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लालू की पसंद का होगा बिहार कांग्रेस का अगला अध्यक्ष

बिहार कांग्रेस में आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव का दखल आज से नहीं बल्कि दो दशक पुराना है, आरजेडी प्रमुख की वजह से ही बिहार में कांग्रेस पतन के मुहाने पर पहुंची

Updated On: Nov 24, 2017 09:17 PM IST

Syed Mojiz Imam
स्वतंत्र पत्रकार

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लालू की पसंद का होगा बिहार कांग्रेस का अगला अध्यक्ष

बिहार में कांग्रेस भले ही अलग पार्टी रहने का दंभ भरती हो लेकिन कांग्रेस में चलती है लालू यादव की. ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि हाल के दिनों में एक के बाद एक कई घटना घटी है, जिससे इस आरोप की पुष्टि होती है. ताजा मामला बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष को लेकर है.

जानकारी मिली है कि आरजेडी प्रमुख अपने खासमखास को ही कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी पर देखना चाहते हैं. इसके लिए आरजेडी प्रमुख ने लॉबिंग भी शुरू कर दी है. सबको पता है कि आरजेडी प्रमुख लालू यादव को कांग्रेस के उपाध्यक्ष पसंद नहीं करते और न ही सावर्जनिक रूप से उनसे मिलना चाहते हैं. सो आरजेडी प्रमुख ने इस काम के लिए तेजस्वी को लगा रखा है.

पिछले दिनों तेजस्वी ने राहुल गांधी से दिल्ली में आकर मुलाकात की. मुलाकात की फोटो भी तेजस्वी ने ट्वीट किया. सूत्रों के मुताबिक तेजस्वी ने राहुल गांधी से बिहार के राजनीतिक हालात पर चर्चा की और 2019 के लोकसभा चुनाव पर भी बातचीत हुई. बिहार मे कांग्रेस के पास लोकसभा में सिर्फ दो सांसद हैं. इन सब के बातचीत के दौरान बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष को लेकर काफी देर तक चर्चा हुई.

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सूत्रों की मानें तो तेजस्वी की तरफ से कांग्रेस को कई नाम सुझाए गए. जिसमें पूर्व केंद्रीय मंत्री शकील अहमद के नाम की पैरवी आरजेडी की तरफ से की गई. तर्क ये दिया गया कि गठबंधन की मजबूती के लिए शकील अहमद सबसे योग्य व्यक्ति हैं. सूत्र बता रहे हैं कि आरजेडी के पसंद का अध्यक्ष अगर कांग्रेस ने दिया तो लोकसभा चुनाव में गठबंधन के तहत कांग्रेस को 40 में से 14 सीट लड़ने को मिल सकती है.

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हालांकि लालू के इस प्रस्ताव पर कांग्रेस गौर फिक्र कर रही है. इस मामले में कांग्रेस के नेता चुपचाप हैं क्योंकि मामला राहुल गांधी के पास है. हालांकि 2019 से पहले कांग्रेस किसी भरोसेमंद आदमी को बिहार में भेजने की तैयारी कर रही है.

हालांकि शकील अहमद की पैरवी आरजेडी की तरफ से हो रही है. लेकिन कांग्रेस में पूर्व आरजेडी के नेता अखिलेश प्रसाद सिंह भी रेस में हैं. इसके अलावा रंजीत रंजन जो कांग्रेस में हिमाचल प्रदेश की प्रभारी सचिव हैं वो भी रेस में है.

कौन हैं शकील अहमद 

शकील अहमद हाल तक पार्टी के महासचिव रहे हैं. इससे पहले केंद्र में मंत्री रह चुके हैं और 1998 और 2004 में लोकसभा के सदस्य चुने गए थे. बिहार में राबड़ी देवी के मंत्रिमंडल में कांग्रेस की तरफ से कैबिनेट मंत्री भी थे. दिसंबर 2000 से जून 2003 तक बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे हैं. शकील अहमद का परिवार कांग्रेसी है और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से शकील अहमद की पारिवारिक नजदीकी है.

माना जा रहा है कि बातचीत के दौरान ये कहा गया कि उस वक्त बिहार में कांग्रेस और आरजेडी के बीच तालमेल सबसे अच्छे स्तर पर रहा. हालांकि पार्टी में उनके आलोचक कहते हैं कि शकील अहमद के कार्यकाल में कांग्रेस बिहार से खत्म हो गई.

कौन हैं अखिलेश सिंह

अखिलेश प्रसाद सिंह आरजेडी के कोटे से केंद्र की यूपीए सरकार में राज्यमंत्री रहे हैं. यूपीए सरकार में अखिलेश सिंह को खाद्य और कंज्यूमर अफेयर्स विभाग मिला था. इससे पहले वो 2004 तक राबड़ी देवी के मंत्रिमंडल में भी मंत्री रह चुके हैं. पेशे से टीचर अखिलेश प्रसाद सिंह मोतिहारी से 14वीं लोकसभा में सासंद थे, भूमिहार बिरादरी से आते हैं जो बिहार में अगड़ी जाति मानी जाती है.

लालू से मनमुटाव के बाद कांग्रेस में शामिल हो गए. 2014 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा लेकिन कामयाबी नहीं मिली. कांग्रेस अगड़ी जातियों को साथ लाने की कोशिश करेगी तो अखिलेश उसमे फिट बैठ सकते हैं. बिहार कांग्रेस के प्रभारी और राहुल गांधी के करीबी सीपी जोशी से भी अखिलेश के रिश्ते अच्छे हैं.

Lalu Prasad addresses press

दशकों से लालू यादव का बिहार कांग्रेस में है दखल

बिहार कांग्रेस में आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव का दखल आज से नहीं बल्कि दो दशक पुराना है. आरजेडी प्रमुख की वजह से ही बिहार में कांग्रेस पतन के मुहाने पर पहुंची. 1990 में मंडल कमीशन लागू होने के बाद लालू प्रसाद यादव ने कांग्रेस से लड़ कर उससे सत्ता छिनी थी. लेकिन कांग्रेस की ओर से अपने गौरव को पाने की एक भी कोशिश इन 27 सालों में नहीं हुई. यही वजह है की कांग्रेस यहां लगभग पंगु बन के रह गई है.

इस मामले को समझने के लिए हमें 27 साल पहले जाना पड़ेगा. 1990 में कांग्रेस बिहार में विधानसभा चुनाव हार गई थी. पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्रा के नेतृत्व में एक मजबूत विपक्ष के तौर पर कांग्रेस, विधानसभा में 72 विधायकों के साथ मौजूद थी. लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे. 1990 से 1995 का दौर बिहार में सामाजिक परिवर्तन का दौर माना जाता है. क्योंकि पहली बार पिछड़ी जातियों की भागदारी सत्ता में थी.

इस दौरान कांग्रेस ने अपनी खोई हुई गरिमा को वापस पाने का कोई प्रयास ही नहीं किया. नतीजतन लालू प्रसाद रोज ब रोज मजबूत होते गए और कांग्रेस कमजोर होती गई.

कांग्रेस की कमजोरी 

कांग्रेस की कमजोरी का आलम ये हो गया कि अब उसे बिहार में राजनीति करने के लिए सहारे की जरूरत पड़ने लगी. 1995 के विधानसभा में सीट घट कर 29 हो गई. 1996 में समता पार्टी और बीजेपी के मजबूती से उभरने की वजह से लोकसभा में भी पार्टी की हालत पतली होने लगी. 1996 के लोकसभा चुनाव में बिहार की 54 सीटों में से केवल 3 सीटें कांग्रेस जीत पाई.

1998 में कांग्रेस के अध्यक्ष सीताराम केसरी ने पार्टी की स्थिति सुधारने के लिए लालू प्रसाद यादव से हाथ मिला लिया. यहीं से कांग्रेस आरजेडी के इशारों पर नाचने लगी. संयुक्त बिहार के 54 सीटों में से कांग्रेस को सिर्फ 8 सीटें दी गई. हद तो तब हो गई जब 1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 13 सीटों पर चुनाव लड़ा जिनमें से 8 पर आरजेडी से समझौते के तहत और 5 पर फ्रेंडली लड़ाई हुई. लेकिन जीत मिली सिर्फ 2 पर.

इससे कांग्रेस की हालत का अंदाजा लगाया जा सकता था. 2000 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का स्वाभिमान जागा और कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया. उस समय तर्क ये दिया गया कि, लालू प्रसाद यादव भ्रष्ट हैं उन पर घोटाले का आरोप है.

खैर 2000 में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 23 सीटें जीती. राबड़ी देवी के नेतृत्व में सरकार बनी तो फिर कांग्रेस उसी सरकार में शामिल हो गई जिस पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर वो चुनाव लड़ चुकी थी. 2004 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस ने आरजेडी और राम विलास पासवान के साथ मिलकर लड़ा था. जिसमें कांग्रेस ने 4 सीटें जीती.

Patna: Suspended Bihar Pradesh Congress Committee (BPCC) president Ashok Choudhary addressing a press conference in Patna on Wednesday. PTI Photo(PTI9_27_2017_000029B)

बिहार कांग्रेस टूट के कगार पर 

बिहार में नीतीश कुमार के पल्टी मारने के बाद से ही कांग्रेस पसोपेश में है. बिहार कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक चौधरी के ऊपर ये आरोप लगा कि वो नीतीश कुमार के सहयोग से पार्टी तोड़ने की कवायद में लगे थे. लेकिन कामयाबी नहीं मिली.

अशोक चौधरी पर कांग्रेस के नेताओं ने आरोप लगाया कि पार्टी के लगभग सभी विधायकों को नीतीश का समर्थन देने के लिए बातचीत की और लालच भी दिया. हालांकि जरूरी विधायक ना मिलने पर मंसूबे पर कामयाबी नहीं मिल पाई. जिसके बाद कांग्रेस ने अध्यक्ष पद से अशोक चौधरी को हटाकर कोकब कादरी को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया. हालांकि अभी नया अध्यक्ष नियुक्त होना बाकी है.

कौन हैं अशोक चौधरी 

एक समय में अशोक चौधरी राहुल गांधी की आंख का तारा हुआ करते थे. राहुल गांधी ने अशोक चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया और एमएलसी भी. बिहार में महागठबंधन की सरकार बनी तो अशोक चौधरी को नीतीश कुमार के मंत्रीमंडल में शिक्षा मंत्रालय जैसे अहम विभाग का मंत्री बनाया. लेकिन महागठबंधन टूटते ही अशोक चौधरी के ऊपर पार्टी को तोड़ने का आरोप लगा. कांग्रेस के कई सीनियर नेताओं ने राहुल गांधी से इस सिलसिलें मे शिकायत भी की.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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