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क्या सिर्फ निजी संबंधों के सहारे आसियान देशों को भारत के करीब ला पाएंगे पीएम मोदी?

चीन की बढ़ती ताकत से निपटने के लिए सामरिक और आर्थिक मोर्चे पर जोर लगाने के साथ हमें विदेश नीति में भी बदलाव करने की जरूरत है

Sreemoy Talukdar Updated On: Jan 28, 2018 08:40 PM IST

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क्या सिर्फ निजी संबंधों के सहारे आसियान देशों को भारत के करीब ला पाएंगे पीएम मोदी?

इस बार गणतंत्र दिवस पर 10 आसियान देशों के राष्ट्र प्रमुखों को बुलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक तरह से कूटनीतिक तख्तापलट किया है. राजपथ पर 69वें गणतंत्र दिवस की परेड में आए ये दस विदेशी मेहमान भारतीय कूटनीति की सबसे शानदार झांकी थी. इसने दुनिया भर में भारत के बढ़ते रणनीतिक कद का एहसास कराया. भारत ने आसियान देशों के राष्ट्राध्यक्षों को बुलाकर ये संदेश दिया है कि वो दक्षिण-पूर्व एशिया से नए सिरे से तालमेल बढ़ाने को तैयार है. ये वही इलाका है, जिससे भारत के ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंध रहे हैं.

गणतंत्र दिवस पर आसियान देशों के मेहमानों के आने से पहले भारत-आसियान संबंधों की 25 सालगिरह पर बैठक हुई थी. ये आसियान और भारत के बीच सीधी बातचीत के 15 बरस पूरे होने पर हुआ है. इस दौरान भारत और आसियान देशों के बीच रणनीतिक रिश्तों ने भी पांच बरस का सफर पूरा कर लिया है.

गणतंत्र दिवस पर 10 आसियान राष्ट्राध्यक्षों के आने के बड़े सियासी मायने हैं. इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने साझा मू्ल्यों और एक भविष्य के अपने संदेश पर जोर दिया. मोदी के कहने का मतलब ये था कि भारत और आसियान की तरक्की एक-दूसरे से जुड़ी हुई है.

दिल्ली घोषणापत्र से बढ़ा भारत का कद

इस मौके पर जारी 'दिल्ली घोषणापत्र' ने समुद्री रास्तों को सबसे लिए खुले रखने और प्रशांत महासागर क्षेत्र में किसी दबाव के बगैर आवाजाही की बात कही गई. मतलब साफ था. ये संदेश चीन के लिए था. हालांकि घोषणापत्र में चीन का जिक्र नहीं था.

इस घोषणा के जरिए समुद्री रास्तों पर किसी एक देश के कब्जे का विरोध किया गया. ये कहा गया कि समुद्री और आसमानी रास्ते सबके लिए हैं. तमाम विवादों के हल के लिए इस घोषणा में 1982 के संयुक्त राष्ट्र संघ के समुद्री कानून कन्वेंशन यानी UNCLOS का हवाला दिया गया. साथ ही सभी देशों ने एख सुर से कहा कि दक्षिणी चीन सागर में सभी देशों को मिलकर कोड ऑफ कनडक्ट पर जल्द से जल्द सहमति बनानी चाहिए.

भारत की छवि एक ऐसे देश की रही है जो खुद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कम करके पेश करता रहा है. ऐसे में आसियान देशों के साथ संबंध बेहतर करने का संदेश देकर भारत ने ये जताया है कि दक्षिण एशिया में वो अपना कद बढ़ा रहा है.

इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी का निजी संबंधों के आधार पर देशों से रिश्ते बनाने का खास अंदाज भी दिखा. पीएम मोदी सभी दस देशों यानी थाईलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलयेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, म्यांमार, कंबोडिया, लाओस और ब्रुनेई के राष्ट्राध्यक्षों से निजी तौर पर मिले.

69th Republic Day Parade

सूत्रों के मुताबिक हर नेता के लिए होटल में खास इंतजाम किए गए थे. उनके कमरों की चाभियों में उन देशों के झंडे अंकित किए गए थे. इन छोटी-छोटी बातों का खयाल रखना ये जताता है कि आसियान नेताओं पर अच्छी छाप छोड़ने के लिए काफी मेहनत की गई. आज भारत की विदेश नीति में एक नयापन और खुलापन साफ देखने को मिल रहा है. साफ है कि मोदी अपने इस दांव को अच्छे से खेलना जानते हैं. आखिर ये तरीका असरदार होता भी दिख ही रहा है.

थाईलैंड के इंस्टीट्यूट ऑफ सिक्योरिटी ऐंड इंटरनेशनल स्टडीज के कवि चोंगकित्तावोर्न ने सिंगापुर के अखबार द स्ट्रेट्स टाइम्स में लिखा कि, 'मोदी और आसियान देशों के अध्यक्ष सिंगापुर के पीएम ली सिएन लूंग के बीच तालमेल शानदार था. दोनों को एक-दूसरे का साथ पसंद है. ऐसा नहीं होता तो दसों आसियान देशों के प्रमुखों ने एक साथ दिल्ली आने का न्यौता मंजूर नहीं किया होता. भारत की गणतंत्र दिवस परेड के लिए ये बात ऐतिहासिक है.'

कवि चोंगकित्तावोर्न के कहने का मतलब ये था कि भले ही भारत, चीन से पैसे और प्रोजेक्ट के मामले में मुकाबला करने की हालत में न हो. लेकिन मोदी ने आसियान नेताओं के साथ बेहतर निजी रिश्ते जरूर कायम कर लिए हैं.

भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी में है विरोधाभास

फिर ये सवाल तो है ही कि निजी ताल्लुकात क्या हमारी सामरिक चुनौतियों से निपटने में मददगार होंगे? क्या कोई नेता निजी संबंध की बुनियाद पर दो देशों के रिश्तों को नई ऊंचाई पर ले जा सकता है. ये सवाल इसलिए और अहम होते जा रहे हैं क्योंकि भारत अब चीन की चुनौती से निपटने के लिए पूरी ताकत लगा रहा है. चीन की बढ़ती ताकत से निपटने के लिए सामरिक और आर्थिक मोर्चे पर जोर लगाने के साथ हमें विदेश नीति में भी बदलाव करने की जरूरत है.

इसमें कोई शक नहीं कि मोदी ने नीति बनाने में एक नया जोश भरा है. वो हमेशा ये मानते हैं कि हम कुछ भी कर सकते हैं. फिर कोशिश करने में क्या हर्ज है. लेकिन मोदी के सामने बड़ी चुनौती अफसरशाही की है, जो किसी भी नई चीज के लिए तैयार नहीं है. हमारे पास संसाधनों की भी कमी है. दिक्कत इस बात की भी है कि दुनिया से जुड़ने के हमारे तमाम प्रोजेक्ट इतनी धीमी गति से चल रहे हैं कि जब तक हम आगे बढ़ते हैं, दूसरे बहुत आगे निकल चुके होते हैं.

यह भी पढ़ें: आसियान में भारत के दखल से चीन को मिलेगी चुनौती, दोस्ताना संबंधों को और मजबूत करने की जरूरत

आज की तारीख में दुनिया की राजनीति में उठा-पटक मची हुई है. दक्षिणी-पूर्वी एशिया में चीन बड़ी ताकत बन गया है. वहीं इकलौती सुपरवार यानी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी घरेलू नीतियों और 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति पर जोर दे रहे हैं. चीन की बदले की भावना वाली नीति और उससे सीधे निपटने में भारत की हिचक साफ दिखती है. ऐसे में भारत अपनी कमियों के साथ मौजूदा रिश्तों को और बेहतर बना पाता है, ये देखना होगा.

modi in asean summit

भारत की विदेश नीति की 'एक्ट ईस्ट' पॉलिसी में ये विरोधाभास साफ दिखता है. मोदी की महत्वाकांक्षा और कोशिशों के बावजूद भारत, आसियान देशों की उम्मीदों को पूरा करता नहीं दिखता है. इस रिश्ते में अभी भी अपार संभावनाएं हैं जिनका पूरी तरह से दोहन नहीं हो पा रहा है.

भारत आज भी एशिया-पैसिफिक इकोनॉमिक कोऑपरेशन के साझीदार देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौते से हिचक रहा है. भारत को डर है कि इससे उसके कृषि क्षेत्र को नुकसान होगा. भारत को डर है कि आसियान देश और चीन उसके बाजार पर हावी हो जाएंगे. भारत को चीन और आसियान देशों से और भी चुनौतियां दिखती हैं.

चीन को लेकर आसियान देशों में एकजुटता की कमी

एक बात और है. आसियान देशों मे भी चीन को लेकर एकजुटता की कमी दिखती है. यही वजह है कि भारत, आसियान को देशों का एकजुट समूह मानकर उसके आधार पर अपनी रणनीति तैयार करने का जोखिम नहीं ले सकता. दक्षिणी चीन सागर में चीन के आक्रामक रुख और बदले की भावना से काम करने के बावजूद, आसियान देश आज तक चीन के खिलाफ एकजुट होकर मोर्चा नहीं बना सके हैं.

2012 में इसकी मिसाल साफ दिखी थी. दक्षिणी चीन सागर में चीन की हरकत की निंदा करने वाले प्रस्ताव पर आसियान देशों में सहमति नहीं बन सकी. इसके चलते 45 साल के आसियान के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि साझा बयान जारी नहीं हो सका था. फिलीपींस और वियतनाम ने इसके लिए कंबोडिया को जिम्मेदार ठहराया था. कंबोडिया ने दूसरे देशों पर उंगली उठाई थी.

पांच साल बाद 2017 में आसियान बैठक के दौरान फिलीपींस के रुख में अचानक बदलाव दिखा. फिलीपींस के राष्ट्रपति रोडरिग दुतर्ते ने कहा कि दक्षिणी चीन सागर में द्वीपों पर चीन के कब्जे और किलेबंदी को लेकर चर्चा बेमानी है. दुतर्ते ने कहा कि वो चीन के साथ कोई तनातनी नहीं चाहते.

ऐसे में भारत के लिए आसियान की बुनियाद पर कोई नीति बनाना जोखिम भरा कदम होगा. क्योंकि, भारत आसियान देशों को सुरक्षा की गारंटी दे नहीं सकता.

लंदन के किंग्स कॉलेज के प्रोफेसर हर्ष वी. पंत ने द डिप्लोमैट में लिखा कि, 'दूसरे देशों को बाजार, आर्थिक मदद और विकास के लिए पैसा मुहैया कराने की भारत की क्षमता बेहद सीमित है. आसियान देश अगर इलाके की स्थिरता के लिए भारत से कोई उम्मीद करते हैं, तो भारत उस उम्मीद पर भी मुश्किल से ही खरा उतरने की स्थिति में है. भारत को अन्य ताकतों की फिक्र ज्यादा हो जाती है. ऐसे में आसियान और भारत के बीच रिश्ते बेहतर भले हो रहे हों, लेकिन इनके नई ऊंचाई पर पहुंचने की उम्मीद कम है. इस मुद्दे पर अभी ईमानदारी से चर्चा होनी बाकी है.'

भारत के पास है दूरगामी नीति का अभाव

भारत के पास आसियान से रिश्तों को लेकर कोई दूरगामी रणनीति भी नहीं है. ऐसे में सिर्फ कुछ बड़े संकेत देने से काम नहीं चलने वाला. भारत को जमीनी सच्चाई के हिसाब से आगे बढ़ना होगा. आज की तारीख में भारत और आसियान के बीच सहयोग के 30 से ज्यादा मंच हैं. दोनों पक्षों के बीच कई मंत्रिस्तरीय वार्ताएं भी होती हैं. दोनों पक्षों के नेताओ की सालाना बैठकें भी होती है. इसके मुकाबले, चीन 48 मंचों के जरिए अपने और आसियान के बीच रिश्तों को चलाता है.

प्रोजेक्ट पूरे करने के मामले में भारत का रिकॉर्ड बेहद खराब है. जबकि आज की तारीख में कनेक्टिविटी वाले प्रोजेक्ट, दुनिया में अपनी ताकत बढ़ाने के सबसे अच्छे तरीके के तौर पर इस्तेमाल हो रहे हैं. आसियान और भारत की तरफ से जारी साझा बयान में कहा गया है कि भारत-म्यांमार-थाईलैंड के बीच हाइवे प्रोजेक्ट को जल्द से जल्द पूरा किया जाएगा. आगे चलकर इसमें कंबोडिया, लाओस और वियतनाम को भी जोड़ा जाना है. ये प्रोजेक्ट लंबे समय से अटका हुआ है.

Leaders from the ASEAN and their Dialogue Partners which comprises the East Asia Summit or EAS chat following a brief group photo session at the ongoing 31st ASEAN Summit November 14, 2017 in Manila, Philippines. From left, U.S. Secretary of State Rex Tillerson (representing U.S. President Donald Trump), New Zealand Prime Minister Jacinda Ardern, Indian Prime Minister Narendra Modi, Chinese Premier Li Keqiang, Philippine President Rodrigo Duterte, Singaporean Prime Minister Lee Hsien Loong, Australian Prime Minister Malcolm Turnbull, Japanese Prime Minister Shinzo Abe. REUTERS/Bullit Marquez/Pool - RC1396646AB0

चुलालोंगकोर्न यूनिवर्सिटी के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर सुथीफंद चिराथिवत और रिसर्चर अनुपमा देवेंद्र कुमार ने द वायर की देविरूपा मित्रा को बताया कि दूसरे देशों को जोड़ने वाले प्रोजेक्ट को वक्त पर पूरा करने में भारत की नाकामी, इसके इरादों की कमजोरी को बयां करते हैं. वो कहते हैं कि ऐसे प्रोजेक्ट के जरिए ऐतिहासिक रिश्तों को नई ऊर्जा मिलती है. तमाम देशों के बीच तालमेल और सांस्कृतिक मेल-जोल बढ़ता है. देशों के बीच आपसी भरोसा भी जगता है. आर्थिक नजरिए से देखें तो कनेक्टिविटी बेहतर होने से कारोबार सस्ता होता है. सिर्फ आयात पर टैक्स घटाने और मुक्त व्यापार समझौतों से दो देशों के बीच कारोबार नहीं बढ़ता.

भारत और आसियान के बीच कारोबार 1993 में 2.9 अरब डॉलर से बढ़कर 2016 में 58.4 अरब डॉलर का हो गया था. लेकिन ये भी आसियान के कुल व्यापार का महज 2.6 प्रतिशत ही है. सिंगापुर के प्रधानमंत्री ने हाल ही में इस बात पर अफसोस जताया था. इसमें और बेहतरी इसलिए नहीं हो पा रही है कि भारत लगातार अपना बाजार आसियान देशों के लिए खोलने में आनाकानी करता रहा है. इस वजह से आसियान और भारत के बीच क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक सहयोग भी नहीं बढ़ पा रहा है. ये समझौता पूरा करना अभी भी एजेंडे में ही है.

भारत और आसियान देशों के बीच रिश्ते दो हजार साल से भी ज्यादा पुराने हैं. दोनों देश भौगोलिक रूप से भी करीब हैं. यानी दोनों कुदरती साझीदार हैं. ऐसे में दोनों सहयोगियों के बीच आर्थिक सहयोग के साथ-सात सामाजिक-सांस्कृतिक और सामरिक सहयोग भी बढ़ना चाहिए. ये बढ़ा भी है. मगर अभी भी इसमें सुधार की काफी गुंजाइश है. दोनों के बीच उम्मीदों और भरोसे की खाई गहरी है. इसे पाटने के लिए सिर्फ गणतंत्र दिवस पर आमंत्रण जैसे सांकेतिक कदम से काम नहीं चलने वाला.

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