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लंदन में पीएम: अपने भाषणों से इमेज चमकाने की कला में मोदी से कोसों दूर हैं राहुल

जब भी सवाल-जवाब वाले कार्यक्रमों के जरिए जनता के दिलों में जगह बनाने का मुकाबला होता है, तब राहुल गांधी, मोदी यूनिवर्सिटी के छात्र नजर आते हैं.

Sandipan Sharma Sandipan Sharma Updated On: Apr 20, 2018 09:33 AM IST

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लंदन में पीएम: अपने भाषणों से इमेज चमकाने की कला में मोदी से कोसों दूर हैं राहुल

'तुम जिस स्कूल में पढ़ रहे हो, हम उसके हेडमास्टर रह चुके हैं', फिल्म 'हाथ की सफ़ाई' के इस मशहूर डायलॉग के ज़रिए विनोद खन्ना ने रणधीर कपूर को बताया था कि वो उस्तादों के उस्ताद हैं, जबकि कपूर सिर्फ़ शागिर्द. अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी किसी बॉलीवुड फ़िल्म में एक साथ रोल करते, तो सलीम-जावेद की जोड़ी यकीनन ये डायलॉग नरेंद्र मोदी के लिए लिखते. क्योंकि जब भी बात सियासी शो करने, शानदार भाषण देने और राजनीतिक डायलॉग मारने की आती है, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यकीनन उस स्कूल के हेडमास्टर साबित होते हैं, जिसमें राहुल अभी केजी के छात्र हैं.

कोरियोग्राफ्ड प्रोग्राम्स में भी मोदी से पीछे राहुल

लंदन में प्रधानमंत्री मोदी की टाउनहॉल मीटिंग, दोनों नेताओं के बीच बोलने की खूबी के फर्क की साफ मिसाल है. जहां प्रधानमंत्री मोदी सार्वजनिक मंचों पर एक शानदार वक्ता हैं. वहीं राहुल गांधी में इस खूबी की भारी कमी है. लंदन में हुए कार्यक्रम में मोदी बड़े सहज अंदाज में बोलने वाले हाजिर-जवाब शख्स के तौर पर दिखाई दिए. मोदी ने बहुत सामान्य बातों को इस तरीके से कहा कि वो सुर्खियां बन गए. ये ऐसी खूबी है, जो राहुल गांधी मोदी से सीख सकते हैं.

इस आयोजन को देखकर साफ लगा कि इसे बड़ी चतुराई से पहले से तयशुदा प्लान के तहत किया गया. हर पहलू, हर सवाल से जाहिर था कि इस आयोजन की रिहर्सल की गई थी. बहुत मुमकिन है कि इस मीटिंग में पूछे जाने वाले सवालों को पहले प्रधानमंत्री के दफ्तर के अधिकारियों ने देखा हो. लेकिन ये मोदी की ऑस्कर वाइल्ड जैसी खूबी है कि वो पहले से तय बातों को इस अंदाज में कहते हैं कि उनमें नयापन मालूम होता है. रटे-रटाए जवाब भी हाजिर-जवाबी का नमूना लगते हैं. एक चतुर वक्ता की तरह मोदी हमेशा वो बात कह लेते हैं, जो वो कहना चाहते हैं. भले ही उसका जवाब से कोई ताल्लुक हो या नहीं. जिस तरह मोदी बात को घुमाते हैं, उसका कोई सानी नहीं.

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घटिया सवालों से भी निकाल लेते हैं इमेज चमकाने के मौके

मसलन, जब मोदी से पूछा गया कि उनकी एनर्जी का राज क्या है, तो उनका जवाब था, 'मैं रोज़ाना एक दो किलो गालियां खाता हूं'. अपने इस जवाब से मोदी ने ख़ुद को बेहद सहनशील नेता के तौर पर पेश किया, जो अपमान और निंदा से भी ऊर्जा हासिल करते हैं. उनकी जगह कोई और नेता जैसे राहुल गांधी ही होते, तो वो वर्जिश, योगा, ध्यान और संतुलित आहार को अपनी एनर्जी के राज के तौर पर बताते. लेकिन ये मोदी का खास अंदाज है. वो औरों से हटकर सोचते हैं. बहुत ही घटिया से सवालों को अपनी इमेज चमकाने के मौकों में तब्दील कर लेते हैं.

Narendra Modi and Boris Johnson in London

इसके अलावा मोदी को ये बात भी अच्छे से मालूम है कि उनकी कौन सी बात तुरंत टीवी में हेडलाइन बन जाएंगी. जैसे कि मोदी ने करीब डेढ़ साल पहले हुए सर्जिकल स्ट्राइक से जुड़े सवाल के जवाब में कहा कि, 'हम ने सर्जिकल स्ट्राइक से पहले संपर्क साधने की कोशिश की. लेकिन वो इतने डरे हुए थे कि फोन पर भी नहीं आए'. साफ है कि मोदी चाहते थे कि सितंबर 2016 में हुई सर्जिकल स्ट्राइक एक बार फिर सुर्खियों में आए, ताकि लोग उसे भूल न जाएं. इससे उन्हें खुद को फिर से एक ताकतवर नेता के तौर पर पेश करने का मौका मिल गया. लगे हाथ उन्होंने एक बार फिर से पाकिस्तान को नीचा भी दिखा लिया. टीवी न्यूज में यही तो बिकाऊ माल है.

इसके अलावा मोदी का ये कहना कि तमन्नाएं रखना और बेसब्र होना दोनों ही बहुत अच्छी बातें हैं, ये भी काबिले गौर बात थी. मोदी इस कार्यक्रम में इतने अच्छे फॉर्म में थे कि अगर वो हॉलीवु़ड के फिल्मी किरदार गॉर्डन गेको की तरह ये कहते कि लालच अच्छा है, तो भी वहां मौजूद लोग और बाकी जनता उनकी बात पर मर मिटती.

राहुल गांधी इस पाठशाला के शागिर्द

यही वजह है कि राहुल गांधी अभी भी मोदी की पाठशाला में शागिर्द ही नजर आते हैं. प्रधानमंत्री मोदी के मुकाबले, राहुल गांधी के जवाब पहले से रटे-रटाए या लिखे हुए बयान जैसे लगते हैं. न उनमें सहजता है, न कोई सुधार दिखता है. न ही राहुल गांधी के बयानों में वो रस है, जो लोगों को लुभाता है. और तो और, कई बार वो जहरीले से लगते हैं. कभी भी ऐसा नहीं लगता कि राहुल गांधी तमाम सवालों के जवाब में हेर-फेर से अपने मन की बात कह पाते हैं.

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इसके अलावा राहुल गांधी के साथ एक और बड़ी दिक्कत है. वो अपनी बातों में कुछ ज्यादा ही बुद्धिमानी दिखाने की कोशिश करते हैं. कई साल पहले दिया गया 'एस्केप वेलोसिटी' वाला उनका बयान इसकी बड़ी मिसाल है. मोदी मुश्किल बातों को भी सरल तरीके से कहकर उसमें वजन ला देते हैं. वहीं राहुल गांधी अपनी बातों में वजन डालने के चक्कर में कई बार मजाक बन जाते हैं. अक्सर राहुल गांधी के बयानों के तमाम मतलब निकाले जाने की गुंजाइश नजर आती है. लोग अक्सर राहुल गांधी के बयानों के बाद कहते सुने जा सकते हैं, अच्छा! ऐसा कहा! वाक़ई? इसका मतलब क्या हुआ?

rahul gandhi 2

और ये हाल तब होता है जब राहुल गांधी ऐसी जगहों पर बोलते हैं जहां कमान उनके मैनेजरों के हाथ में होती है. सब-कुछ नियंत्रित और तयशुदा होता है, जैसे पहले से तय टाउनहाल बैठकें. हम यहां चुनावी रैलियों की बातें तो कर ही नहीं रहे. ऐसी रैलियों में तो प्रधानमंत्री मोदी का जादू आम लोगों के सिर चढ़कर बोलता है. वो लोगों के दिलों पर ऐसे राज करते हैं, जैसे किसी ऑर्केस्ट्रा में कोई संगीतकार अपने हाथ के इशारों से संगीत की धुनें निकलवाए. (बायां हाथ ऊपर हुआ तो, बाएं तरफ के लोग मोदी-मोदी चिलाने लगे. दाहिना हाथ उठा, तो दायीं तरफ बैठे लोग मोदी-मोदी गाने लगते हैं. दोनों हाथ ऊपर हुए तो एक साथ पूरी जनता बोल उठती है).

राजनीति में भाषण देने की कला और जोश भरने वाला अंदाज बहुत अहम होता है. हॉलीवुड की मशहूर फिल्म 'डार्केस्ट ऑवर' के आखिरी पलों में लॉर्ड हैलीफैक्स अपनी हैट विंस्टन चर्चिल की तरफ उछालते हुए कहते हैं, 'उसने अंग्रेजी जबान को एकजुट किया और जंग के मैदान में भेज दिया'. राजनीति में शानदार भाषण की यही अहमियत होती है.

विनम्रता के बावजूद जादूई असर नहीं छोड़ पाते राहुल

अपनी सारी विनम्रता, गंभीर अंदाज और कभी-कभार दिखने वाले गुस्से के बावजूद राहुल गांधी कभी भी जनता पर जादुई असर नहीं छोड़ पाते (असल में उनका ट्विटर अकाउंट ज्यादा चालाक मालूम होता है). यही राहुल गांधी की सबसे बड़ी कमी है. जब मोदी जैसे शानदार वक्ता से उनका मुकाबला होता है, तो वो बहुत कमजोर नजर आते हैं.

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राहुल गांधी, खुद को मोदी के मुकाबले खड़ा करने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं. वो अपने शब्दों में नई धार डालने और खुद को नई ऊर्जा से लैस करने के लिए थाईलैंड से लेकर न जाने कहां-कहां जाते रहते हैं. मोदी से सीखते हुए उन्होंने कई लोकप्रिय जुमले भी गढ़े हैं. जैसे कि 'सूट-बूट की सरकार'. या फिर, जीएसटी को उन्होंने गब्बर सिंह टैक्स कहकर भी काफ़ी तालियां बटोरीं. अब वो ज्यादा नाराज भी नहीं होते और अपने कुर्ते की बांह भी कम ही मोड़ते हैं, गुस्से में. राहुल के उन भाषणों में भी काफी कमी आई है, जिनका लोग मजाक बनाएं.

लेकिन जब बात सवाल-जवाब वाले पहले से कोरियोग्राफ किए शो की बात आती है, तो मोदी, राहुल गांधी पर बीस नहीं इक्कीस बैठते हैं. जब भी सवाल-जवाब वाले कार्यक्रमों के जरिए जनता के दिलों में जगह बनाने का मुकाबला होता है, तब राहुल गांधी, मोदी यूनिवर्सिटी के छात्र नजर आते हैं. तब वो हाथ की सफाई के विनोद खन्ना के मुकाबले सपोर्टिंग रोल वाले किरदार ही नजर आते हैं.

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