दूसरे बैंकों की ओर बैंक की देनदारी पूरी है और उसे नुकसान उठाना पड़ेगा. जैसा कि जाहिर है, धोखाधड़ी वाले इन लेनदेनों का पता किसी भी स्तर पर निर्धारित प्रणाली और प्रक्रियाओं का पालन करके किया जा सकता था. लेकिन जाहिर तौर पर सिस्टम में बने सुरक्षा उपायों को इग्‍नोर किया गया.

PNB

ऐसा लगता है कि ऊपर से नीचे तक के अफसरों को इसके बारे में जानकारी थी और जो बात सामने आई है उसमें उनकी सहमति होने से इंकार नहीं किया जा सकता. एक निचले स्तर का अफसर इस तरह के बड़े लेन-देन बिना किसी बड़े अफसर की जानकारी के नहीं कर सकता. क्‍योंकि वह बड़ा अफसर भी किसी भी वक्‍त अपने निचले स्‍तर के लोगों की जांच कर सकता है, क्योंकि सभी लेनदेन संबंधी जानकारी सीधे ही उपलब्ध होती है.

इसका निचोड़ ये बात है: 11,400 करोड़ रुपये वाली पीएनबी धोखाधड़ी के मामले में कई सवालों के जवाब अभी नहीं मिले हैं. धोखाधड़ी में मदद करने वाले रेग्‍युलेटर्स और ऑडिटर्स की भूमिका की विस्तार से जांच करनी होगी. एक या दो मिडिल लेवल के कर्मचारियों की गिरफ्तारी बीमारियों के लक्षणों का इलाज करने जैसा होगा न कि बीमारी का और इससे सड़ांध कहां से आ रही है इसका पता लगाने में नाकामी ही मिलेगी.

(नरेश मल्होत्रा एसबीआई के साथ पूर्व कार्यकारी है)

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