S M L

बीजेपी की नई रणनीति: पंद्रह लाख जुमला था लेकिन पकौड़ा हकीकत है

पीएम मोदी ने पूछा था- क्या पकौड़े बेचना रोजगार नहीं है? अब अमित शाह ने पकौड़ा प्रकरण को आगे बढ़ाकर यह साफ कर दिया है कि बात उतनी हल्की नहीं है, जितनी लोग समझ रहे हैं

Updated On: Feb 06, 2018 09:33 AM IST

Rakesh Kayasth Rakesh Kayasth

0
बीजेपी की नई रणनीति: पंद्रह लाख जुमला था लेकिन पकौड़ा हकीकत है

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने सांसद के रूप में शपथ लेने के बाद राज्यसभा में अपना पहला भाषण दिया. भाषण में उन्होने कई बातों के साथ यह भी कहा कि बेरोजगारी से अच्छा पकौड़े बेचना है. तमाम न्यूज चैनलों ने इस बयान को हेडलाइन बनाया और सोशल मीडिया पर इसे लेकर चुटकुलों के अंबार लग गए.

इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक न्यूज चैनल के साथ इंटरव्यू के दौरान एंकर से यह पूछा था कि आप अपने चैनल के बाहर ठेला लगाकर पकौड़े बेच रहे आदमी को इंप्लायड मानेंगे या नहीं? इस बयान को लेकर भी खूब हंगामा हुआ था. विरोधियों ने इल्जाम लगाया गया कि प्रधानमंत्री रोजगार जैसे बड़े मुद्दे को लेकर गंभीर नहीं हैं. अब सवाल यह है कि अमित शाह को पकौड़े वाली बात दोहराने की क्या जरूरत थी?

अमित शाह एक गंभीर राजनेता हैं. उनके बारे में यह नहीं माना जा सकता है कि कोई बात उनके मुंह से यूं ही निकल सकती है. ये वही अमित शाह हैं जिन्होंने नरेंद्र मोदी के 15 लाख रुपए वाले बयान को जुमला बताया था. पिछले पांच साल में शाह का राजनीतिक कद इतना बड़ा हो चुका है कि वे अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री के बयान की व्याख्या करके उसे जुमला बताने की हैसियत रखते हैं. लेकिन उन्होने पकौड़े वाले बयान को जुमला नहीं ठहराया बल्कि उसे और आगे बढ़ाया. लतीफेबाजी के बीच थोड़ा ठहरकर हमें समझना पड़ेगा कि इसके मायने क्या हैं. दरअसल बात इतनी हल्की नहीं है, जितनी सोशल मीडिया को देखकर लग रही है बल्कि इसमें बीजेपी की भावी राजनीति के संकेत छिपे हुए हैं.

चाय-पकौड़े का प्रतीकवाद

पकौड़ा प्रकरण गरमाने के बाद कई लोग मजाक में मोदी को पकौड़ावादी प्रधानमंत्री कह रहे हैं. लेकिन मोदी के बाद शाह ने यह साबित किया है कि यह पकौड़ावाद नहीं बल्कि प्रतीकवाद है और बीजेपी इसकी चैंपियन है. बीजेपी प्रतीकवाद के इसी अखाड़े में लाकर 2019 भी वह कांग्रेस को पटखनी देना चाहती है. पकौड़े बेचने वाले को आहिस्ता-आहिस्ता वैसे ही प्रतीक के रूप में स्थापित किया जा रहा है, जिस तरह 2014 में `चाय वाला’ को किया गया था.

ये भी पढ़ें: पकौड़े के पीछे अपने सरकार की विफलता छुपा रहे हैं मोदी और शाह

अमित शाह ने इसका बहुत स्पष्ट संकेत राज्यसभा के अपने भाषण में दिया. उन्होने कहा कि पकौड़ा बेचना शर्म की बात नहीं है. एक चाय बेचने वाला देश का प्रधानमंत्री बन सकता है तो पकौड़े बेचने वाला भी उद्योगपति बन सकता है. रोजगार सृजन मोदी सरकार के लिए सबसे मुश्किल सवाल रहा है. मौजूदा एनडीए सरकार का लक्ष्य हर साल दो करोड़ रोजगार पैदा करने का था.

लेकिन असलियत में इसका दो फीसदी रोजगार भी सृजित नहीं हो पाया है. ऐसे में नई पटकथा सामने आ रही है. यह पटकथा किसी गंभीर समस्या को गौरव में बदलने की है. संदेश यह है कि धीरे-धीरे काम हो रहा है. चाहे वह रिक्शा चलाने वाला हो या पकौड़े बेचने वाला सब लोग राष्ट्र निर्माण में योगदान दे रहे हैं और देश के पास एक ऐसा प्रधानमंत्री है जो इन मेहनतकश लोगों के दुख-दर्द को समझता है.

PM Modi at interview with TV channel

देश के गरीबों के साथ अपना कनेक्ट बनाए रखने के लिए प्रधानमंत्री मोदी अपने चाय बेचने का जिक्र अब भी करते रहते हैं. अगर विरोधियों ने उनके ऐसे किसी बयान का मजाक उड़ाया तो बीजेपी उसे फौरन गरीबों के असम्मान का मुद्दा बना देती है. यह रणनीति लगातार कामयाब रही है. पकौड़ेवाले मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने प्रधानमंत्री के बयान पर सवाल उठाते हुए कहा था कि अगर पकौड़ा बेचने को रोजगार सृजन माना जा सकता है तो फिर भीख मांगने को क्यों नहीं? अमित शाह ने इस पर जो प्रतिक्रिया जताई उसक मतलब यह था कि कांग्रेस पार्टी पकौड़ा बेचने जैसा काम करने वाले मेहनतकशों को भिखारियों के बराबर मानती है. अगर मौसम चुनावी होता तो यकीनन चिदंबरम का यह बयान कांग्रेस के गले की हड्डी बन जाता.

मिडिल क्लास नहीं बल्कि गरीब वोटरों पर नजर

शहरी मध्यमवर्ग को अब तक बीजेपी का परंपरागत वोटर माना जाता रहा है. लेकिन मोदी के सत्ता में आने के बाद से यह कहानी बदली है. पिछड़े और दलितों के एक बड़े तबके के साथ शहरी गरीबों के बीच भी उनकी लोकप्रियता जबरदस्त तरीके से बढ़ी है. इसकी सबसे बड़ी मिसाल पिछले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में देखने को मिली थी. नोटबंदी जैसे अलोकप्रिय फैसले के बावजूद मोदी के नाम पर यूपी में बीजेपी ने ऐतिहासिक जीत हासिल की.

ये भी पढ़ें: अगर चायवाला पीएम बन सकता है पकौड़े वाले के लिए भी अपार संभावना है!

2019 के चुनाव में बीजेपी यूपी के नतीजों के अलावा कुछ और बातों को दिमाग में रखेगी. पहली बात यह कि मिडिल क्लास अब उस तरह का ओपिनयन मेकर नहीं है, जैसे अब तक था. अगर थोड़ा बहुत नाराज हो भी जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता. वैसे भी मोदी को हिंदू ह्रदय सम्राट मानने वाले वोटरों का एक बड़ा तबका भी किसी भी हाल में बीजेपी का साथ नहीं छोड़ेगा. नेशनल मीडिया का नजरिया भी मोदी को लेकर काफी हद तक आशावादी है और उसके रुख में बदलाव का कोई कारण नजर नहीं आता है.

लेकिन क्या फिर से सत्ता में आने के लिए इतना ही सब काफी है? मोदी और अमित शाह की जोड़ी को 2004 लोकसभा चुनाव के सबक अच्छी तरह याद हैं. देश में फील गुड की बयार बह रही थी. मीडिया वाहवाही कर रहा था, मिडिल क्लास लोग संतुष्ट थे. लेकिन बीजेपी ग्रामीण और शहरी गरीब वोटरों की नाराजगी पढ़ने में नाकाम रहने की वजह से सत्ता से बेदखल हो गई थी. लिहाजा मोदी-शाह की जोड़ी का पूरा ध्यान गरीब वोटरों पर है.

Election Voters

प्रतीकवाद की राजनीति एक पहलू है. केंद्र सरकार गरीबों का दिल जीतने के लिए जमीनी स्तर पर भी कोशिशें कर रही है. गरीबों को मुफ्त में कुकिंग गैस कनेक्शन उपलब्ध कराने की योजना `उज्ज्वला’ इसकी बड़ी मिसाल है. लोकसभा चुनाव से पहले के आखिरी बजट में इस बात की भरपूर झलक देखने को मिली. मिडिल क्लास भले ही इस बजट से मायूस महसूस करे, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र, गरीब और किसानों के लिए घोषणाओं के अंबार लगा दिए गए.

ग्रामीण क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास, गरीबों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस और किसानों की आय दोगुनी करने से लेकर उज्जवला स्कीम के विस्तार बहुत सी ऐसी घोषणाएं की गई हैं, जो यह बता रही थी कि रणनीतिक तौर पर बीजेपी अब खुद को मिडिल क्लास की पार्टी की इमेज से निकालकर गरीबों की पार्टी के रूप में स्थापित करना चाहती है.

बीजेपी ने खोले 2019 के लिए सारे घोड़े

गरीबों के लिए लोकलुभावन बजट और पकौड़े के प्रतीकवाद के बीच यह भी याद रखना जरूरी है कि बीजेपी की चुनावी तैयारी कई और स्तर पर चल रही है. यूपी की योगी सरकार से लेकर केंद्र में गिरिराज सिंह तक दर्जनों सीनियर लीडर हिंदू वोटों की लामबंदी में जुट गए हैं. गोरक्षा से लेकर राम-मंदिर तक ढेरों बयान रोज सुने जा सकते हैं.

ये भी पढ़ें: रोजगार के मसले पर हमें पकौड़ा बेचने और भीख मांगने के तर्कों से बाहर आना होगा

राजस्थान के उपचुनाव में झटके खाने के बाद पार्टी ने विधानसभा चुनाव की तगड़ी तैयारी शुरू कर दी है और वसुंधरा राजे की जगह किसी और नेता को प्रदेश कमान सौंपे जाने की अटकलें तक हवा में तैरने लगी हैं. इस साल आठ राज्यों में विधानसभा के चुनाव है जो एक तरह 2019 पहले के रूझान तय करेंगे. कर्नाटक जैसे राज्य में तो पीएम मोदी ने चुनावी अभियान की शुरुआत कर दी है. नागालैंड और त्रिपुरा जैसे पूर्वोत्तर के राज्यों में पार्टी के बड़े नेता सक्रिय हैं.

बीजेपी के पास नरेंद्र मोदी के रूप में एक बेहतरीन कम्युनिकेटर है तो अमित शाह जैसा असाधारण रणनीतिकार. भारतीय राजनीति में ऐसी जोड़ी पहले कभी नजर नहीं आई. एकाध विधानसभा चुनावों को छोड़ दें तो यह जोड़ी हर जगह कामयाब रही है. लेकिन यह सच है कि गुजरात की मुश्किल चुनावी लड़ाई के बाद से देश का माहौल बदला है. यह भी उतना ही सच है कि केंद्र सरकार पिछले चार साल में कोई ऐसी असाधारण उपलब्धि हासिल नहीं कर पाई है, जिसे हर कोई स्वीकार करता हो. वक्त बहुत कम है और लंबे-चौड़े वादों का पूरा होना लगभग नामुमकिन नज़र आता है. ऐसे में पकौड़े की अहमियत को हल्के में नहीं लिया जा सकता है. भावना और प्रतीक बीजेपी का बड़ा हथियार होंगे, जिनका इस्तेमाल करना वह औरों से कहीं बेहतर करना जानती है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Ganesh Chaturthi 2018: आपके कष्टों को मिटाने आ रहे हैं विघ्नहर्ता

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi