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क्या मायावती की राजनीतिक जमीन खिसक रही है?

नोटबंदी से उत्तर प्रदेश के गरीब युवाओं में मोदी का क्रेज बढ़ रहा है.

Updated On: Dec 05, 2016 09:09 AM IST

सुरेश बाफना
वरिष्ठ पत्रकार

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क्या मायावती की राजनीतिक जमीन खिसक रही है?

मुरादाबाद में भाजपा की परिवर्तन रैली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण से बसपा की सुप्रीमो मायावती की चिंता कई गुना बढ़ गई है. चिंता इतनी अधिक थी कि मायावती ने मोदी के भाषण के आधे घंटे के बाद ही 30-35 मिनट लंबा बयान पत्रकार-वार्ता में पढ़ दिया. उनके चेहरे के हावभाव यह दिखा रहे थे कि वे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा की तरफ से बढ़ती चुनौती से काफी परेशान हैं.

मायावती परेशान क्यों?

मायावती को सबसे अधिक परेशानी मोदी की इस घोषणा से हुई कि वे उन लोगों के हितों को सुरक्षित करने पर गंभीरता के साथ विचार कर रहे हैं, जिनके जनधन बैंक खातों में किसी काले धनवाले ने राशि जमा करवाई है. मोदी ने कहा कि जनधन खातों में काला धन जमा करवाने वाले व्यक्ति को सजा दिलवाई जाएगी और जमा धन उस व्यक्ति का हो जाएगा, जिसके खाते में काला धन जमा कराया गया है.

जाहिर है जिन लोगों के जनधन खाते खुले हैं, उनमें बड़ी संख्या में दलित समुदाय के वे लोग भी शामिल हैं, जो मायावती के समर्थक रहे हैं.

कभी भाजपा नेताओं को राखी बांधने वाली मायावती ने मोदी पर जमकर निशाना साधा. उनको यह लग रहा है कि नोटबंदी से उत्तर प्रदेश के गरीब युवाओं में मोदी का क्रेज बढ़ रहा है.

नोटबंदी हो सकती है, यूपी चुनाव का मुख्य एजेंडा 

मुरादाबाद में मोदी ने उत्तर प्रदेश के विकास और नोटबंदी को सबसे बड़े मुद्दे के तौर पर पेश करके अगले विधानसभा चुनाव में आम लोगों का समर्थन पाने की कोशिश की. संकेतों की भाषा में मोदी ने सपा और बसपा पर राजनीतिक हमले किए, वहीं मायावती ने सीधे-सीधे भाजपा और सपा को अपना निशाना बनाया. मायावती एक तरफ कहती हैं कि मोदी ने अपने राजनीतिक स्वार्थ की खातिर बिना तैयारी के नोटबंदी का ऐलान कर दिया, दूसरी तरफ यह भी कहती हैं कि नोटबंदी से देश के 90 प्रतिशत लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. सवाल है कि लोगों को परेशान करके पीएम मोदी अपना राजनीतिक स्वार्थ कैसे साध सकते हैं. मायावती के बयानों का विरोधाभास ही उनकी मानसिक परेशानी को उजागर करता है.

मायावती

मायावती की राजनीतिक परेशानी से यह संकेत भी मिलता है कि मोदी ने बड़ी सफलता से नोटबंदी को अमीर और गरीब के बीच में होनेवाले संघर्ष में परिभाषित कर दिया है. जनधन खातों में जमा काले धन पर की गई घोषणा से गरीबों के बीच मोदी की छवि रॉबिनहुड जैसी बन रही है. वे अमीरों के काले धन को गरीबों में बांटने की बात कर रहे हैं.

मायावती की जनाधार बचाने की कवायद  

मायावती बार-बार मुसलमान मतदाताओं को सावधान कर रही हैं कि यदि उन्होंने एकजुट होकर बसपा के पक्ष में मतदान नहीं किया तो भाजपा विधानसभा का चुनाव जीत जाएगी. वे यह हास्यास्पद दावा भी करती हैं कि जब उन्होंने भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई थी, तब भाजपा को आगे नहीं बढ़ने दिया था.

मायावती को यह खतरा दिखाई दे रहा है कि यदि उनका दलित वोट बैंक विभाजित दिखाई दिया तो एक बार फिर मुस्लिम समुदाय सपा के पक्ष में एकजुट होकर वोट देगा. इस वजह से मायावती की पहली राजनीतिक प्राथमिकता अपने जातिगत जनाधार को बचाए रखना है.

नोटबंदी को लेकर हो रही राजनीति ने उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया है.

मोदी ने नोटबंदी के आधार पर विपक्ष को काले धन के कटघरे में खड़ा करना शुरु कर दिया है. वहीं मायावती ने अपने जनाधार को बचाने के लिए मोदी को नंबर एक राजनीतिक दुश्मन घोषित कर दिया है.

नोटबंदी के पहले राजनीतिक पंडितों के बीच यह माना जा रहा था कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मायावती की बसपा सबसे अधिक सीटें जीतेंगी और भाजपा को तीसरे नंबर की पार्टी माना जा रहा था. नोटबंदी ने इस गणित को बदल दिया है.

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