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पीएम मोदी ने क्यों दिखाया शिखर की तनहाई और हमारी-आपकी तरह कमजोर दिखाई देने वाला पक्ष

किसी भी दूसरे इंसान की तरह मोदी की अपनी कमजोरियां हैं. इसी मौके पर पीएम मोदी ने ये संदेश भी पूरी ताकत से दिया कि वो इरादतन कोई गलती नहीं करेंगे

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Apr 20, 2018 11:58 AM IST

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पीएम मोदी ने क्यों दिखाया शिखर की तनहाई और हमारी-आपकी तरह कमजोर दिखाई देने वाला पक्ष

शिखर पर हमेशा इंसान तनहा ही होता है. लंदन में प्रधानमंत्री मोदी की वेस्टमिंस्टर के सेंट्रल हॉल में बेहद लंबा टाउनहाल कार्यक्रम, कुछ और नहीं, बल्कि शिखर के अकेलेपन को दूर करने की कोशिश थी. 'भारत की बात, सबके साथ' नाम के इस कार्यक्रम के जरिए पीएम मोदी ने लोगों से घुलने-मिलने और बात करने की कोशिश की, ताकि वो अपनी कमजोरियां भी दुनिया को दिखा सकें.

'मैं आप लोगों में से ही हूं, मेरी भी वही कमजोरियां हैं, जो किसी की भी हो सकती हैं'. इस बात को दोहराकर पीएम मोदी ने जोर देकर कहना चाहा कि वो ऐसे इंसान नहीं हैं, जिनसे गलतियां होती ही नहीं, क्योंकि वो प्रधानमंत्री हैं. किसी भी दूसरे इंसान की तरह मोदी की अपनी कमजोरियां हैं. इसी मौके पर पीएम मोदी ने ये संदेश भी पूरी ताकत से दिया कि वो इरादतन कोई गलती नहीं करेंगे. किसी प्रधानमंत्री को इतनी साफदिली से अपने दिल की बात कहने, अपने जज्बात बयां करने का मौका बिरले ही मिलता है. इसमें कोई दो राय नहीं कि लंदन में पीएम मोदी का टाउनहॉल कार्यक्रम उनके लिए बहुत चुनौती वाला था. और गीतकार प्रसून जोशी ने जिस शानदार तरीके से कार्यक्रम का संचालन किया, उसमें उनकी एक कवि वाली कुशलता भी थी और एक आम आदमी की जानने की जिज्ञासा भी.

मसलन, जिस तरह मोदी ने महिलाओं के खिलाफ अपराधों, खास तौर से बलात्कार को लेकर अपनी बात कही. साफ दिखा कि उन्हें इस बात की तकलीफ है कि ऐसे मामलों को राजनैतिक चश्मे से देखने की कोशिश हो रही है. मोदी ने कहा कि, 'क्या हमें ये कहना चाहिए कि पिछली सरकार के समय बलात्कार के मामले कम होते थे और मौजूदा सरकार में ज्यादा बलात्कार हो रहे हैं'. प्रधानमंत्री ने कहा कि इस तरह तो हम कुछ भी हासिल नहीं कर पाएंगे.

महात्मा गांधी के मंतर पर अमल

वैसे, पीएम मोदी ने दो घंटे से भी ज्यादा चले इस कार्यक्रम में कई मुद्दों पर अपनी बात रखी. इनमें अपनी सरकार की उपलब्धियों और आंतरिक सुरक्षा से लेकर विदेशी मामले भी शामिल थे. लेकिन, पूरे आयोजन के दौरान मोदी ने महात्मा गांधी के मंतर पर अमल करते हुए ही जवाब दिए. गांधी का मंतर था कि-आप उस सबसे कमजोर और गरीब शख्स का चेहरा याद करिए, जिसे आपने कभी भी अपनी जिंदगी में देखा हो. फिर आप खुद से सवाल कीजिए कि आप जो फैसला लेने जा रहे हैं, उससे उस इंसान का कोई भला होगा क्या? मोदी ने भी ये बताया कि उनकी राजनीति और प्रशासन गांधी के बताए रास्ते पर ही चलते हैं.

भारत का बौद्धिक वर्ग ये सोचता है कि संघ की विचारधारा में तपे लोगों को गांधीवादी विचारों और परंपराओं से परहेज है. लेकिन गांधी की बातों से मोदी का लगाव सियासी समझदारी ज्यादा है और जज्बाती कम. एक राजनैतिक कार्यकर्ता के अपने शुरुआती दौर से ही मोदी ये यकीन रखते हैं कि भारत की राजनीति की नब्ज समझने के लिए पहले गांधी को समझना होगा.

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प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने अपने तमाम कार्यक्रमों जैसे स्वच्छता अभियान को लेकर गांधी के विचारों का जिक्र किया है. वो गांधी का नाम संघ के किसी भी विचारक के मुकाबले ज्यादा लेते हैं. लंदन में मोदी ने गांधी के मंतर का जिक्र कोई पहली बार नहीं किया था. उन्होंने कई बार इसका हवाला दिया है. जैसे कि एक मेडिकल कॉलेज के कन्वोकेशन में 2015 में और 2017 में प्रशिक्षु आईएएस अधिकारियों से बातचीत में भी मोदी ने इसका हवाला दिया था.

आम आदमी को भागीदार बनाने की कोशिश

इस बात की मजबूत सियासी वजह है. जैसा कि खुद मोदी ने प्रसून जोशी से बातचीत में कहा भी. जब उनसे सीधा सवाल किया गया कि वो कैसे अपने कार्यक्रमों से आम जनता को जोड़ लेते हैं, तो प्रधानमंत्री मोदी ने विस्तार से समझाया कि गांधी की अनूठी खूबी ये थी कि वो अपने संघर्ष को आम आदमी से जोड़ लेते थे. मोदी शायद ये कहना चाह रहे थे कि उन्होंने अपना सियासी कौशल गांधी से सीखा. उनकी कोशिश अपनी हर पहल से आम आदमी को भागीदार बनाने की होती है. मोदी की नजर में समाज की बुनियादी ताकत किसी भी सरकार से ज्यादा होती है.

modi in westminster

अगर किसी और ने मोदी से उनके बारे में निजी सवाल किए होते, तो मोदी शायद इतना खुलकर जवाब नहीं देते. जैसे कि, जब जोशी ने उनसे बचपन में चाय बेचने के तजुर्बे के बारे में पूछा, तो मोदी ने कहा कि ये उनका बेहद निजी मामला है. मोदी ने कहा कि, 'उस तजुर्बे ने मुझे बहुत कुछ सिखाया'. एक चालाक राजनेता की तरह, जो कि वो हैं ही, मोदी ने एक झटके में गरीबों से अपना दामन जोड़ लिया और ये संदेश दिया कि वो देश के आम लोगों के बीच से ही आए हैं. प्रधानमंत्री के पद को वो वक्ती मानते हैं. गरीबों से अपने ताल्लुक को और मजबूती से दिखाने के कलिए मोदी ने कहा कि, 'मुझे गरीबी की पढ़ाई करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि मैंने गरीबी में जीवन जिया है'.

लेकिन व्यावहारिक राजनीति को तरजीह

गरीबों से नाता जोड़ने के बाद मोदी ने अपना ताकतवर नेता वाला रूप दिखाने में भी हिचक नहीं दिखाई. पाकिस्तान का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि वो देश पर हमला करने वालों का पूरी ताकत से जवाब देंगे. मोदी ने कहा कि, 'ईंट का जवाब पत्थर से देंगे'. यानी देशहित के मसले पर गांधी के विचारों के प्रति उनका प्यार हद में रहता है और व्यवहारिक राजनीति को वो तरजीह देते हैं.

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पूरे आयोजन की सबसे खास बात ये थी कि उन्होंने विपक्ष को लेकर कोई तीखी टिप्पणी करने से बचने की कोशिश की. साफ है कि मोदी उस परंपरा को निभा रहे थे कि भारतीय नेता विदेशी सरजमीं पर विपक्ष के बारे में बुरी बातें नहीं कहते. मोदी ने नेहरू-गांधी परिवार का नाम लिए बगैर सिर्फ एक बार सियासी वंशवाद का जिक्र किया. इसके सिवा मोदी ने अपने कार्यक्रम में पिछली सरकारों के काम की तारीफ ही की. साथ ही उन्होंने ये भी दावा किया कि अगर 4 साल के उनके काम-काज की तुलना ईमानदारी से पिछली सरकारों से की जाए, तो उनका काम, पूर्ववर्ती सरकारों पर बीस ही बैठेगा.

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मोदी के लंदन में टाउनहॉल के कार्यक्रम में बहुत पढ़े-लिखे और आला दर्जे के संवाद वाली कोई बात नहीं थी. जैसा कि मोदी ने खुद कहा कि नोटबंदी जैसे आर्थिक मसलों पर वो उस तरह विद्वानों वाली भाषा में बात नहीं कर सकते, जैसे कि लॉर्ड मेघनाद देसाई जैसे लोग (लॉर्ड देसाई भी उस कार्यक्रम में लोगों के बीच मौजूद थे). लेकिन मोदी ने कहा कि वो समाज को समझते हैं.

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ये तय है कि सवाल उठेंगे कि आखिर मोदी ने भारत के लोगों से बात करने के लिए लंदन को क्यों चुना. वजह बिल्कुल साफ है. वेस्टमिंस्टर के सेंट्रल हॉल में हुए आयोजन को पूरी तरह नियंत्रित माहौल में किया गया. ये प्रधानमंत्री के साथ तमाम मसलों पर खुलकर बात करने की आदर्श जगह थी. मोदी ने इस कार्यक्रम में दिल खोलकर बात की और अपने व्यक्तित्व के कमजोर पहलू भी उजागर किए. वहीं प्रसून जोशी ने बिना जाहिर किए हुए, बेहद संवेदनशील तरीके से मोदी से संवाद में ज्यादा से ज्यादा बातें निकलवाने की कोशिश की. शायद ये भारत के टीवी एंकरों के लिए भी एक सबक है

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