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मनमोहन की चर्चा, मोदी का पर्चा, जनता का खर्चा

सार्थक बहस के लिए सार्थक राजनीति अनिवार्य है पर इस बकवास के लिए समय नहीं है.

Updated On: Nov 24, 2016 06:57 PM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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मनमोहन की चर्चा,  मोदी का पर्चा, जनता का खर्चा

भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुदद्आ

दुष्यंत कुमार की यह पंक्ति संसद के हाल पर मौजूं है. नोटबंदी पर बहस हो या न हो? कैसी बहस हो? प्रधानमंत्री शुरू से अंत तक बैठे या नहीं? बहस शुरू होती है या ठप हो जाती है.

आखिरकार यह सब झंझट बेचारी गरीब जनता के लिए हो रहा है.शहरों और गांवों में जनता त्रस्त है. लोग लाइनों में खड़े हैं. पैसे-पैसे को मोहताज हैं. यह सब आरोप विरोधी दल के नेताओं के हैं. सदन में इन सब बातों का जिक्र सुनने के लिए प्रधानमंत्री मौजूद भी रहे. उनकी आंखों के सामने. राज्यसभा और लोकसभा में एक साथ.

राज्यसभा की चर्चा गुरुवार तो दिलचस्प रही. गुलाम नबी आजाद ने सरकार की कोताही को जमकर लताड़ा. गरीबों के दर्द का हवाला दिया और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सामने किया.

अर्थशास्त्री नहीं महज नेता 

उम्मीद थी कि अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह बहस को एक नई दिशा देंगे. पर राजनीति उन पर हावी रही. ऐसा लगा कि इस उम्र में मनमोहन सिंह परिवार का नमक अदा कर रहे हैं.

मसलन उनका तर्क था कि इस कदम से देश की जीडीपी 2 प्रतिशत घट जाएगी. लोगों को तकलीफ होगी. काले धन पर प्रहार होना चाहिए लेकिन इस तरह नहीं. किस तरह? नहीं पता.

इन बातों को समझने के लिए प्रकांड अर्थशास्त्री होना जरूरी नहीं है.

पहले दिन से ये नुस्खे बताए जा रहे हैं. अर्थशास्त्री ने निराश किया पर राजनेता के रूप में मनमोहन सिंह ज्यादा सफल रहे. यही वजह थी कि उनको ओवररेटेड  इकोनॉमिस्ट और अंडररेटेड पॉलिटिशियन कहा जाता है. है कोई ऐसी मिसाल जो बगैर राजनीतिक पूंजी के इस देश पर 10 साल तक राज कर सके? न भूतो न भविष्यति.

बात यहीं नहीं रुकी. गरीबों के अन्य मसीहा भी सामने आए. मसलन समाजवादी पार्टी के नरेश अग्रवाल, बसपा सु्प्रीमो मायावती और कभी-कभी अमर सिंह और राजीव शुक्ला जैसे दिग्गज भी. प्रखर समाजवादी शरद यादव, केसी त्यागी भी राहुल गांधी के साथ फोटो फ्रेम में आने के लिए बेताब दिखते हैं. आखिर मामला आम गरीब जनता से जुड़ा है.

सरकार के तो क्या ही कहने

दूसरी ओर सरकारी तंत्र ने तो अपनी जीत घोषित ही कर दी. प्रधानमंत्री ऐप पर सर्वे की मानें तो 90 फीसदी लोग नोटबंदी के पक्ष में हैं. वेंकैया नायडू और अरुण जेटली की मानें तो प्रधानमंत्री तो गरीबों के मसीहा हो ही गए. यह सारी चर्चा सदन के बाहर हो रही है. जय और पराजय की दावेदारी बदस्तूर जारी है.

संसद का यह परिदृश्य सचमुच हैरान करने वाला है. लोगों की नुमाइंदगी कर रही संस्था आम आदमी के नाम पर क्रूर मजाक बनकर रह गई. बढ़तीं कतारें, गांवों में पलायन का दौर, बढ़ती बेरोजगारी आदि कई ऐसे मसले हैं, जिनपर बहस नोटबंदी के संदर्भ में हो सकती है.

पर सार्थक बहस के लिए सार्थक राजनीति अनिवार्य है. पर किसके पास इस बकवास के लिए समय है. बढ़ने दो लाइनें, बेरोजगारी और पलायन. दिल्ली नोटबंदी पर चिंतित है. जाहिर है यही संदेश है देश को दिल्ली की संसद का.

 

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