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मोदी ने अपना जॉब प्रोफाइल खुद लिखा था, अब करें रिव्यू

मोदी ने 2014 चुनाव ऐसे लड़ा मानो सरकार नहीं, एक पीएम चुनना है. सरकार बाद में चुनी जाएगी.

Updated On: Dec 17, 2016 05:59 PM IST

Vinod Verma

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मोदी ने अपना जॉब प्रोफाइल खुद लिखा था, अब करें रिव्यू

देश के अब तक के प्रधानमंत्रियों और नरेंद्र मोदी में बहुत फर्क है. संविधान के अनुसार माना जाता था कि प्रधानमंत्री चुने गए सांसदों में से एक है. समान लोगों में से अव्वल. अंग्रेजी में कहते हैं, फर्स्ट अमंग इक्वल्स. लेकिन मोदी जी इस समता के नियम से परे हैं. वो सिर्फ फर्स्ट हैं. अव्वल. और यह उन्होंने चुनाव होने से पहले ही सुनिश्चित कर लिया था.

मई 2014 का चुनाव उन्होंने इस तरह से लड़ा मानो देश को सरकार नहीं, एक प्रधानमंत्री चुनना है. बाद में वह सरकार चुन लेगा. ठीक वैसा ही जैसा अमेरिका में राष्ट्रपति चुना जाता है. वे ऐतिहासिक बहुमत से चुनकर आए. कोई और चुनाव होता तो कहते कि बीजेपी को बहुमत मिला. लेकिन इस बार ऐसा नहीं था.

उनके तेवर ही अलग थे. मैं, मैं और मैं. अच्छे दिन मैं लाऊंगा. कालाधन वापस मैं लाऊंगा. आपके खातों में 15 लाख मैं डलवाऊंगा. किसानों को फसल की दोगुनी कीमत मैं दिलवाऊंगा. युवाओं को रोजगार मैं दिलवाऊंगा, आदि आदि. लेकिन चुनाव के बाद एकाएक वे विनम्र हो गए.

अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को देश का प्रधान सेवक कहलाना पसंद करते हैं. गूगल में आप प्रधानसेवक शब्द सर्च करें तो उनकी ही तस्वीर आती है. सामग्री भी उनसे जुड़ी हुई मिलती है.

जॉब प्रोफाइल तय रहा, अब! 

सेवक वे सेवा की दृष्टि से कहते होंगे. लेकिन इसे नौकरी वाली सेवा की तरह भी देखा जा सकता है. अगर ये नौकरी है, तो इसकी शर्तें भी हैं. चूंकि प्रधानमंत्री जी को कॉर्पोरेट बहुत पसंद है, चलिए इसे किसी कॉर्पोरेट की नौकरी मान लेते हैं. इंडिया कॉर्पोरेट.

कॉर्पोरेट की नौकरियों की एक खासियत होती है. सरकारी नौकरी से एकदम अलग. यहां नौकरी की शर्तें तो जो होती हैं वो होती हैं, आपको यह भी बताना होता है कि आप क्या ऐसा करेंगे जो दूसरे नहीं कर सकते.

इंडिया कॉर्पोरेट के प्रधान सेवक पद के लिए आवेदन देते समय वे खुद ही देश से वादा करते चल रहे थे. यानी अपना ‘जॉब प्रोफाइल’ अपने लिए वे खुद लिख रहे थे. उनके हर वादे के साथ लोगों के सपने जुड़ रहे थे.

कालाधन खत्म, भ्रष्टाचार खत्म, न खाऊंगा और न खाने दूंगा. बेरोजगारी खत्म, कश्मीर समस्या खत्म, पाकिस्तान की ओर से आने वाले आतंकवादी भी खत्म और चीन की दादागिरी खत्म.

अब चूंकि उनके कार्यकाल का आधा समय बीत चुका है तो इंडिया कॉर्पोरेट उनके जॉब प्रोफाइल और परफॉर्मेंस के बीच एक मध्यावधि आकलन यानी मिड-टर्म रिव्यू कर सकता है. यह कॉर्पोरेट में एक सामान्य प्रक्रिया है.

मिड टर्म रिव्यू क्यों? 

समर्थक इस आकलन को गलत ठहराते हैं. उनका कहना है कि मोदी जी को समय देना चाहिए. पांच साल बाद आकलन कीजिएगा. लेकिन मोदी जी जानते हैं कॉर्पोरेट में इतना धैर्य नहीं होता. सो यह आकलन का सही समय है.

चुनाव के समय जो वादे उन्होंने किए थे या अपना जो जॉब प्रोफाइल उन्होंने लिखा था उसके अनुसार तो कुछ ठोस हुआ दिखता नहीं है.

न रेलवे में, न कृषि में, न उद्योग में न कारोबार में, न कश्मीर में न पाकिस्तान में.

उल्टे रेलवे में किराया बेतहाशा किराया बढ़ा है, कश्मीर सबसे लंबे समय तक कर्फ्यू के साए में रहा है और पाकिस्तान की ओर से हमले बदस्तूर जारी है. जिस पाकिस्तान से एक के बदले दस सिर लाने थे, वहां वे केक खाने बिना सूचना भी चले जा रहे हैं.

कुछ लोग कहते हैं कि पहल कर दी गई है, परिणाम देर से आएंगे. मसलन मेक इन इंडिया शुरू हो गया है, स्वच्छ भारत अभियान चल रहा है, बेटी बचाओ चल रहा है, जनधन अभियान चल रहा है वगैरह वगैरह.

लेकिन इन विशेषज्ञों का क्या करें जो किसी भी मामले में मोदी जी के साथ खड़े नहीं दिख रहे. वे कह रहे हैं कि योजना के स्तर पर ठीक है लेकिन परिणाम नहीं दिख रहे हैं.

नरेंद्र मोदी

वो जो जॉब प्रोफाइल में नहीं था

ऐसे बहुत से काम उनके कार्यकाल में हुए हैं जिनका जिक्र उनकी जॉब प्रोफाइल में नहीं था. मसलन उन्होंने कभी नहीं कहा था कि वे देश को देशभक्त और देशद्रोही की दो श्रेणियों में बांट देंगे, लेकिन ऐसा हो गया.

उन्होंने कभी नहीं कहा था कि गाय एकाएक इतनी पवित्र हो जाएगी कि लोग बीफ तलाश करेंगे और जरा सा भी शक हुआ तो मामला तुरंत निपटा देंगे.

उन्होंने यह कभी नहीं कहा था कि वे देश का काला धन निकालने के लिए नोटबंदी जैसा कुछ बड़ा करेंगे. दरअसल वादा तो विदेश में जमा काला धन लाने का था.

उन्होंने कभी नहीं कहा था कि मीडिया के भीतर एक तरह का खौफ भर देंगे. लेकिन ऐसा उन्होंने कर दिखाया है. पत्रकार एक बार न भी डरे, मीडिया संस्थानों के सारे मालिकान थरथर कांप रहे हैं, बेचारा नौकर पत्रकार क्या करेगा?

उच्च शिक्षा में छात्रवृत्ति का बंद होना, जेएनयू का नक्सल प्रभावित इलाका घोषित होना और मनरेगा जैसे कानून का सरेआम उल्लंघन, कुछ ऐसे काम हैं जो कहे नहीं गए थे लेकिन हो गए.

ओल्ड एजेंडा हो गया ठंडा

वे काम भी दुर्भाग्य से नहीं हो पाए, जो लोग सोच रहे थे कि हो ही जाएंगे. मसलन अनुच्छेद 370 का फैसला, समान सिविल कोड लागू करना और राममंदिर का निर्माण शुरू होना.

स्वाभाविक ही है क्योंकि 1980 में पार्टी के गठन के बाद से ही भाजपा कहती आई थी कि हमारा बहुमत आया तो हम ये तीनों काम पहले करेंगे. लेकिन प्रधान सेवक ने अपने ही लोगों को ठग लिया.

कश्मीर में उनके साथ सरकार बनाई जो अनुच्छेद 370 खत्म करने से पहले गठबंधन खत्म कर लेगी. तीन तलाक पर थोड़ी चर्चा शुरू हुई है लेकिन उसे कॉमन सिविल कोड पर चर्चा नहीं कह सकते. राम मंदिर पर तो अभूतपूर्व चुप्पी है.

नोटबंदी ने इंडिया कॉर्पोरेट की मानों परीक्षा ले ली है. और अब कॉर्पोरेट इंडिया अधीर दिखता है कि वह अपने प्रधान सेवक से सवाल पूछे. लेकिन फिलहाल इस कॉर्पोरेट के पास ऐसा कोई ढांचा या जरिया नहीं है जिससे कि यह सवाल पूछकर उसका जवाब पाया जा सके.

लिहाजा प्रधान सेवक के पास अभी ढाई साल और हैं कि वह अपने जॉब प्रोफाइल के अनुरूप काम करके दिखाए.

अभी उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनावों से एक परीक्षा और होगी. फिर कुछ राज्यों के चुनाव और होंगे. इसके बाद इंडिया कॉर्पोरेट अपने प्रधान सेवक का अंतिम आकलन 2019 में ही करेगा. तब तक धैर्य से प्रधान सेवक के कार्यों का आकलन करते रहिए.

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