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यूनीफॉर्म सिविल कोड पर बहस के लिए देश में सही माहौल जरूरी: मिलिंद देवड़ा

हमें ऐसा माहौल तैयार करना होगा, जिससे किसी को ये न लगे कि आने वाला कानून उसके लिए खतरा होगा

Milind Deora Updated On: Sep 09, 2017 03:16 PM IST

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यूनीफॉर्म सिविल कोड पर बहस के लिए देश में सही माहौल जरूरी: मिलिंद देवड़ा

इस हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने दो ऐतिहासिक फैसले सुनाए. पहले तो देश की सबसे बड़ी अदालत ने मुसलमानों में एक बार में तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया. फिर अदालत ने निजता के अधिकार को मूल अधिकार बताने वाला फैसला सुनाया.

सुप्रीम कोर्ट के दोनों ही फैसले तरक्कीपसंद हैं. ये समाज में सबको बराबरी का दर्जा दिलाने की दिशा में एक बड़ी पहल है. इसीलिए देश ने खुले दिल से सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों का स्वागत किया, तारीफ की.

सुप्रीम कोर्ट के पहले फैसले यानी ट्रिपल तलाक को गैरकानूनी ठहराने से यूनीफॉर्म सिविल कोड या समान नागरिक संहिता को लेकर चर्चा ने फिर से जोर पकड़ लिया है. आजादी के बाद से ही इसे लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है. इस मुद्दे पर तमाम भागीदारों की राय कभी भी एक होती नहीं दिखी है.

भारत में जब भी समान नागरिक संहिता का जिक्र होता है, विवाद उठ खड़ा होता है. इसकी बड़ी वजह है इस मुद्दे का राजनीतिकरण. इसके अलावा पेचीदा धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रीति-रिवाज भी इस मामले को विवादित बना देते हैं. हमारा देश विविधताओं से भरा हुआ है. ऐसे में सब के लिए एक जैसा कानून, कहां तक सही होगा, कामयाब होगा, इस बात पर लंबे वक्त से बहस चली आ रही है.

राजनीति से अलग कर हो चर्चा

सिद्धांत के तौर पर तो ये बात अच्छी लगती है कि देश के हर नागरिक के लिए एक जैसा ही कानून होना चाहिए. फिर वो चाहे किसी भी मजहब को मानने वाला हो, किसी भी इलाके में रहता हो, कैसी भी जिंदगी बसर करता हो.

The Golden Temple is seen illuminated as Sikh devotees throng the shrine on the 411st anniversary of the installation of the Guru Granth Sahib, the religious book of Sikhs, in Amritsar, India, September 14, 2015. REUTERS/Munish Sharma - RTS12IN

लेकिन भारत जैसे विविधताओं वाले देश में समान नागरिक संहिता लागू करने में हमें बहुत सावधानी बरतनी होगी. क्योंकि हमारे देश में हर दूसरे नागरिक की अलग पहचान है. उसके अलग रीति-रिवाज हैं.

सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या संसद विधायी मुद्दों के साथ-साथ धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आस्थाओं पर चर्चा करने के लिए तैयार है? क्या संसद इस बात का फैसला करने के लिए तैयार है कि वो किस हद तक लोगों के निजी जीवन में, उनकी निजी आस्थाओं में दखल दे सकती है? और ऐसा करते वक्त क्या संसद नागरिकों के अधिकारों और उनकी आजादी में दखल तो नहीं देगी?

समान नागरिक संहिता पर चर्चा के लिए सबसे जरूरी शर्त ये है कि इस मुद्दे को राजनीति से बिल्कुल अलग किया जाए. तमाम सरकारों पर किसी खास समुदाय का पक्ष लेने या सांप्रदायिकता के आरोप लगते रहे हैं. इसीलिए समान नागरिक संहिता पर चर्चा से पहले तमाम राजनीतिक दलों और सरकार को इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने से गुरेज करना होगा.

अगर ऐसा हो पाएगा, तभी तमाम मजहब के लोगों से चर्चा और बहस करना आसान होगा. तभी हम समाज के सभी वर्गों और देश के सभी समुदायों से ईमानदारी से बात कर पाएंगे. कुछ धार्मिक आस्थाएं समाज के हितों को ठेस पहुंचाती हैं. उन्हें रोकने के लिए जरूरी है कि सियासी दल, लोगों का भरोसा जीतें.

वैसे, मेरा मकसद ये चर्चा करना नहीं है कि समान नागरिक संहिता देश के लिए ठीक है या नहीं. इसके क्या फायदे और नुकसान होंगे. मेरा सवाल तो ये है कि क्या हमारे देश ने समान नागरिक संहिता पर बात आगे बढ़ाने के लिए बुनियादी माहौल तैयार किया है या नहीं? मुझे लगता है कि अभी इस दिशा में बहुत कुछ किया जाना बाकी है. हमें पहले तो वो माहौल तैयार करना होगा, जिसमें हम समान नागरिक संहिता की चर्चा को आगे बढ़ा सकें.

School children dressed as Hindu Lord Krishna take part in a function held ahead of "Janamashtmi" celebrations in the southern Indian city of Chennai, August 8, 2012. Janamashtmi is the birth anniversary of Lord Krishna which will be celebrated on August 10. REUTERS/Babu (INDIA - Tags: RELIGION SOCIETY ANNIVERSARY) - RTR36FC1

इसकी पहली शर्त ये है कि सरकार को धार्मिक मामलों से खुद को अलग करना होगा. मौजूदा हालात में तो ये दावा बिल्कुल ही नहीं किया जा सकता. हमारी पक्षपात पूर्ण सोच उसी वक्त उजागर हो जाती है, जब हम किसी खास धर्म की कमियों पर ही निशाना लगाने लगते हैं, जबकि कुछ धर्मों की गलत परंपराओं की तरफ से आंखें मूंद लेते हैं.

जैसे कुछ धर्म ये कहते हैं कि हमें दुनिया की सुख सुविधाएं छोड़कर आध्यात्मिक सफर पर निकलना चाहिए. ये बात किसी वयस्क के लिए तो ठीक है. मगर यही खयाल किसी बच्चे पर लादना कहां तक ठीक है? ऐसे में हमें किसी एक नहीं, हर धर्म की कमियों और गलत परंपराओं की पड़ताल करनी चाहिए.

इस मुद्दे पर बहस की आखिरी चिंता हमारी राष्ट्रीय पहचान को लेकर है. इसको लेकर तमाम वर्गों पर अविश्वास जताया जाता है. कुछ लोग खुद को राष्ट्रवादी कहते हैं. वो दूसरों से अपेक्षा करते हैं कि वो भी कुछ बातों पर हामी भरें तभी देशभक्त माने जाएंगे. नहीं तो उन्हें गद्दार, देशद्रोही ठहराया जाएगा.

समाज के रूप में और विकसित होने की जरूरत

A protester holds a cross during a protest rally by hundreds of Christians against recent attacks on churches nationwide, in Mumbai February 9, 2015. Five churches in the Indian capital New Delhi have reported incidents of arson, vandalism and burglary. The latest was reported last week when an individual stole ceremonial items. REUTERS/Danish Siddiqui (INDIA - Tags: RELIGION CIVIL UNREST) - RTR4OTU0

अब जैसे कि अमेरिका में हर भारतीय को ये अधिकार है कि वो भारत का स्वतंत्रता दिवस मना सकता है. अमेरिका में भारत का झंडा लहरा सकता है. वो ऐसा बेझिझक कर सकता है क्योंकि, इसे न तो सियासी दल मुद्दा बनाएंगे. और न ही उस शख्स को हिंसा और विरोध का शिकार होना पड़ेगा. अमेरिका में तमाम लोगों की अलग-अलग मान्यताओं का सम्मान किया जाता है. अगर किसी की अलग पहचान है, तो दूसरे लोग उसका विरोध नहीं करते.

भारत में अभी इस सोच को रखने वाले कम ही लोग हैं. अभी हमें इस दिशा में काफी काम करने की जरूरत है. लेकिन अमेरिका में बहुत से ऐसे लोग हैं, जो अमेरिका का पासपोर्ट रखते हुए भी अपने मूल देश के साथ लगाव का खुला प्रदर्शन करते हैं. फिर भी उन्हें देशद्रोही नहीं कहा जाता. उनकी निष्ठा पर सवाल नहीं उठाए जाते. उन्हें हिंसा का शिकार नहीं बनाया जाता.

अगर हम समान नागरिक संहिता बनाने की तरफ बढ़ना चाहते हैं, तो, हमें इन मुद्दों पर भी ध्यान देना होगा. हमें ऐसा माहौल तैयार करना होगा, जिससे किसी को ये न लगे कि आने वाला कानून उसके लिए खतरा होगा. उसकी आस्था पर चोट करेगा. एक देश के तौर पर हमें पहले इस दिशा में आगे बढ़ना होगा, जहां हर धर्म, समुदाय और संप्रदाय के लोग बेझिझक अपनी बात कह सकें.

(लेखक पूर्व सांसद हैं और केंद्रीय संचार व आईटी और जहाजरानी व बंदरगाह मंत्री भी रह चुके हैं)

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