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भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना: लालफीताशाही की वजह से अब तक अधूरा

फ़र्स्टपोस्ट को कुछ अहम विभागों के दस्तावेज मिले हैं जिसके अनुसार दागी और बेईमान अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की रफ्तार बहुत धीमी है

Updated On: Mar 20, 2018 10:20 PM IST

Yatish Yadav

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भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना: लालफीताशाही की वजह से अब तक अधूरा

जब नरेंद्र मोदी ने 2014 में दिल्ली की गद्दी संभाली तो उन्होंने पूरी व्यवस्था को सुधारने का फैसला लिया था. उनकी सरकार ने नौकरशाही के काम करने के तरीके को बदलने की योजना बनाई और भ्रष्ट अधिकारियों को सजा देने का फैसला किया.

लेकिन चार साल बीतने के बावजूद आज भी नौकरशाही उसी ढर्रे पर काम कर रही जिस पर वो हमेशा से काम करती रही है. जहां तक भ्रष्ट और दागी बाबुओं पर कार्रवाई की बात है तो वो ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’ जैसी बात है. आज भी व्यवस्था की सफाई के लिए जरूरी, दागी अधिकारियों पर कार्रवाई बहुत धीरे धीरे चल रही है और अपने निर्धारित लक्ष्य से बहुत पीछे है.

फ़र्स्टपोस्ट को कुछ अहम विभागों के दस्तावेज मिले हैं जिसके अनुसार दागी और बेईमान अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की रफ्तार बहुत धीमी है. अप्रत्यक्ष कर पर नजर रखने वाले एक महत्वपूर्ण विभाग सेंट्रल बोर्ड ऑफ एक्साइज एंड कस्टम्स (सीबीईसी) में विजलेंस के मामलों में कार्रवाई में बाधाएं खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही.

काम में तेजी नहीं

फ़र्स्टपोस्ट को मिले एक सीबीईसी नोट के मुताबिक वर्तमान में 263 अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई चल रही है. खास बात ये है कि ये आंकड़ा वहां कुल काम करने वालों का 6.38 फीसदी है. भारतीय रेवेन्यू सर्विस कस्टम और सेंट्रल एक्साइज के ग्रुप ‘ए’ के अधिकारियों की कुल संख्या लगभग 4122 है.

ग्रुप ‘ए’ के अधिकारी एग्जिक्यूटिव लेवल के कर्मचारी हैं जो चीफ कमिश्नर, कमिश्नर, एडिशनल कमिश्नर, ज्वाइंट कमिश्नर डिप्टी और असिस्टेंट कमिश्नर के रूप में तैनाती हैं.

सबसे ज्यादा हैरानी की बात ये है कि कुछ अधिकारियों के खिलाफ विजिलेंस जांच पिछले 10 सालों से पेंडिंग है. कथित रूप से एक भ्रष्ट अधिकारी के खिलाफ सीबीईसी नोट में लिखा हुआ है कि सरकारी कर्मचारी को अपने बचाव में लिखित रूप से देने के लिए 15 दिनों का वक्त मिलता है. इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है. लेकिन यह एकबार में 15 दिनों से ज्यादा के लिए नहीं हो सकता है. इसके बाद जांच अधिकारी को मामले पर अपनी रिपोर्ट पेश करनी पड़ती है. किसी भी जांच अधिकारी को नियुक्ति के 6 महीने के भीतर यह रिपोर्ट देनी पड़ती है.

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि प्रक्रियाओं के बाद भी भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ चल रहे मामले इतना लंबा क्यों खिंच जाते है?

एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपना नाम न छापने की शर्त पर खुलासा किया कि इस मामले को पिछले साल अपनी नियुक्ति के बाद सीबीईसी के चेयरमैन वनजा एन सरना ने उठाया था. सरना ने दोषी अधिकारियों के खिलाफ चल रही कार्रवाई में तेजी लाकर उन्हें सजा दिलाने का निर्देश दिया था.

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सीबीईसी के चेयरमैन ने अपने विभाग में अधिकारियों को चेतावनी देते हुए कहा है कि जिसने भी भ्रष्ट अधिकारियों की जांच को लटकाने का प्रयास किया उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी. चेयरमैन सरना ने इस संबंध में 30 अगस्त 2017 को एक चिट्ठी भी लिखी जिसमें उन्होंने जिक्र किया है कि किस तरह से दोषी बाबुओं के खिलाफ कार्रवाई को बिना वजह खींचा जा रहा है. पत्र में सरना ने स्पष्ट किया है कि बोर्ड इस लापरवाही के खिलाफ गंभीर है.

विभिन्न विभागों और मंत्रालयों में भ्रष्टाचार के पर नजर रखने वाली सर्वोच्च संस्था केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) के मुताबिक अप्रत्यक्ष कर संग्रहण से जुड़ी हुई सीबीईसी एक संवेदनशील संस्था है जो कि सरकार की महत्वपूर्ण नीतियों से जुड़े क्रियाकलापों से संबंधित कार्य करती है.

नौकरशाही के जाल में उलझे मामले

सीवीसी के नोट के मुताबिक राजस्व संग्रह में टैक्स प्रशासकों की अहम भूमिका होती है. ऐसे में उनका महत्व इन मसलों में काफी ज्यादा होता है. इन्हें संपत्ति पर कब्जे या आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामलों की समझ होती है. लिहाजा इनका महत्व बढ़ जाता है.

टैक्स प्रशासकों को मालूम होता है कि टैक्स की चोरी करने वालों से कैसे निपटना है. कई लोगों को टैक्स चोरी करने की आदत होती है. इसके अलावा इंपोर्टर, एक्सपोर्टर और उत्पादक भी कई बार टैक्स चोरी के लिए अपने सामान या संपत्ति के गलत आंकड़े पेश करते हैं. उन सब लोगों की चोरी पर नकेल कसने में टैक्स अधिकारियों की भूमिका रहती है.

लेकिन जांच अधिकारी की भूमिका तब ही सामने आती है जब कोई कस्टम अधिकारी किसी स्मगलर या कर चोरी करने वाले को छोड़ता हुआ मिले. ऐसे में किसी भी टैक्स कलेक्टर जिसकी जिम्मेदारी टैक्स चोरों को पकड़ने या स्मगलरों को दंडित करने की हो उसका पूरा निर्णय उसके विवेक पर निर्भर करता है ऐसे में उन अधिकारियों की शक्तियों का दुरुपयोग होने की पूर्ण संभावना होती है.

हमारी बहुत कोशिशों के बाद भी सीबीईसी की चेयरमैन वंजना सरना और डायरेक्टर जनरल विजिलेंस आर के बर्थवाल से इस मुद्दे पर बात नहीं हो पाई. बर्थवाल को इस मुद्दे से जुड़े प्रश्नों की एक विस्तृत सूची भी भेजी गई जिसका उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.

1998 से 2002 तक केंद्रीय सतर्कता आयोग के मुखिया रह चुके ए. विट्ठल स्वीकर करते हैं कि दोषी और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने में संबंधित विभाग नाकाम साबित हुए है. ऐसे में भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने का दावा खोखला साबित हुआ है.

फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में पूर्व सीवीसी प्रमुख ने कहा कि सरकार को चाहिए कि वो सतर्कता विभाग को और शक्तियां दे ताकि वो उन मामलों में भी कार्रवाई कर सकें जिसमें विभिन्न विभाग और मंत्रालय अपने दोषी कर्मचारियों और अधिकारियों की फाइल पर उन्हें बचाने के लिए कुंडली मार कर बैठा हो. विट्ठल का दावा है कि सरकार को दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के बाद लोगों का खूब समर्थन मिलेगा.

विट्ठल का कहना है कि औरों के मुकाबले दागी और भ्रष्ट अधिकारियों को नियम कानूनों की पूरी जानकारी होती है और वो उसका जमकर दुरूपयोग करते हैं. अगर किसी विभाग का मुखिया किसी पर कार्रवाई करने से डरता या हिचकता है तो ऐसे मामलों को सरकार को सीवीसी को सौंप देना चाहिए जिससे कि वो इन मामलों में आवश्यक कार्रवाई कर सकें.

नियम कानून की आड़ में छिपना

यहां पर पी सी होता कमिटी के बारे में जानकारी देना उचित है. यूपीए सरकार ने नौकरशाही में बढ़ते भ्रष्टाचार और अनुशासन की कमी के बढ़ते मामलों के देखते हुए पी सी होता कमिटी बनायी थी. कमिटी की रिपोर्ट को सचिवों के एक पैनल ने परखा और सिफारिश की कि सरकारी मशीनरी इन मामलों में तुरंत दखल दे.

उन्हीं सिफारिशों में एक को सरकार ने 14 अक्टूबर 2013 को स्वीकार करते हुए कहा कि 'प्रायोगिक रूप से जितना संभव हो सके एक जांच अधिकारी को भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की सुनवाई प्रतिदिन करनी चाहिए जिससे कि जल्द से जल्द जांच पूरी हो सके.

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प्रत्येक जांच अधिकारी को एक ऑर्डर शीट को व्यवस्थित करके रखने की जिम्मेदारी भी दी गई है जिसमें प्रतिदिन सुनवाई में जांच और उससे जुड़ी सभी संबंधित बातें दर्ज करनी होती है. अगर संबंधित जांच अधिकारी प्रतिदिन जांच की सुनवाई नहीं कर पा रहे तो उन्हें उस ऑर्डर शीट में ये स्पष्ट करना चाहिए कि क्यों जांच की कार्रवाई प्रतिदिन नहीं हो पा रही है.'

यहां तक एनडीए सरकार ने इस संबंध में कदम उठाए हैं. मिनिस्ट्री ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग ने भी 15 मार्च 2017 को फाइल संख्या 106/7/2015-AVD के माध्यम से निर्देश दिए हैं कि किसी भी कीमत पर दागी अधिकारी पर किसी तरह की जांच का आरोप तय होने के बाद 45 दिनों से ज्यादा समय जांच में नहीं लगना चाहिए.

क्या होता है जांच के बाद?

लेकिन जांच के बाद और सीवीसी की सिफारिशों के बावजूद जो नौकरशाही व्यवस्था में होता है, उसकी अपनी अलग दुख भरी कहानी है. पिछले साल अक्टूबर में सीवीसी की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया कि 31 अधिकारियों के खिलाफ जांच की स्वीकृति मिलने का मामला पिछले साल जुलाई से ही लटका हुआ है. इस सूची में 5 आईएएस अधिकारी भी शामिल हैं जो कि कार्मिक मंत्रालय, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय, कोयला मंत्रालय में कार्य कर रहे हैं. जबकि एक आइएएस अपने गृह कैडर आंध्र प्रदेश में कार्य कर रहा है.

उसी तरह से एक अन्य मामले में जिसकी केस संख्या RC-12 –A-/2011, AC-II है, दागी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग सितंबर 2014 में ही की गई थी लेकिन सरकारी व्यवस्था में उस उनुरोध को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया. और आज तक दागी अधिकारी का बाल तक बांका नहीं हो सका है.

उसी तरह से पंजाब नेशनल बैंक का एक ब्रांच मैनेजर केस संख्या RC-6S/2015, EOW में दोषी पाया गया और उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए 10 नवंबर 2016 को लिखा गया. इसके बावजूद बैंक प्रबंधन के कानों पर जूं तक न रेंगी और आज तक उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है. वैसे ये वो ही पंजाब नेशनल बैंक है जो अपने अधिकारियों के भ्रष्टाचार की वजह से ही जालसाज नीरव मोदी के 12 हजार करोड़ रुपए लेकर भागने के मामले से जूझ रहा है.

सीवीसी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि 31 जनवरी 2018 तक कम से कम 28 केसों में कार्रवाई की मंजूरी की फाइल पिछले 4 महीनों से दफ्तरों में टेबलों के चक्कर काट रही है. सीवीसी के मुताबिक एक अधिकारी जिसकी फाइल संख्या RC-55 (A)/2012, ACB, चेन्नई थी और उसकी जांच सीबीआई कर रही थी वो अधिकारी अब रिटायर हो गया है.

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ( RC-4-E/2015, BS&FC, मुंबई और RC-1-E/2015 BS&FC, मुंबई) के छ बड़े अधिकारियों के खिलाफ और रक्षा मंत्रालय (File No. RC-2-A/2016, ACB, CBI, हैदराबाद) के 13 अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई अभी तक पेंडिंग पड़ी हुई है. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और रक्षा मंत्रालय के सतर्कता विभाग के विभाग के प्रमुखों का कई कोशिशों के बावजूद इस मामले पर उनका बयान नहीं मिल सका. एसबीआई के शिवा कुमार को इस मामले पर जवाब के लिए हमने प्रश्नों की एक सूची भी भेजी लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया.

इन सुझावों पर अमल जरूरी

दोषियों पर कार्रवाई की मांग के साथ साथ सीवीसी ने ईमानदार अधिकारियों पर भी अपने सुझाव दिए हैं. सीवीसी के मुताबिक ईमानदार अधिकारियों को जो आम लोगों के भले के लिए निर्णय ले रहे हैं उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाए.

पूर्व सीवीसी मुखिया ए विट्ठल कहते हैं कि किसी भी अधिकारी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने से पहले उस अधिकारी के लिए गए फैसले के उद्देश्यों पर जरूर ध्यान देना चाहिए. विट्ठल कहते हैं कि हमें निश्चित रुप से ईमानदार अधिकारियों को बचाना चाहिए लेकिन जो अधिकारी भ्रष्ट और बेईमान हैं और पूरे सिस्टम को गंदा करने में लगे हुए हैं उन्हें सजा अवश्य मिलनी चाहिए.

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इस साल जनवरी में सीवीसी ने अधिकारियों पर आर्थिक दंड लगाने की सलाह दी है. अलग अलग मंत्रालय और विभागों के 135 दागी अधिकारियों के खिलाफ इसकी अनुशंसा की गई है जिसमें सबसे ज्यादा 20 अधिकारी सिंडिकेट बैंक के हैं जबकि रेल मंत्रालय के 15 अधिकारी शामिल हैं.

सतर्कता विभाग ने 46 व्हिसल ब्लोअर्स की शिकायतों समेत कुल 3072 शिकायतों पर संज्ञान लिया और 30 मामलों में संबंधित विभाग से जांच रिपोर्ट पेश करने को कहा है.

ढीला पड़ा सिस्टम

सीवीसी के मुताबिक उन्होंने कोयला मंत्रालय को 6 अधिकारियों के खिलाफ बड़ा जुर्माना लगाने को कहा है. उसी तरह से रक्षा मंत्रालय के भी 5 अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा गया है.

इसी जनवरी में सक्षम अधिकारियों द्वारा 11 दोषी अधिकारियों के खिलाफ जांच की अनुमति दी गई है. इसमें सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय के 3 अधिकारी शामिल हैं. इसके अलावा रेल और वाणिज्य मंत्रालय के भी 2-2 अधिकारियों के खिलाफ जांच की अनुमति मिली है.

1966 बैच के आइएएस अधिकारी और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालास्वामी ने फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में कहा कि पूरा सिस्टम ढीला पड़ चुका है. यहां पर केस सालों तक चलते रहते हैं.

गोपालास्वामी कहते हैं कि दुर्भाग्य से हम लोगों ने एक ऐसा सिस्टम बना दिया है जो भ्रष्टाचारियों की मदद करता है. ऐसे में जब तक हम भ्रष्टाचार के लड़ने के लिए जमीनी स्तर पर कार्य नहीं करेंगे तब तक देश में भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होगा. गोपालास्वामी का कहना है कि देश में अधिकारियों और नेताओं ने ये समझ लिया है कि अगर वो भ्रष्टाचार के आरोप में पकड़े भी गए तो अगले 10-15 सालों तक उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है.

गोपालास्वामी का मानना है कि ऐसे में जरूरी है कि सोच में बदलाव लाया जाए और ईमानदारी से काम करने वालों को पुरस्कृत किया जाए और दागी और भ्रष्ट अधिकारियों को दंडित किया जाए.

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