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टिकट न मिलने पर अखिलेश के लिए नहीं फूटे बोल लेकिन जया के लिए कर दी बदजुबानी

सियासत में नरेश अग्रवाल की छवि पाला बदलने के अलावा विवादास्पद बयानों की वजह से ज्यादा है

Updated On: Mar 12, 2018 08:35 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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टिकट न मिलने पर अखिलेश के लिए नहीं फूटे बोल लेकिन जया के लिए कर दी बदजुबानी

सियासी नेता नरेश अग्रवाल आज से बीजेपी नेता के रूप में जाने जाएंगे. 30 साल के सियासी सफर में बीजेपी छोड़ने के बाद 17 साल की कठिन यात्रा और पार्टियों के पड़ाव दर पड़ाव के बाद अब वापस कमल के फूल की छांव के नीचे विराजमान हैं. उनके लिए कहा जाता है कि ‘जहां नरेश वहां सरकार.’ यूपी में जब बीएसपी की सत्ता थी तो वो सियासत के 'नरेश' थे. फिर जब समाजवादी पार्टी की सत्ता आई तो वो 'सपा नरेश' हो गए. अब उनकी बीजेपी में सम्मानित एन्ट्री हुई. बीजेपी ने उनके सारे पिछले बयानों से जुड़े अपने शिकवे भुला दिए. अतिथि देवो भव: की तर्ज पर वेलकम किया. लेकिन नरेश अग्रवाल ने अपनी सियासी फितरत से उस वेलकम के रंग में भंग कर दिया.

naresh agrawal

ये सब जानते हैं कि समाजवादी पार्टी से राज्यसभा का टिकट न मिलने से नाराज नरेश अग्रवाल ने बीजेपी का दामन थामा. लेकिन इसके लिए नरेश अग्रवाल को महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने का अधिकार तो किसी भी पार्टी की सदस्यता ने नहीं दिया. उन्होंने सपा छोड़ने की वजह बताई कि फिल्म में डांस करने वाली के नाम पर उनका टिकट काटा गया. सबसे पहले तो नरेश अग्रवाल अपने विचारों की आत्मशुद्धि करें. क्योंकि उनका इशारा सीधे तौर पर जया बच्चन की तरफ था. दरअसल समाजवादी पार्टी अपने सीमित वोटों की वजह से राज्यसभा के लिए किसी एक का ही नाम पेश कर सकती थी. इसलिए समाजवादी पार्टी ने नरेश अग्रवाल के ऊपर जया बच्चन को तरजीह दी.

जया बच्चन देश के प्रतिष्ठित और बॉलीवुड के दिग्गज परिवार की नुमाइंदगी करती हैं. उनकी अदाकारी का देश आज भी कायल है तो हिंदी सिनेमा उनका इस्तकबाल करता है. जया बच्चन ने सियासत में भी अपने विचारों और भाषणों  से अलग पहचान बनाई है. नरेश अग्रवाल की ही तरह वो भी बराबरी से संसद में समाजवादी पार्टी की नुमाइंदगी करती आई हैं. उनका एक अलग व्यक्तित्व और प्रभाव है.

Akhilesh yadav dimple yadav jaya bachchan

राज्यसभा में जया बच्चन के साथ ही नरेश अग्रवाल भी अपनी बात रखा करते थे. कितना वक्त ऐसा भी कभी गुजरा होगा जब नरेश अग्रवाल उनके साथ बैठे होंगे. साथ लंच या डिनर किया होगा. विचारों का अदान-प्रदान हुआ होगा. हास्य-विनोद हुआ होगा. पारिवारिक बातें हुई होंगी. सियासत से परे कभी नरेश अग्रवाल ने जया बच्चन से उनकी फिल्मों और एक्टिंग की भी बातें की होंगी.

मुलायम परिवार में जब भी कोई बड़ा फंक्शन हुआ होगा तो जया बच्चन भी आई होंगी. कभी ऐसा भी हुआ होगा कि नरेश अग्रवाल उस वक्त उनके सम्मान में अपनी सीट से उठकर खुद मिलने भी गए होंगे. हो सकता है कि नरेश अग्रवाल के किसी पारिवारिक समारोह में जया बच्चन भी मेहमान बनी हों. ये सारी बातें सामाजिक शिष्टाचार की होती हैं. लेकिन नरेश अग्रवाल सब भूल गए.

हालांकि सामान्य सामाजिक शिष्टाचार नरेश अग्रवाल में कूट-कूट कर भरा है. तभी वो बीजेपी ज्वाइन करते वक्त ये कह रहे थे कि ‘वो पीएम मोदी और सीएम योगी से बहुत प्रभावित हैं.’ वही पीएम मोदी जो कल तक नरेश अग्रवाल के निशाने पर थे. वैश्य समाज की एक बैठक में पीएम मोदी के खिलाफ नरेश अग्रवाल ने जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल किया था. तो एक बार उन्होंने परिवारवाद के मुद्दे पर कहा कि 'पीएम मोदी ने शादी नहीं की है इसलिये वो क्या जानें कि परिवार का आनंद क्या होता है.'

इसके बावजूद पार्टी बदलने के बाद नरेश अग्रवाल को सामान्य शिष्टाचार में मोदी-योगी पसंद आए. लेकिन वो भूल गए जया बच्चन की शख्सीयत के बारे में. वो ये भूल गए कि वो भी किसी की पत्नी और मां हैं. राज्यसभा का टिकट कटने पर उनका गुस्सा मुलायम सिंह यादव या रामगोपाल पर नहीं फूट सका. वो अखिलेश यादव पर टिप्पणी नहीं कर सके. वही अखिलेश यादव जिनमें नरेश अग्रवाल को पीएम मोदी से ज्यादा बेहतर पीएम मैटेरियल दिखाई देता था. राजनीति की असल विडंबना यही है.

नरेश अग्रवाल के लिए सॉफ्ट टारगेट रहीं तो सिर्फ जया बच्चन. क्योंकि पूर्व में जब सपा नेता आजम खान ने जयाप्रदा के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की थी तब क्या हो सका था? उसी तरह नरेश अग्रवाल को जया बच्चन के रूप में एक सहयोगी सासंद नहीं बल्कि डांसर ही दिखाई दीं.

Azam Khan and Jaya Prada

माना जा रहा है कि शायद नरेश अग्रवाल को बीजेपी राज्यसभा भेज सकती है. सवाल उठता है कि उनकी इस टिप्पणी के बाद क्या बीजेपी इस पर पुनर्विचार नहीं करेगी?

यहां तक कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को भी ट्वीट कर कहना पड़ गया कि नरेश अग्रवाल का बीजेपी में स्वागत है, लेकिन जया बच्चन को लेकर उनकी टिप्पणी खेदजनक है.

बीजेपी में आने के बाद नरेश अग्रवाल अपना राजनीतिक दृष्टिदोष ठीक करें.  किसी भी पार्टी में महिलाओं के खिलाफ ऐसी अभद्र टिप्पणी को जायज नहीं ठहराया जा सकता है.

वैसे भी सियासत में नरेश अग्रवाल की छवि पाला बदलने के अलावा विवादास्पद बयानों की वजह से ज्यादा है. पिछले साल उन्होंने शराब में करोड़ों हिंदुओं की आस्था को घोल दिया था. जिन, ठर्रा और वाइन में उन्हें हिंदू भगवान दिखाई दिए थे. जिसके बाद संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार ने उनके बयान को हिंदू धर्म का अपमान बताया था. बयान से मचे हंगामे के बाद राज्यसभा की कार्यवाही से नरेश अग्रवाल के बयान को हटा दिया गया था.

naresh agrawal

सवाल ये है कि जिस गौरक्षा से जुड़ी हिंसा का विरोध करते हुए उन्होंने तंज किया था कि ‘गाय हमारी माता है तो फिर बैल क्या हुआ?’ आज उसी भगवा रंग में रंगे नरेश अग्रवाल बीजेपी में खुद को कैसे एडजस्ट करेंगे.

नरेश अग्रवाल अपने 30 साल के राजनीतिक करियर में सिर्फ विरोध करने की राजनीति में कुछ भी बोलने पर आमादा रहते हैं. कभी उनके बयानों में तुष्टीकरण की छाप होती है तो कभी बदजुबानी की इंतेहाई.

जहां भारतीय सरकार पाकिस्तान की जेल में बंद भारतीय कुलभूषण जाधव को बचाने के लिए जद्दोजहद में जुटी हुई है तो नरेश अग्रवाल जाधव को पाकिस्तानी  चश्मे से देखते हैं. जाधव के साथ पाक सेना के बर्ताव को जायज ठहराते हैं.

कभी वो पाक अधिकृत कश्मीर को आजाद कश्मीर बोल जाते हैं तो कभी कहते हैं कि ‘फिल्म अभिनेता सलमान खान को हिट एंड रन केस में मुसलमान होने की सजा मिली है.’

नेताओं की जिम्मेदारी संयमित और जिम्मेदार बयानों की होती है. लेकिन ऐसा लगता है कि नरेश अग्रवाल अपने बयानों को ही अपनी राजनीति का ब्रम्हास्त्र समझते हैं. उनकी खासियत ये जरूर है कि जिस पार्टी में एक बार वो एन्ट्री कर लेते हैं तो फिर उनके सारे सुर उस नई पार्टी के सरगम में ढल जाते हैं. लेकिन यहां जया बच्चन के लेकर की गई उनकी टिप्पणी को ही पार्टी ने खारिज कर दिया है. सुषमा स्वराज का ट्वीट नरेश अग्रवाल को आगाह करने के लिए काफी है.

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