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रैलियों के बजाय मोदी संसद में क्यों नहीं बोलते?

इसमें दो राय नहीं कि मुरादाबाद की रैली में आए लोगों के मन में खुशियां भरने में वे सफल रहे.

Updated On: Dec 04, 2016 08:04 AM IST

Pramod Joshi

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रैलियों के बजाय मोदी संसद में क्यों नहीं बोलते?

गरीब-गरीब-गरीब! इंदिरा गांधी की विरासत जिस पार्टी को मिली उसने इस बात को जोरदार तरीके से कहना बंद कर दिया, पर नरेंद्र मोदी को इसकी ताकत का अंदाजा है. साथ ही उन्हें इस बात को सफलता के साथ मंच से कहना आता है. इस बात का पता लगाना बेहद मुश्किल है कि भारत के कितने गरीबों ने उनकी बातों को सुना, लेकिन इसमें दो राय नहीं कि मुरादाबाद की रैली में आए लोगों के मन में खुशियां भरने में वे सफल रहे. पर इन बताशों से पेट भरने से रहा.

मोदी की फकीरी 

मोदी ने अपने विरोधियों पर हमला किया तो गरीबों की आड़ में. इंदिरा गांधी कहती थीं, ‘वे कहते हैं इंदिरा हटाओ हम कहते हैं गरीबी हटाओ.’ मोदी ने मुरादाबाद में भीड़ से पूछा, ‘देश को भ्रष्टाचार ने बर्बाद किया है या नहीं?’ जवाब मिला, ‘किया.’ उन्होंने फिर पूछा, ‘भ्रष्टाचार रहना चाहिए कि जाना चाहिए?’ जवाब मिला, ‘जाना चाहिए.’ फिर मोदी बोले, ‘क्या मेरा यही गुनाह है कि मैं गरीबों के लिए काम कर रहा हूं? मैं लड़ाई लड़ रहा हूं आपके लिए हम तो फकीर हैं, झोला लेकर चल पड़ेंगे.’ इसके बाद काफी देर तक होता रहा, मोदी...मोदी...मोदी.

मोदी ने कतारों में खड़े आदमी की पीड़ा को याद करते हुए अपने विरोधियों को याद दिलाया, आपने देश को 70 साल तक कतारों में खड़ा रखा. हमने यह आखिरी कतार लगाई है. फिर जनता से कहा, आपकी तपस्या बेकार नहीं जाने दूंगा. मोदी की रैली-शैली उनकी पहचान बन गई है. जनता को संबोधित करने की कला लोकप्रिय नेता बनने की अनिवार्य योग्यता है. लेकिन रैलियां वास्तविक राजनीति नहीं होतीं.

जनधन में कालाधन 

इस रैली में मोदी ने एक बात और कही है, जिसका कानूनी मतलब भी हो सकता है और शायद जो नीति का विषय बने. उन्होंने कहा, आपके जनधन खाते में जिसने भी पैसा जमा किया वह पैसा मत निकालना. जिसका पैसा है वह जेल जाएगा. पैसा गरीबों को मिले. अगर जनधन के अकाउंट में पैसे पड़े हैं तो मैं रास्ता निकालूंगा. जिन लोगों ने गरीबों के खाते में पैसा डाला है वे जेल जाएंगे. मैं इसके आगे की भी सोच रहा हूं. मैं दिमाग लगा रहा हूं.

यह खास बात है. यह बात उन्होंने जनता के बीच कही, उनका भरोसा जीतने के लिए. लेकिन यह बात उन्होंने यूं ही नहीं कही होगी. संसद अभी चल रही है. अभी 16 दिसंबर तक शीत सत्र है. यदि यह नीतिगत घोषणा है तो संसद में होनी चाहिए. मोदी को कुछ बताना ही है तो संसद में क्यों नहीं बताते? क्या वजह है कि नए नोटों की गड्डियां भी बनने लगी हैं, वह भी बड़ी तेजी से?

उनके विरोधी इसे लेकर शोर मचा सकते हैं, कि मोदी ने रैली में क्या घोषणा कर दी. लेकिन जिम्मेदार वे भी हैं. वे संसद को शोर मचाने का जरिया मानते हैं. विचार-विमर्श का नहीं. राहुल गांधी भी लोकसभा के बजाय सड़क पर बातें करना ज्यादा पसंद करते हैं. वह भी चुने हुए विषयों पर. यह देश कब तक लोक-लुभावन नारों, मुहावरों और रूपकों से सहारे चलेगा?

गरीबी से लड़ाई का क्या होगा अंजाम

प्रधानमंत्री की यह बात महत्त्वपूर्ण है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और बंगाल जैसे बड़े राज्यों की गरीबी दूर होगी, तभी देश से गरीबी दूर करने की मुहिम को सफल माना जाएगा. लेकिन वे इस दिशा में क्या कर रहे हैं? देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य, पोषण, पेयजल, लैंगिक असमानता और बुनियादी जीवन से जुड़े आंकड़े हमारी समृद्धि-कथा में पैबंद की तरह नजर आते हैं.

मोदी का कहना है कि केवल सांसद बनने के लिए मैंने यूपी से चुनाव नहीं लड़ा. यूपी को गरीबी से मुक्ति दिलाने के लिए लड़ा. वाराणसी के लोगों ने मुझे भरपूर आशीर्वाद दिया. गरीबी से लड़ाई का जनता का मुहावरा अलग है और विशेषज्ञों का अलग. गरीबी दूर होनी चाहिए.

मोदी ने ठीक कहा, जब देश को लगता है कि इरादे नेक हैं तो वह कुछ भी सहने को तैयार हो जाता है. शायद इसी वजह से कतारों से विरोध के स्वर उतने कटु नहीं हैं, जितने वे हो सकते थे. देश ने 1971 और 1977 में बड़ी उम्मीदों से अपने नेताओं पर भरोसा किया था. वैसा ही भरोसा 1947 में भारत की आजादी के वक्त जनता को था. लगभग ऐसा ही भरोसा आम आदमी पार्टी के उदय से जगा था. लेकिन वह प्रयोग भी सत्ता की राजनीति के गलियारों में खो चुका है. यह देश क्या बार-बार ठगे जाने को स्वीकार करता रहेगा?

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