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एक राष्ट्र एक चुनाव: मोदी और बीजेपी अपनी 'ताकत' का इस्तेमाल कर इसे वास्तविकता में बदलें

जब तक एक राष्ट्र, एक चुनाव की कल्पना हकीकत में बदले, तब तक कम से कम एक साल, एक चुनाव को तो वास्तविकता के धरातल पर ला ही सकते हैं

Updated On: Jan 31, 2018 12:06 PM IST

Sanjay Singh

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एक राष्ट्र एक चुनाव: मोदी और बीजेपी अपनी 'ताकत' का इस्तेमाल कर इसे वास्तविकता में बदलें

लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एकसाथ कराने के गुणों से सभी भलीभांति परिचित हैं. अगर भविष्य में कभी ऐसा होता है तो यह काफी फायदेमंद होगा.

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते वक्त इस मसले का जिक्र किया था, ऐसे में इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि सरकार इस पर गंभीरतापूर्वक विचार कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक साल से भी ज्यादा वक्त से इस पर जोर दे रहे हैं.

राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण में कहा, ‘नागरिकों में देश के किसी न किसी हिस्से में लगातार होने वाले चुनावों को लेकर चिंता है. इससे अर्थव्यवस्था और विकास पर बुरा असर पड़ता है. बार-बार होने वाले चुनावों से न सिर्फ मानव संसाधन पर भारी बोझ पड़ता है, बल्कि इससे आदर्श आचार संहिता लागू होने से विकास के काम भी रुक जाते हैं. ऐसे में एकसाथ चुनावों के विषय पर एक सतत बहस की जरूरत है और सभी पार्टियों को इस मसले पर आम सहमति बनानी चाहिए.’

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद बजट सत्र से पहले संसद को संबोधित करते हुए

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद बजट सत्र से पहले संसद को संबोधित करते हुए

मूलरूप में वो वही कह रहे थे जो पीएम मोदी गुजरे कुछ वक्त से कहते आ रहे हैं. अब तक यह बात केवल प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी कह रही थी. बीजेपी एकमात्र पार्टी है जो कि इस आइडिया पर जोर दे रही है. हकीकत यह है कि बीजेपी के पास लोकसभा में मजबूत बहुमत है और पार्टी राज्यसभा में अपनी अधिकतम संख्या में है. 14 राज्यों में बीजेपी के मुख्यमंत्री हैं और 5 अन्य राज्यों में उसके सहयोगी एनडीए पार्टनर्स की सरकारें हैं. ऐसे में इस तरह का आइडिया काफी मजबूत हो जाता है. बीजेपी के एक सीनियर लीडर ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि जब वो हमसे या हम उनसे निजी तौर पर बात करते हैं तो वो इस आइडिया पर सहमति जताते हैं, लेकिन सार्वजनिक तौर पर चर्चा में वो इसके विरोध में उतर आते हैं.

कुछ राज्यों में कांग्रेस कमजोर पड़ी और इंदिरा गांधी केंद्र में सत्ता में आईं, चीजें बदल गईं

हकीकत यह है कि 1967 तक संसद और राज्यों के विधानसभा के चुनाव एकसाथ होते थे, लेकिन जैसे ही कुछ राज्यों में कांग्रेस कमजोर पड़ी और इंदिरा गांधी केंद्र में सत्ता में आईं, चीजें बदल गईं.

कोई भी इस बात का अनुमान नहीं लगा सकता कि अगर यह आइडिया लागू हुआ भी तो ऐसा कब होगा. यह एक बड़ा काम है जिसके साथ कई जटिलताएं जुड़ी हुई हैं. इसकी शुरुआत चुनाव आयोग को करनी होगी और इसके लिए संवैधानिक संशोधन करना होगा. इसके जरिए राज्य विधानसभाओं और संसद की अवधि को 5 साल के लिए तय करना होगा और इस पर किसी सरकार के बीच में गिरने का कोई फर्क नहीं पड़ेगा. ऐसे वक्त पर जबकि सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियों के बीच संबंध बेहद खराब दौर से गुजर रहे हैं, इस मसले पर संसद और राज्यों में आम सहमति बना पाना आसान नहीं होगा, लेकिन फिर यह भी सत्य है कि राजनीति मुमकिन बनाने की कला का नाम है.

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भारत में चुनाव कराने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग पर है

इस मसले पर कई तरह के तर्क और इनके विरोधी तर्क दिल्ली के सत्ता गलियारों में चल रहे हैं और इनमें वास्तविक संभावनाएं क्या बनेंगी यह कहना मुश्किल है.

आम सहमति के नहीं बन पाने और एक साथ चुनावों को मुमकिन कराने को लेकर एक भरोसेमंद और ठोस तर्क के लिए (ऐसा करने के लिए कुछ विधानसभाओं के टेन्योर कम करने होंगे, जबकि कुछ की अवधि बढ़ानी पड़ सकती है और ऐसा ही कुछ केंद्र में भी करना पड़ सकता है) मोदी सरकार एक आसान उपाय कर सकती है. सरकार किसी एक साल में होने वाले सभी चुनावों को एकसाथ करा सकती है. अगर ऐसा करने में सरकार को सफलता मिलती है तो यह इस प्रयास को और आगे ले जाने में मददगार साबित होगा.

चुनाव आयोग ने 2017 के शुरू में 5 राज्यों में चुनावी तारीखों का ऐलान किया था

2017 में किस तरह से चुनाव हुए उन पर नजर डालते हैं. चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब और मणिपुर में चुनावी तारीखों का ऐलान 5 जनवरी को किया. पंजाब और गोवा में फरवरी में मतदान के साथ चुनाव शुरू हुए और इनका अंत 9 मार्च को यूपी के साथ हुआ. ये चुनाव 7 चरणों में हुए. इसके बाद 13 अक्टूबर को चुनाव आयोग ने हिमाचल प्रदेश के लिए चुनावी तारीख घोषित की और यहां 9 नवंबर को मतदान हुआ, लेकिन इसके नतीजे गुजरात के साथ 19 दिसंबर को आए. 2017 में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के भी चुनाव हुए.

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2018 में 8 राज्यों में चुनाव होने हैं. गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनावी प्रक्रिया पूरी होने के 2 महीने के बाद त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड में चुनाव हो सकते हैं. सवाल यह है कि चुनाव आयोग हिमाचल, गुजरात और तीन पूर्वोत्तर राज्यों के चुनाव एकसाथ क्यों नहीं करा सकता था जबकि इन 5 राज्यों में 4 महीने के भीतर चुनाव होने थे.

त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड में चुनाव पूरा होने के 2 महीने बाद ही कर्नाटक में चुनावी प्रक्रिया शुरू होनी है. कर्नाटक में अप्रैल-मई में चुनाव होने हैं. इसके 4 महीने बाद चुनावों का एक और दौर शुरू होगा. इसमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में चुनाव होंगे. इन 4 राज्यों में चुनाव अक्टूबर-नवंबर में कराए जा सकते हैं. चुनाव आयोग इन 4 राज्यों और कर्नाटक के चुनाव एकसाथ कराने पर विचार कर सकता है.

अगले साल देश में आम चुनाव होने हैं. 5 राज्यों- ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में भी संसदीय चुनावों के साथ विधानसभा चुनाव होंगे. लोकसभा चुनाव कराने के बाद चुनाव आयोग महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड (सभी बीजेपी शासित राज्य) में चुनाव कराने की तैयारियों में जुट जाएगा. चुनाव आयोग हरियाणा और झारखंड में चुनावों को थोड़ा पहले कराकर इन्हें लोकसभा चुनावों के साथ जोड़ सकता है.

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कम से कम एक साल, एक चुनाव को तो वास्तविकता के धरातल पर ला ही सकते हैं

शब्दों से आगे बढ़कर पीएम मोदी और बीजेपी अगर राजनीतिक प्रतिबद्धता दिखाएं तो वो इस दिशा में कदम उठा सकते हैं. जब तक एक राष्ट्र, एक चुनाव की कल्पना हकीकत में बदले, तब तक कम से कम एक साल, एक चुनाव को तो वास्तविकता के धरातल पर ला ही सकते हैं.

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