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PM मोदी के तौर पर पिछड़ी जाति का उदय RSS के हिंदुत्ववादी प्रोजेक्ट की असली कहानी कहता है

पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज हिंदुत्व के सबसे बड़े नेता हैं. ये न तो इत्तेफाक है और न ही हादसा

Updated On: Sep 29, 2018 09:08 AM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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PM मोदी के तौर पर पिछड़ी जाति का उदय RSS के हिंदुत्ववादी प्रोजेक्ट की असली कहानी कहता है

Editor's note: सिर्फ रूस ही ‘रहस्य के आवरण में लिपटी अबूझ पहेली’ नहीं. रूस को लेकर विंस्टन चर्चिल के कहे इस मुहावरे को कुछ लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी ठीक बताएंगे. इसी कारण बहुत से विश्लेषक दोनों (मोदी और आरएसएस) की व्याख्या अपने मनचाहे ढंग से करते हैं. बीते 17, 18 और 19 सितंबर को दिल्ली के अभिजन लोगों के बीच मोहन भागवत ने जब अपनी बात रखी तो बिल्कुल यही हुआ. भागवत ने बताया कि भारत के बारे में आरएसएस की सोच क्या है. उन्होंने मुस्लिम, हिन्दुत्व, कांग्रेस तथा भारत में मौजूद जातिगत बंटवारे के बारे में भी अपनी बातें रखीं.

भागवत के कहे को या तो ‘आरएसएस के रुख’ से एकदम ही अलग मानकर देखा गया या फिर ये सोचा गया कि यह सब मोदी के ऊपर अंकुश लगाने और परिवार की विचारधारा को गढ़ने वाले गुरु के रूप में आरएसएस की साख और धाक को नए सिरे से जताने की कवायद है. आरएसएस के इर्द-गिर्द रहस्य का जो आवरण खड़ा करने की कोशिश की जाती है, हम तीन कड़ियों की इस सीरीज में उसे भेदने की कोशिश करेंगे, साथ ही ,सीरीज में आरएसएस से बीजेपी के रिश्ते पर बात की जाएगी. सीरीज में यह भी दिखाया जाएगा कि मोदी की राजनीति आरएसएस के राष्ट्र-निर्माण के एजेंडे से अलग नहीं है. पेश है दूसरी कड़ी...

इमरजेंसी के बाद के दौर में आरएसएस पर आरोप लगे कि इसे ब्राह्मण और ऊंची जाति के लोग ही चला रहे हैं. संघ पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जनजातियों से पक्षपात करता है. उस दौर में संघ पर ऐसे आरोपों की बौछार करने वालों में समाजवादी विचारधारा के लोग सबसे आगे थे. इसकी बड़ी वजह ये थी कि संघ ने सियासी तौर पर समाजवादियों के झंडे तले रहने और उनके पीछे-पीछे चलने से इनकार कर दिया था.

जनता पार्टी के राज में इसके नेताओं की दोहरी सदस्यता का विवाद उठा. समाजवादी नेताओं ने आरोप लगाया कि जनता पार्टी के कई मंत्री और नेता संघ के भी सदस्य हैं. इस विवाद की बड़ी वजह ये थी कि समाजवादी नेताओं का एक तबका आरएसएस को अपने इशारे पर नचाने में नाकाम रहा था. दोहरी सदस्यता के विवाद के दौरान उस वक्त के संघ प्रमुख बाला साहब देवरस ने पुरजोर तरीके से समाजवादियों के आरोपों का जवाब तथ्यों के आधार पर दिया था.

देवरस ने संघ के वरिष्ठ नेताओं की सूची जारी करके बताया कि संघ के तमाम सीनियर नेता समाज के अलग-अलग तबकों और देश के अलग-अलग हिस्सों से आते हैं. बाला साहब देवरस ने संघ पर आरोप लगाने वाले समाजवादियों को आईना दिखाते हुए कहा कि ज्यादातर समाजवादी ब्राह्मण हैं. सत्तर के दशक में आरएसएस बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े तबके के लोगों को अपने साथ जोड़ रहा था.

पिछड़े वर्ग के बहुत से नेताओं का हिंदुत्ववाद के प्रतीक के तौर पर उभरने का सिलसिला अनायास नहीं था. पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज हिंदुत्व के सबसे बड़े नेता हैं. ये न तो इत्तेफाक है और न ही हादसा. ये आरएसएस के उस इतिहास और प्रयास का नतीजा है, जिसके तहत संघ सभी जातियों को हिंदुत्व के झंडे तले एकजुट करने में जुटा हुआ है. आज संघ परिवार में दलित और पिछड़ा बनाम सवर्ण की दरार पैदा करने की कोशिश बचकानी होगी. ऐसी कोशिशों से संघ में दरार तो क्या ही पड़ेगी. बल्कि संघ और मजबूत होकर उभरेगा. हो सकता है कि मोदी की ही तरह संघ परिवार से कोई दलित हिंदुत्ववादी नेता उभरे. संघ परिवार के काडर में आज जिस तरह का क्रांतिकारी बदलाव हो रहा है, ऐसे में इस तरह की संभावना ज्यादा दूर की बात नहीं.

New Delhi: RSS chief Mohan Bhagwat speaks on the 2nd day at the event titled 'Future of Bharat: An RSS perspective', in New Delhi, Tuesday, Sept 18, 2018. (PTI Photo) (PTI9_18_2018_000191B) *** Local Caption ***

संघ को अक्सर निष्पक्ष होकर नहीं देखा जाता

आरएसएस और संघ परिवार के दूसरे संगठनों के बारे में समझ अक्सर बौद्धिकता की कमी की शिकार रही है. संघ परिवार को अक्सर दो ही चश्मों से देखा जाता रहा है. या तो इसका भक्ति गान होता है, या फिर इसकी निंदा होती है. जबकि, ऐसा बिल्कुल नहीं है कि संघ और इसके तमाम संगठनों के बारे में रिसर्च हुई ही न हो. मुश्किल ये है कि ऐसे तमाम अध्ययनों के बावजूद किसी सही नतीजे पर पहुंचने में आलोचक नाकाम रहे हैं.

मसलन, 1951 में अमेरिकी विद्वान जे ए क्यूरन जूनियर की रिसर्च को ही लीजिए. क्यूरन ने संघ के बारे में बिल्कुल सटीक बात कही थी कि, 'आम तौर पर ऐसा माना जाता है कि सत्ता में आने पर संघ पूंजीपतियों, जमींदारों और समाज के ताकतवर तबके के साथ खड़ा होगा. लेकिन इस लेखक का मानना है कि भले ही आज आरएसएस के ज्यादातर समर्थक और कार्यकर्ता समाज के ऊंचे तबके से आते हों. उन्हें ये लगता हो कि संघ उनके हितों की रक्षा करेगा. लेकिन मुझे संघ के स्वयंसेवकों में ऐसा भाव बिल्कुल नहीं दिखता. भले ही आज संघ के पास कोई ठोस आर्थिक नीति और योजना न हो. लेकिन आरएसएस के स्वयंसेवकों में हिंदूवादी समाजवाद के प्रति झुकाव साफ दिखता है.'

क्यूरन ने आरएसएस पर अपनी रिसर्च भारतीय जनसंघ के गठन से पहले की थी. इसी जनसंघ से आगे चल कर बीजेपी का जन्म हुआ था. बाद की घटनाओं से आरएसएस को लेकर क्यूरन का अंदाजा सही साबित हुआ. मसलन, भारतीय जनसंघ ने खुलकर जमींदारी उन्मूलन और रियासतों के प्रिवीपर्स खत्म करने का समर्थन किया. जबकि माना ये जाता था कि जनसंघ उदारवादी अर्थव्यवस्था के हक में है.

अपने रुख की वजह से जनसंघ को चुनाव में नुकसान भी उठाना पड़ा था. आर्थिक एजेंडा की बात करें, तो आरएसएस-बीजेएस के मुकाबले, सी राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी के पास कांग्रेस के मुकाबले के लिए ज्यादा मुखर आर्थिक नीति थी. कांग्रेस के समाजवादी झुकाव के मुकाबले, पंडित दीनदयाल उपाध्याय का 'एकात्म मानववाद का सिद्धांत', संघ परिवार की अनमनी सी कोशिश थी.

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संघ ने कभी भी खुद को ब्राह्मणवादी संगठन नहीं बनाना चाहा

1967 में भारतीय जनसंघ ने स्वतंत्र पार्टी, समाजवादियों और कट्टरपंथी हिंदू महासभा और रामराज्य परिषद के साथ गठजोड़ किया. इससे पहले तक जनसंघ ने वक्त और हालात के हिसाब से हमेशा अपनी नीतियों में बदलाव किया. लेकिन, तमाम बदलावों के बावजूद, संघ परिवार, हिंदुओं को एकजुट करने के अपने मूल लक्ष्य से कभी नहीं भटका.

ये आदर्श उस दौर में बेहद ताकतवर नेहरूवादी राजनैतिक माहौल के बिल्कुल खिलाफ थी. खुद को सेक्युलर कहने वाले आरएसएस-बीजेएस को सांप्रदायिक कहते थे. इसके बावजूद संघ परिवार ने हमेशा ही परंपरागत हिंदुत्ववादी सोच का विरोध किया, जिसका मतलब था कि वो खुद को ब्राह्मणवादी संगठन नहीं बनाना चाहता था. ये लचीला रुख इसलिए था ताकि संघ परिवार तमाम सामाजिक समूहों को अपने साथ जोड़ सके. अलग रिवाज और परंपराएं मानने वाले हिंदुओं के तमाम समुदायों को एकजुट कर सके. इनमें से कई समुदाय तो ऐसे भी थे, जो एक-दूसरे के बिलकुल ही खिलाफ थे.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

इस नजरिए से देखें तो जिस तरह से आरएसएस, बीजेपी का वैचारिक संरक्षक रहा है, सियासी पार्टियों के विकास के इतिहास में इसकी कोई मिसाल नहीं मिलती. जिस तरह से आरएसएस ने भारतीय जनसंघ के जनता पार्टी में विलय की इजाजत दी, उससे साफ था कि संघ को अपने स्वयंसेवकों पर कितना भरोसा था. जब बाला साहब देवरस ने चिट्ठी लिखी की संघ के स्वयंसेवक अपनी इच्छा से अपनी पसंद की राजनैतिक विचारधारा के अनुयायी बन सकते हैं, तो उनकी कड़ी आलोचना हुई थी. लेकिन बाला साहब देवरस अपनी बात पर अडिग रहे.

देवरस ने कहा कि उन्हें अपने स्वयंसेवकों पर भरोसा है कि वो केवल एक चिट्ठी से निर्देशित नहीं होंगे. और जैसा कि हम ने बाद में देखा भी, जब समाजवादी नेताओं ने जनता पार्टी के भीतर जनसंघ के नेताओं पर दोहरी सदस्यता छोड़ने का दबाव बनाया, तो गिने-चुने लोगों को छोड़ कर जनसंघ के ज्यादातर नेताओं ने सत्ता का त्याग करना मंजूर किया, लेकिन संघ की विचारधारा का त्याग नहीं किया. बाद में इन्हीं जनसंघी नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी का गठन किया.

अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में बीजेपी 'गांधीवादी समाजवाद' की विचारधारा पर चली. इसके तहत उस दौर के सियासी माहौल के मुताबिक बीजेपी ने समतावादी समाज के विकास का वादा किया था. आरएसएस-बीजेपी की विकास यात्रा की सब से खास बात ये है कि दोनों ही संगठनों के नेता, सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों, खास तौर से अति पिछड़ा वर्ग/अनुसूचित जाति-जनतातियों के विकास के लिए राजनीति को हथियार बनाने की राय पर एकमत रहे हैं.

हिंदू राष्ट्र की संघ की परिकल्पना में हिंदू समाज के हाशिए पर पड़े तबकों को मुख्यधारा में शामिल करना राष्ट्र निर्माण का अहम हिस्सा है. जिस तरह मोदी सरकार ने एससी-एसटी एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने के लिए अध्यादेश जारी किया, उससे ये बात स्पष्ट हो जाती है. इसमें कोई दो राय नहीं कि संघ परिवार की ऐसी परियोजना का टकराव इसके सवर्ण समर्थकों के हितों से होता है. लेकिन ये सोचना बचकाना होगा कि संघ परिवार ऐसी चुनौतियों से पार नहीं पा सकेगा. संघ परिवार, सामाजिक बारूदी सुरंगों से भरे इन रास्तों पर सहजता और सुरक्षा के भाव से सफर करना बखूबी जानता है.

इस कड़ी का पहला लेख: मोहन भागवत ने संघ की सच्ची तस्वीर सामने रखी है...भ्रम तो आलोचकों में है

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