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मोदी की 'ट्रिस्ट विद जीएसटी' vs नेहरू की 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी'- तुलना फालतू है

मोदी जो कुछ भी करते रहे हैं, वह साफ तौर पर राजनीति की स्थापित मान्यताओं के खिलाफ है

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Jul 04, 2017 12:49 PM IST

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मोदी की 'ट्रिस्ट विद जीएसटी' vs नेहरू की 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी'- तुलना फालतू है

जब संसद 30 जून की आधी रात को जीएसटी लागू करने के लिए बैठी तो कांग्रेस और कुछ दूसरी विरोधी पार्टियों ने इस उत्सव को 'तमाशा' बताते हुए बहिष्कार कर दिया. साथ ही कहा कि इस मौके को 'जीएसटी से मिलन' के तौर पर गढ़ने की कोशिश की गई है ताकि 1947 के यादगार 'नियति से मिलन (Tryst With Destiny) के साथ इसकी तुलना हो. या फिर, प्रधानमंत्री मोदी खुद को जवाहरलाल नेहरू के समकक्ष कर सकें.

'पारंपरिक समझ यानी कंवेंशनल विज़डम' का तकाजा कहता है कि जीएसटी 'आजादी के बाद सबसे बड़ा सुधार' है लेकिन यह अपने आप में आजादी बिल्कुल नहीं है. इसलिए आश्चर्य नहीं कि इन दोनों में तुलना की वजह से नरेंद्र मोदी पर हमले हों. दरअसल विरोधी मान रहे थे कि इस प्रक्रिया में मोदी जीएसटी का श्रेय खुद हड़पने की कोशिश कर रहे थे.

सबने मोदी को सुर्खियां बटोरने वाला बताया, लेकिन बहुत कम लोगों ने इस बात की जरूरत समझी कि 'पारंपरिक समझ' पर सवाल उठाया जाए.

जॉन केनेथ गालब्रेथ ने अपनी पुस्तक 'द एफ्लुएंट सोसाइटी' में कहा था 'पारंपरिक समझ का दुश्मन कोई विचार नहीं, बल्कि समय का घटनाचक्र होता है. जैसा कि मैंने पाया है कि पारंपरिक समझ उस दुनिया के हिसाब से नहीं चलती जिसे उसे समझना है बल्कि उस दुनिया के प्रति लोगों के नजरिए के हिसाब से चलती है.'

भारत में अमेरिकी राजदूत रहे गालब्रेथ जवाहरलाल नेहरू के दौर में उनके अच्छे और बुरे दिनों में मित्र रहे थे. 1962 के भारत-चीन युद्ध के बुरे अंजाम के बाद वे नेहरू के पतन के गवाह भी रहे. हालांकि परंपरागत समझ और कमियों पर उनकी टिप्पणी का नेहरू के उत्थान और पतन से दूर-दूर का संबंध नहीं है लेकिन कहीं न कहीं नेहरू की शारीरिक और राजनीतिक विरासत संभालने वालों की दुविधा का शानदार बयान करता है.

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उदाहरण के लिए नेहरू के मशहूर 'नियति से मिलन’ (Tryst With Destiny) भाषण को लें. नेहरू का ये भाषण न सिर्फ कहने के तरीके की वजह से असाधारण है बल्कि इसमें छिपे गहरे भावों के कारण भी खास है. लेकिन कांग्रेस नेतृत्व को, खासकर नेहरू-गांधी परिवार को यह समझा पाना असंभव है कि मोदी का जीएसटी पर भाषण भी अपने भाव के नजरिए से उतना ही असरदार है. निश्चित रूप से इसे बयां करने का तरीका अलग था. अपनी बात कहने के लिए मोदी हिन्दी में बोले और संस्कृत में धार्मिक ग्रंथों से उद्धरण दिया.

नेहरू के ‘नियति से मिलन’ (Tryst With Destiny) भाषण में उन्होंने सिर्फ महात्मा गांधी का ही नाम लिया और तब के बाकी सभी बड़े नेताओं का जिक्र नहीं किया. लेकिन इसके उलट, मोदी ने भारत की आर्थिक समृद्धि के लिए विपक्ष समेत सभी राजनीतिक नेतृत्व के योगदान की प्रशंसा की. पोडियम पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के साथ होने से यह साफ था कि सरकार ने इस मौके को सही मायने में राजनीतिक कार्यक्रम नहीं बनने दिया.

मोदी को घेरने की हड़बड़ी में कांग्रेस

मोदी सरकार को हतोत्साहित करने के लिए कांग्रेस नेतृत्व लगातार जीएसटी, नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दों पर उसे घेरती रही है. शायद कांग्रेस नेतृत्व को वास्तव में इस बात का डर था कि आधी रात के सत्र का मकसद नेहरू के भाषण को कमतर साबित करना था. इसी बात से कांग्रेस नेतृत्व की कमजोरी सामने आ जाती है कि वह तेजी से बदलती राजनीतिक वास्तविकताओं के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रही है.

इससे पहले मुख्यमंत्री की अपनी भूमिका में और अब देश के प्रधानमंत्री के रूप में मोदी ने पारम्परिक ज्ञान की धारणा को लगातार चुनौती दी है. वे एजेंडा सेट करते रहे हैं जिसमें देश की बदलती वास्तविकताएं झलकती हैं. जीएसटी को लागू करने की पहल का मकसद साफ है कि देश को 'चलता है' के ढर्रे से बचाएं और कारोबारी समुदाय पर दबाव डालें कि वे टैक्स चुकाने को आगे आएं. अगर कोई कालाधन, नोटबंदी, गलत तरीके से कमाई पर लगाम के लिए कानून और जीएसटी जैसे उनके उठाए कदमों को देखता है तो साफ तौर पर एक पैटर्न दिखता है.

PM at Foundation Day of ICAI

संसद में भाषण के अगले दिन मोदी ने चार्टर्ड अकाउन्टेन्ट्स के विशाल जनसमूह को संबोधित किया और उन्हें चेतावनी दी कि उन्हें टैक्स चोरी से दूर रहना होगा. चार्टर्ड अकाउन्टेट्स समुदाय को यह साफ संदेश दिया गया कि कालाधन के खिलाफ लड़ाई में अब आगे निशाने पर वही होंगे.

मोदी जो कुछ भी करते रहे हैं, वह साफ तौर पर राजनीति की स्थापित मान्यताओं के खिलाफ है. फिर भी लोगों की धारणा है कि मोदी परिणामों की परवाह किए बगैर देश को सही दिशा में ले जाने के लिए कुछ कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री किसी सिद्धांत से चिपके नहीं रहते, चाहे वे सैद्धांतिक हों या राजनीतिक और नए प्रयोगों के साथ सामने आते हैं जो बदलाव का भरोसा देते हैं. दूसरी तरफ ऐसा लगता है कि कांग्रेस के पास बमुश्किल नए विचार होते हैं. वे नेहरूवाद के अतीत और पुरातन और अप्रासंगिक परंपरा से जुड़े रहने का प्रयास करते दिखते हैं. ऐसा लगता है कि न्यू इंडिया की शक्ल ले रही घटनाएं उन पर पूरी तरह से हावी हो गई हैं. विपक्ष में नीतीश कुमार जैसे कुछेक नेताओं को छोड़कर कांग्रेस-वाम गठजोड़ लगातार शुतुरमुर्गी रवैया अपनाते हुए अपनी राजनीति को उजागर कर रहे हैं.

पारम्परिक ज्ञान को लेकर गालब्रेथ के शब्द भारतीय राजनीति की भविष्यवाणी लगते हैं. वे लिखते हैं- 'पारंपरिक समझ का अंत हो जाता है, लेकिन वह समर्पण नहीं करता. समाज पूरी निर्दयता के साथ इन धूमिल पुराने या गंदे कपड़ों वाले तत्वों को बुद्धिमान लोगों की दूसरी श्रेणी में हस्तांतरित कर देता है.'

नेहरू का 'नियति के साथ मिलन' (Tryst With Destiny) भारतीय इतिहास का उसी तरह ऐतिहासिक भाषण है जैसा कि 30 जून को मोदी का जीएसटी पर दिया गया भाषण. कोई ऐसा मानदंड नहीं है जो सही तरीके से ये माप सके कि कौन बड़ा है या कौन छोटा. बस यही कह सकते हैं कि दोनों ही अपने अपने समय में भारतीय इतिहास की सुनहरी और चमकती घटनाएं हैं. गावस्कर और तेंदुलकर की तुलना करते हुए बहस करते हुए लड़ना कि कौन बड़े हैं, इससे अच्छा है कि दोनों को अपने-अपने समय का महान खिलाड़ी मानते हुए उन्हें देखा जाए.

कांग्रेस पार्टी का वक्त और घटनाओं को पहचानने से इनकार करने की उनकी जिद से पार्टी गर्त में जा रही है. और, यह भारतीय राजनीति के लिए ठीक नहीं है.

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