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ब्रिटेन में मोदी: 'मुझसे भी हो सकती हैं गलतियां' कहकर सुपरमैन की छवि तोड़ने की कोशिश

मोदी लगातार इस बात पर जोर देते रहे कि वह हॉल में मौजूद बाकी लोगों की तरह ही एक सामान्य इंसान हैं. वह भी गलतियां कर सकते हैं, लेकिन उनकी गलतियां किसी भी बुरे इरादे या गलत उद्देश्यों से पैदा नहीं होतीं.

Updated On: Apr 19, 2018 10:56 PM IST

Sanjay Singh

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ब्रिटेन में मोदी: 'मुझसे भी हो सकती हैं गलतियां' कहकर सुपरमैन की छवि तोड़ने की कोशिश

स्कूल में हम सभी को सिखाया गया है कि 'धैर्य' एक सदाचार है और 'उतावलापन' व्याकुलता का लक्षण, जिससे निराशा और परेशानी मिलती है. लेकिन लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इससे इत्तेफाक नहीं रखते हैं. मोदी का मानना है कि, 'सब्र का फल मीठा होता है'. 'दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ' जैसी पुरानी कहावतों पर अमल करके ‘न्यू इंडिया’ नहीं बनाया जा सकता है. सुपर पावर और विकसित राष्ट्रों की दौड़ में ‘न्यू इंडिया’ के मकाम को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विचार जरा अलग हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोचते हैं कि, भविष्य में भारत के विकास की दास्तान का मूलमंत्र 'ये दिल मांगे मोर' होना चाहिए. बढ़ती लालसाओं ने लोगों को और भी ज्यादा महत्वाकांक्षी बना दिया है. जनता की मांगें दिन-ब-दिन बढ़ रही हैं, जिससे खास लोगों, सरकार और महत्वपूर्ण संस्थानों को अच्छा प्रदर्शन करने की प्रेरणा मिल रही है. भारत में लोगों की बढ़ती आकांक्षाओं को मोदी सकारात्मक तौर पर लेते हैं. मोदी को लगता है कि, लोगों की आकांक्षाएं हमें आशावाद की ओर ले जा रही हैं और जीवन के हर क्षेत्र में कठिन परिश्रम का हौसला दे रही हैं. मोदी का यह भी मानना है कि, इस दर्शन से बुनियादी सुविधाओं वाली परियोजनाओं के कामकाज में तेजी आई है. जबकि 'चलता है' के पुराने दर्शन से ऐसा हो पाना संभव नहीं था.

लंदन के वेस्टमिंस्टर सेंट्रल हॉल में 'भारत की बात सबके साथ' कार्यक्रम में जब मोदी से 'बेबस बनाम बेसब्र' वाला सवाल किया गया, तो जवाब देते हुए उन्होंने कहा, 'कल तक (भारत) बेबस था, आज तेज बदलाव के लिय बेसब्र है.' परिवर्तन और विकास की दास्तान लिखने के लिए आत्मविश्वास होना बेहद जरूरी है. आत्मनिर्भर बनने और आतंकवाद के कायराना कृत्य करने वाले दुश्मन राष्ट्र के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए योग्यता और मजबूत इरादे होना चाहिए.

उरी और पठानकोट में आतंकवादी हमलों के जवाब में पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक इस संदर्भ में फिट बैठती है. केंद्र में सत्ता बदलने के साथ लोगों का विश्वास बदल जाता है, उनकी आकांक्षाएं बदल जाती हैं.

वेस्टमिंस्टर सेंट्रल हॉल में पाकिस्तान को मोदी का संदेश साफ और दो टूक था. उन्होंने कहा, 'तो यह मोदी है, जो उसी भाषा जवाब देना जानता है.टेरर एक्सपोर्ट करने वाले को पता होना चाहिए कि अब हिंदुस्तान बदल चुका है'. प्रधानमंत्री मोदी यहीं नहीं रुके, उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक की कहानी भी बयां की. मोदी ने बताया कि उन्होंने कैसे और क्यों सर्जिकल स्ट्राइक करने का फैसला किया. मोदी ने यह भी बताया कि उन्होंने कैसे सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में ऑफिशियल चैनल्स के माध्यम से सबसे पहले पाकिस्तान को सूचित करने के लिए घंटों तक इंतजार किया था. दरअसल मोदी भारत और भारत के बाहर किसी को भी सर्जिकल स्ट्राइक की जानकारी मिलने से पहले पाकिस्तान को सूचित करना चाहते थे, जिसमें वह सफल भी हुए.

भारत में बढ़ते रेप मामलों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि बेटियों से सब पूछते हैं कि कहां गई थी लेकिन बेटों से कभी पूछा है कि कहां गए थे

नियंत्रण रेखा (LoC) पर भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक का आक्रामक तरीके से जिक्र करके मोदी ने दुनियाभर को स्पष्ट संदेश दिया. मोदी के शब्दों से जाहिर था कि भारत की ओर बुरी नजर रखने वाले और आतंक का निर्यात करने वाले भविष्य में ऐसे ही नतीजे भुगतने को तैयार रहें.

मोदी के इस दो टूक और आक्रामक रवैए ने उन्हें अपनी पार्टी के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से अलग खड़ा कर दिया है. दरअसल 13 दिसंबर 2001 को संसद पर आतंकवादी हमले के बाद वाजपेयी ने पाकिस्तान के खिलाफ 'आर-पार' की लड़ाई का ऐलान किया था. इसके लिए बाकायदा ‘ऑपरेशन पराक्रम’ का भी आदेश जारी कर दिया गया.

सरहद पर सेना का बड़े पैमाने पर जमावड़ा भी लग गया था. लेकिन बाद में वाजपेयी अपने कदम से पीछे हट गए थे. तब उन्होंने अपने पूर्व के बयान में 'अगर' शब्द को जोड़ दिया था. अपना बयान बदलकर वाजपेयी ने दावा किया कि, वास्तव में उन्होंने यह कहा था, 'अगर लड़ाई होगी तो आर-पार की लड़ाई होगी'.

वहीं 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बाद मनमोहन सिंह सरकार भी पाकिस्तान को सख्त संदेश देने में नाकाम रही थी. उस समय मनमोहन सरकार 'सभी विकल्प खुले हैं' और लड़ाई और जंग के सौदागरों की निंदा के बीच डांवाडोल नजर आई थी.

अपनी इजरायल यात्रा का जिक्र करके और इजरायल और फिलस्तीन के अस्तित्व को अलग-अलग जाहिर करके मोदी देश के सभी पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों से एक कदम आगे निकल गए. मोदी यह संकेत देने में कामयाब रहे कि उनके इरादे और उद्देश्य बेहद मजबूत हैं. मोदी यह भी संदेश देने में सफल रहे कि, उनके पास एक अलग और आजाद रास्ता चुनने की हिम्मत है, जो कि देश के किसी और प्रधानमंत्री में नहीं रही.

मोदी ने कहा, 'पिछले 70 सालों में कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री इजरायल नहीं गया, आपको कौन रोक रहा था. अगर किसी भारतीय प्रधानमंत्री को इजरायल जाना है, तो वह इजरायल जाएगा, अगर किसी भारतीय प्रधानमंत्री को फिलस्तीन जाना है, तो वह अलग से फिलिस्तीन की यात्रा करेगा'. यहां यह बात बेहद दिलचस्प थी कि मोदी ने विदेश नीति और इजरायल यात्रा का जिक्र करते हुए सऊदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात जैसे सभी इस्लामी देशों का उल्लेख किया.

केंद्र में शासन करते हुए मोदी सरकार को चार साल का वक्त बीत चुका है. आगामी लोकसभा चुनाव में अब सिर्फ एक साल का वक्त ही बचा है. वहीं इस साल पांच महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं. लेकिन मोदी और उनकी सरकार को उम्मीदों के बोझ से डर नहीं लगता है. वह नए जनादेश के लिए जनता के पास जाने के लिए बेखौफ होकर तैयार हैं.

मोदी को यह बात स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं है कि लोगों ने उनसे बड़े पैमाने पर अपेक्षाएं की थीं. लिहाजा लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए उन्होंने लगातार प्रयास किए. उन्होंने कई योजनाएं बनाई, कई योजनाओं में सुधार किया और कई योजनाओं को अंजाम तक पहुंचाया. मोदी के इस अंदाज-ए-बयां को उनकी बेसब्र भारत की थीम से जोड़कर देखा जा सकता है.

मोदी ने कहा,'अगर किसी परिवार में तीन बेटे हैं, तो लोग सिर्फ उसी बेटे से डिलीवरी के लिए पूछेंगे, जो उन्हें लगता है कि वह डिलीवर कर सकता है. 'जो करेगा उसी से तो कहेगा' इसलिए लोग मुझसे बहुत उम्मीद करते हैं. वे सोचते हैं कि मैं डिलीवर कर सकता हूं. एक समय था जब लोग छोटे बदलाव से खुश हो जाते होंगे, लेकिन अब उनकी उम्मीदें और आकांक्षाएं बदल गई हैं'.

हालांकि वेस्टमिंस्टर सेंट्रल हॉल में कार्यक्रम के दौरान एक ऑडियो विजुअल प्रस्तुति और अपने संबोधन के जरिए मोदी ने पिछले चार वर्षों में अपनी सरकार की कई उपलब्धियों को गिनाया, लेकिन इसके बावजूद लंदन में भारतीय समुदाय और लाइव प्रसारण के माध्यम से भारत में लोगों को बताया कि उन्हें एक परफेक्ट सुपर मैन के तौर पर न देखा जाए.

मोदी लगातार इस बात पर जोर देते रहे कि वह हॉल में मौजूद बाकी लोगों की तरह ही एक सामान्य इंसान हैं. वह भी गलतियां कर सकते हैं, लेकिन उनकी गलतियां किसी भी बुरे इरादे या गलत उद्देश्यों से पैदा नहीं होतीं. मोदी ने कहा कि, उनसे अगर गलतियां हुई हैं तो वे बड़े पैमाने पर लोगों तक सुख-सुविधाएं पहुंचाने और लोगों की भलाई के मकसद को पूरा करने की राह में हुई हैं.

PM Modi

लंदन के वेस्टमिंस्टर सेंट्रल हॉल में गीतकार प्रसून जोशी के साथ मोदी की बातचीत और लोगों के सवाल-जवाब डेढ़ घंटे से ज्यादा वक्त तक चले. इस दौरान मोदी स्पष्ट संदेश देने में सफल रहे. मोदी ने जता दिया कि वह अपने विचारों और इरादों पर अडिग हैं. मोदी ने यह भी साफ कर दिया कि वह 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए खुद को और अपनी पार्टी को कैसे ढालेंगे.

मोदी बखूबी जानते हैं कि सरकार की तरफ से होने वाली डिलीवरी सीमित हो सकती है. महज चार साल में वह या संभवतः कोई और व्यक्ति देश को बदल नहीं सकता है. चूंकि कुछ लोग सोचते थे कि मोदी ऐसा कर सकते हैं, लिहाजा अब वह सहभागिता के लोकतंत्र पर जोर दे रहे हैं. यानी न्यू इंडिया का सपना साकार करने के लिए जनता और सरकार मिलकर काम करें. अपने संबोधन में मोदी यह धारणा बनाने में भी कामयाब रहे कि अगले चुनाव में समाज का गरीब तबका उनके पक्ष में खड़ा होगा.

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