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मोदी के तीन काम: रोजगार बढ़े, बीजेपी उदार बने और ताकत के घमंड से दूर रहे

अर्थव्यवस्था, सामाजिक और राजनीतिक दावं-पेंच संभालना अभी मोदी के लिए चुनौती भरा काम है

Updated On: Mar 17, 2017 04:53 PM IST

Sreemoy Talukdar

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मोदी के तीन काम: रोजगार बढ़े, बीजेपी उदार बने और ताकत के घमंड से दूर रहे

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारू ने अपने एक लेख में गहरी सूझ की बात लिखी है. उन्होंने लिखा है कि देश की सियासी चौहद्दी में बदलाव की तेज बयार बह रही है लेकिन राजनीति विज्ञान उसकी ठीक-ठीक व्याख्या नहीं कर पा रहा. उसके पास ना तो नए आंकड़े हैं और ना ही बदलाव की बहती बयार को समझने के कारगर तरीके.

इंडियन एक्सप्रेस अखबार के अपने कॉलम में संजय बारू के शब्द थे, 'अभी जिस तर्ज का राजनीतिक विश्लेषण में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और बीजेपी के उभार की व्याख्या के लिए उन्हीं सैद्धांतिक युक्तियों और संख्यात्मक विधियों का इस्तेमाल हो रहा है, जैसा विश्वयुद्ध के बीच के समय में यूरोप में या विश्वयुद्ध के बाद के समय में अमेरिका में प्रचलित थे.'

विधानसभा चुनावों के तुरंत पहले और चुनाव-परिणाम के तुरंत बाद जिस किस्म के रिपोर्ट या फिर विश्लेषणों का अंबार खड़ा हुआ है, कोई पाठक उससे गुजरे तो उसका माथा भिन्ना जाएगा.

जहां पत्रकार इस बात को समझने में नाकाम रहे कि लहर मोदी के पक्ष में चल रही है. वहीं चुनाव-सर्वेक्षण करने वाले और आंकड़ों की व्याख्या करने वाले यह बताने में चूके कि नरेंद्र मोदी के दबदबे का दायरा कितना बढ़ चुका है.

विश्लेषणों और रिपोर्टों में वही रटे-रटाए थके मुहावरे धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे थे कि रिवर्स पोलराइजेशन हुआ है, हिंदू वोटों की गोलबंदी हुई है, जातियों का एक सतरंगा गठबंधन तैयार हुआ है. कोई बहुसंख्यवादी एजेंडे की बात दोहराते नहीं थक रहा था तो कोई हर बात की व्याख्या में ‘लोक-लुभावन राजनीति’ का जुमला उछाल रहा था.

सियासी सच्चाई को समझने में नाकाम रहे इन मुहावरों की भरमार के बीच हमें इस बात की साफ-साफ समझ बनानी होगी कि मोदीमय हो चली बीजेपी के उभार के क्या कारण हैं.

इस समझ के सहारे ही अपने वक्त के इस सबसे अहम सवाल का जवाब हम तलाश सकते हैं कि इतने भारी जनादेश को हासिल करने के बाद नरेंद्र मोदी आगे के दिनों में कौन सा रास्ता अपनाएंगे.

बीजेपी के उभार की वजह क्या है?

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इस मामले में इंडियन एक्सप्रेस के अपने कॉलम में प्रतापभानु मेहता ने लिखा है, 'जहां तक चुनावी राजनीति का सवाल है, यह सनक की हद तक जातियों-उपजातियों के गणित पर है. इससे यही पता चलता है कि कोई आरामकुर्सी पर बैठे-बैठे सस्ते किस्म का समाजशास्त्र परोस रहा है. जबकि उन्हें पता होना चाहिए कि लोग अगर आपके काम और ईमानदारी से आश्वस्त हैं तो वे अपने वोट के जरिए आपको भारी-भरकम जनादेश दे रहे हैं.'

बहुसंख्यकवादी एजेंडा और सांप्रदायिक राजनीति जैसे सिद्धांत वक्त बीतने के साथ अपनी चमक गंवा चुके हैं. अब ये सियासी सच्चाई को समझने में मदद नहीं देते बल्कि समझ को एक तंग घेरे में कैद करने का काम करते हैं.

अगर मोदी के उभार को हम इस रूप में देखें कि भारतीय लोकतंत्र के भीतर से ही बदलाव की एक लहर उठी है. यह लहर दशकों से चली आ रही वोटबैंक की उस राजनीति के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया है, जिसका जोर लोगों के सशक्तीकरण पर नहीं बल्कि रेवड़ियां बांटने और तुष्टीकरण पर होता था.

याद रहे कि उत्तरप्रदेश में इस बार बीजेपी की जीत का आंकड़ा रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद आंदोलन के चरम उभार के दिनों में मिली जीत से भी बड़ा है. मोदी विरोधियों में जो सबसे ज्यादा नकचढ़े हैं वे इस जीत को ध्रुवीकरण का परिणाम बता रहे हैं. वे अपने विश्लेषण में बस इतना भर लिख रहे हैं कि भीतर ही भीतर एक हवा चल रही थी जो नजर नहीं आई.

इससे हमें पता हो जाना चाहिए कि मोदी के उभार को ध्रुवीकरण का परिणाम बताकर दरअसल हम कहीं गलत जगह पर निशाना लगा रहे हैं.

बीजेपी की जीत (40 फीसद वोटशेयर के साथ) देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य में चौतरफा हुई है. इस जीत के दायरे में मुस्लिम बहुल इलाके भी शामिल हैं. राज्य के युवाओं ने भी बीजेपी को चुना है. यह युवा मतदाता अपने और देश के भविष्य में अपने खून-पसीने का योगदान करना चाहता है और उसे अपनी प्रेरणा की सबसे तेज लौ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में जलती दिखायी दे रही है.

अगर विचार के इस कोण से देखें तो लगेगा कि मोदी अपने वक्त की देन हैं. भारत में एक भद्रवर्गीय सत्तातंत्र चला आ रहा था. वह आरामकुर्सी पर बैठकर सत्ता की मलाई चाटा करता था और लोकतंत्र की आड़ में जनता-जनार्दन को लगातर कमजोर कर रहा था. मोदी इसी महारोग की दवा हैं.

मोदी बड़े मंझे हुए, मेहनती, जमीनी सच्चाइयों पर पकड़े रखने वाले लोकप्रिय नेता हैं और अपनी इन्हीं खूबियों के बूते उन्होंने समझ लिया कि जनता बदलाव चाहती है. मोदी ने जनता की उम्मीद और उनकी जरूरतों पर बात की और जनता का मन मोह लिया. इसी कारण विपक्ष मोदी को रोकने में एकदम नाकारा साबित हुए.

न्यूजमिंट के अपने कॉलम में चित्रा सुब्रम्णियम ने लिखा है, 'अधिकतर विश्लेषण यह देखने में चूक गए कि मोदी भविष्य की ओर से उठती एक पुकार का नाम है और इस पुकार को सुन भारतीय जनता पुरानेपन की अपनी जकड़न के साथ या फिर इस जकड़न से पीछा छुड़ाकर आगे की ओर चलना चाहती है. लोग लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता हासिल करना चाहते हैं और ताकत हासिल करने का उनका यह तेजरफ्तार सफर ना तो बेमकसद है और ना ही बेबुनियाद.

जनता को बेहतर जिंदगी देने का वादा दूसरी पार्टियों ने नहीं मोदी ने किया. हो सकता है मोदी से भी गलतियां हुई हों लेकिन यह भी देखिए कि मोदी ने दरअसल क्या करिश्मा कर दिखाया है. मोदी ने असली लोकतंत्र के भीतर प्राण फूंके हैं.

अगर मोदी को मिले जनादेश के बारे में हम यह मान लें कि मतदाता ने इस उम्मीद से वोट किया है कि मोदी ही समाज का विकास करेंगे तो फिर इसका मतलब होगा कि मोदी पर पहाड़ जैसी भारी जिम्मेदारी आन पड़ी है.

फोटो. NarendraModi.in से साभार

इन हालात में कुछ इस तरह के सवाल उठ सकते हैं:

मोदी इस भारी जिम्मेवारी का निर्वाह कैसे करेंगे, वे अपनी विरासत और भारत के भविष्य का निर्माण किस तरह करेंगे? इस निर्माण का नक्शा क्या होगा?

मुझे लगता है ऐसे तीन क्षेत्र हैं जिन पर मोदी को खास तौर से ध्यान देना होगा. ये क्षेत्र हैं- आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक.

आर्थिक चुनौती: सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर है. भारत के ज्यादातर मतदाता युवा हैं. उसके भीतर महत्वाकांक्षाएं हैं. वह सब्र करना नहीं जानता. इसी वोटर ने मोदी को सत्ता तक पहुंचाया है और प्रधानमंत्री अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर कामयाब नहीं होते तो इस वोटर के मन तक मोदी नहीं पहुंच पाते.

फिलहाल स्थिति रोजगार विहीन वृद्धि की है, ऐसे में मोदी हर महीने तकरीबन 10 लाख लोगों को रोजगार किस तरह दे पायेंगे? मुश्किल यह कि मोदी को यह काम उस वक्त करना होगा जब दुनिया भर में मशीनीकरण के कारण नौकरियों पर खतरा मंडरा रही है.

अर्थव्यवस्था में मौजूद असमानता नोटबंदी के आर्थिक असर से बचने में मोदी के लिए मददगार साबित हुई, लेकिन यही आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है. वॉल स्ट्रीट जर्नल ने ध्यान दिलाया है कि भारत को औद्योगिक छलांग मारने की जरुरत है और मोदी को 2020 तक किसी ना किसी तरह मैन्युफैक्चरिंग (विनिर्माण) सेक्टर को 25 फीसद की रफ्तार देनी होगी. यह फिलहाल 16 फीसद पर है.

अच्छी बात यह है कि यूपी की जीत के बाद मोदी के पास राज्यसभा में वह संख्याबल हो जाएगा जिसके सहारे वे श्रम जैसे महत्वपूर्ण मोर्चे पर जरुरी सुधारों को आगे बढ़ा सकें. लेकिन राज्यसभा में संख्याबल के बढ़ने के वक्त तक 2019 के चुनाव नजदीक आ जाएंगे. इस वजह से मोदी के लिए रास्ता बहुत फिसलन भरा है और उसपर चलने के लिए बहुत ज्यादा ध्यान तथा मेहनत की जरुरत है.

पीएम नरेंद्र मोदी, अरुण जेटली

पीएम नरेंद्र मोदी, अरुण जेटली

सामाजिक क्षेत्र: जहां तक बात सामाजिक क्षेत्र की है, अगर मोदी सचमुच जमीन खोती जा रही कांग्रेस की जगह भरना चाहते हैं और वहां अपने पैर मजबूती से टिकाए रखना चाहते हैं तो उन्हें बीजेपी को पहले की तुलना में ज्यादा समावेशी पार्टी बनाना होगा. ऐसा करते हुए सतर्क रहने की जरुरत है. ऐसा ना लगे कि बीजेपी कांग्रेस बनते जा रही है. बीजेपी को दूसरा कांग्रेस नहीं बनना चाहिए.

बीजेपी को ‘सबका साथ-सबका विकास’ वाले मोदी के नारे को उसके व्यापक अर्थों में समझना होगा. मोदी के नेतृत्व में बीजेपी के आधार का विस्तार हो रहा है. बीजेपी अब व्यापारी वर्ग की ही पार्टी नहीं रह गई. वह गरीबों की हिमायती पार्टी भी बन गई है. मोदी को दोतरफा समर्थन हासिल है और अगर वे चाहें तो समुदायों की आपसी दूरी को कम करने में सफल हो सकते हैं

बीजू जनता दल के सांसद वैजयंत जे पांडा ने टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखा है कि, 'जो लोग एक अरसे से बीजेपी को शंका की नजर से देखते आए हैं वे भी मान रहे हैं कि यूपी में मोदी सबको साथ लेकर चलने की अपनी बात लोगों को समझाने में कामयाब हुए. एक मशहूर पत्रकार ने मुझे बताया कि मुस्लिम बहुल विधानसभाई सीटों पर जीत पार्टी के लिए एक अप्रत्याशित मौका है.'

राजनीतिक चुनौती: जहां तक राजनीतिक मोर्चे का सवाल है, बीजेपी के लिए जरुरी होगा कि वह सांप्रदायिक खेमेबंदी की दोतरफी फांस में ना उलझे. ध्रुवीकरण का जमाना गया.

ताकत ज्यादा मिल जाए तो घमंड बढ़ जाता है. बीजेपी को इस गुमान से भी बचना होगा. जीत के बाद मोदी ने जो भाषण दिया उससे उनकी सोच का पता चलता है. उन्होंने बीजेपी के नेता और कार्यकर्ताओं को सलाह दी कि अब पहले की तुलना में कहीं ज्यादा विनम्र होने की जरुरत है और ताकत का इस्तेमाल पूरी जिम्मेवारी से करना होगा.

लेकिन यहां एक और बात ध्यान देने लायक है, बेशक बीजेपी अभी बलवान दिख रही है. एक राष्ट्रीय ताकत के रुप में वह अपने साथियों और प्रतिद्वन्द्वियों सबकी जमीन अपने हिस्से में करती जा रही है लेकिन इसी क्रम में बीजेपी अपनी प्रतिद्वन्द्वियों पार्टियों को जो अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं- एकजुट भी करते जा रही है. बीजेपी की नासमझी में ये पार्टियां उसके खिलाफ गोलबंद हो रही हैं. बीजेपी इस पहेली का हल कैसे निकालती है, यह देखने वाली बात होगी.

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