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तेलंगाना में चंद्रशेखर राव की क्यों ‘मदद’ करना चाहते हैं मोदी-शाह?

तमाम कवायदों के बीच टीआरएस और बीजेपी, दोनों पार्टियां एक राष्ट्र, एक चुनाव की अपनी प्राथमिकता भूल गई हैं.

Updated On: Sep 06, 2018 03:45 PM IST

T S Sudhir

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तेलंगाना में चंद्रशेखर राव की क्यों ‘मदद’ करना चाहते हैं मोदी-शाह?
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तेलंगाना संघर्ष समिति (टीआरएस) के मुखिया के. चंद्रशेखर राव द्वारा बीते रविवार को हैदराबाद के पास रैली को संबोधित किए जाने के कुछ ही घंटे बाद तेलंगाना बीजेपी के नेताओं ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ हैदराबाद हवाई अड्डे पर गुप्त बैठक की. बैठक रात के 11 बजे शुरू हुई और अगले 3 घंटे तक चली.

इस बैठक में तेलंगाना बीजेपी ने राज्य विधानसभा चुनावों को तय वक्त से पहले कराने के चंद्रशेखर राव के संभावित फैसले को लेकर नाखुशी जताई. दरअसल ऐसा होने की स्थिति में इस राज्य के चुनाव 2019 की गर्मियों में होने वाले लोकसभा चुनाव के साथ नहीं हो सकेंगे.

तेलंगाना की बीजेपी इकाई को 2014 के राज्य विधानसभा चुनावों में महज 5 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. पार्टी को पता है कि कुछ शहरी हिस्सों को छोड़ दिया जाए तो बाकी तेलंगाना में उसकी खास लोकप्रियता नहीं है. इसके अलावा, भारतीय जनता पार्टी की राज्य इकाई इस बात से भी भलीभांति वाकिफ है कि तेलंगाना में उसके पास कोई बड़ा नेता नहीं है. इन वजहों से बीजेपी की तेलंगाना इकाई को लगता है कि अगर दोनों चुनाव एक साथ कराए जाएं, तो नरेंद्र मोदी फैक्टर की भूमिका अहम हो जाएगी और इससे उसे लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों में मदद मिलेगी.

सूत्रों के मुताबिक, हैदराबाद हवाई अड्डे पर बीजेपी की तेलंगाना इकाई के नेताओं के साथ बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय अमित शाह का कहना था, 'के. चंद्रशेखर राव जब भी चाहें, उनके पास विधानसभा भंग करने का अधिकार है। हम इसमें क्या कर सकते हैं?' शाह के इस बयान का साफ मतलब था कि बीजेपी का राष्ट्रीय नेतृत्व विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही चुनाव कराने को लेकर के. चंद्रशेखर राव के फैसले में बाधा नहीं डालना चाहता है. इस राज्य के विधानसभा चुनाव उत्तर भारत के तीन राज्यों- राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों के साथ हो सकते हैं.

पिछले दो महीने में PM नरेंद्र मोदी से 3 बार मिल चुके हैं राव

modi rao

के. चंद्रशेखर राव ने जुलाई और अगस्त महीने के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तीन बार मुलाकात की. राव का पिछला दिल्ली दौरा विशेष तौर पर महत्वपूर्ण था. दरअसल, के. चंद्रशेखर राव की इस दिल्ली यात्रा से पहले उनके एक वरिष्ठ सलाहकार जल्द चुनावों की संभावना को तलाशने के मकसद से पहले ही चुनाव आयोग से मुलाकात कर चुके थे.

भारतीय जनता पार्टी के सूत्रों का दावा है कि तेलंगाना संघर्ष समिति के मुखिया राव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह दोनों के साथ मुलाकात कर विधानसभा भंग करने के अपने प्लान पर चर्चा की थी. दरअसल, चंद्रशेखर राव के लिए इस पूरी प्रक्रिया से बीजेपी को अवगत रखना बेहद अहम था, क्योंकि केंद्र सरकार को भरोसा में लिए बिना इस दिशा में आगे बढ़ना उनके लिए जोखिम भरा हो सकता था. केंद्र सरकार को भरोसे में नहीं लिए जाने की सूरत में चुनाव आयोग या कार्यपालिका ईवीएम या केंद्रीय बलों का हवाला देकर तय वक्त से पहले विधानसभा चुनाव कराने की उनकी योजना को पलीता लगाने की कोशिश कर सकते थे.

तेलंगाना की मौजूदा बीजेपी इकाई को लगता है कि केंद्रीय नेतृत्व उसकी राय को पर्याप्त तवज्जो नहीं देता है. संयुक्त आंध्र प्रदेश के दौर में भी राज्य के पार्टी संगठन को हमेशा ऐसा ही लगता था. दरअसल, संयुक्त आंध्र प्रदेश के दौर में बीजेपी के पूर्व सहयोगी चंद्रबाबू नायडू सीधा अटल बिहारी वाजपेयी या मोदी के साथ संपर्क में रहते थे और स्थानीय नेतृत्व को अलग रखते हुए सीधा बीजेपी के इन शीर्ष नेताओं से ही संवाद करते थे.

बीजेपी की राज्य इकाई की शिकायत है कि उसे कभी आगे बढ़ने या विकास करने का मौका नहीं दिया गया और पार्टी संगठन को नायडू द्वारा फेंके गए टुकड़े को स्वीकार कर अपने हितों से समझौता करने पर मजबूर होना पड़ा. तेलंगाना के बीजेपी नेताओं को आशंका है कि के. चंद्रशेखर राव की कहानी भी इसी दिशा में आगे बढ़ती हुई जान पड़ती है.

नायडू फैक्टर के कारण TRS को तवज्जो दे रहा है BJP नेतृत्व

Chandrababu Naidu

दरअसल, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने नायडू फैक्टर के कारण के. चंद्रशेखर राव को प्रोत्साहित करने का फैसला किया है. चंद्रबाबू नायडू की पार्टी तेलुगू देसम ने आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिए जाने पर इसी साल मार्च में एनडीए से अलग होने का फैसला किया था. बीजेपी के मुताबिक, नायडू वास्तव में यह संदेश देने की कोशिश कर रहे थे कि मोदी-शाह की जोड़ी गठबंधन सहयोगियों और दक्षिण भारत की विरोधी है. ऐसे में बीजेपी और उसकी अगुवाई वाली केंद्र सरकार की प्राथमिकता इस धारणा को दूर करने की थी.

तेलंगाना बीजेपी के एक नेता का कहना था, 'पार्टी को लगता है कि हमें कुछ सहयोगी या दोस्त चाहिए, क्योंकि कुछ लोग हमें छोड़कर चले गए हैं. राज्य सभा के उपसभापित के लिए हुआ चुनाव ऐसा मौका था, जहां हमने तेलंगाना संघर्ष समिति और बीजू जनता दल जैसी पार्टियों के रूप में दोस्त पाए हैं.'

बहुमत का आंकड़ा जुटाने के लिए जरूरी होंगे सहयोगी!

बीजेपी इस बात को भी समझ रही है कि अगले लोकसभा चुनावों के नतीजों में शायद उसके पास पर्याप्त बहुमत का आंकड़ा नहीं हो, लिहाजा उसे क्षेत्रीय पार्टियों को लेकर पहल करने पर मजबूर होना पड़ रहा है. चूंकि हिंदीभाषी राज्यों में भारतीय जनता पार्टी को 2014 के मुकाबले सीटों की संख्या में बेहतरी के आसार नहीं हैं, लिहाजा ये क्षेत्र उसके लिए अहम हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में तेलंगाना में टीआरएस, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस, तमिलनाडु में एआईएडीमके चुनाव के बाद संभावित सहयोगी पार्टियों के तौर पर उसके निशाने पर हो सकती हैं.

तेलंगाना के मामले में कहा जा रहा है कि बीजेपी फिलहाल तय वक्त से पहले राज्य विधानसभा चुनावों को हरी झंडी देकर और इस तरह से के. चंद्रशेखर राव की मदद करने को अपने लिए बेहतर विकल्प मान रही है. दरअसल, इस तरह से टीआरएस को मदद कर बीजेपी का इरादा मई 2019 के लोकसभा चुनावों में राव से मदद की मांग करना है. तेलंगाना में बीजेपी के पास ज्यादा कुछ दांव पर नहीं हैं, इसलिए अगर विधानसभा चुनावों को तय वक्त से पहले भी कराया जाता है, तो उसके (बीजेपी) पास खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं होगा.

एक साथ चुनाव कराने को लेकर अपनी बात भूल गईं दोनों पार्टियां

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इन तमाम कवायदों के बीच टीआरएस और बीजेपी, दोनों पार्टियां एक राष्ट्र, एक चुनाव की अपनी प्राथमिकता भूल गई हैं. तेलंगाना संघर्ष समिति ने इस साल के शुरू में चुनाव आयोग को चिट्ठी लिखकर लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने के आइडिया का समर्थन किया था. इसके अलावा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गैर-जरूरी खर्चों को रोकने के लिए एक साथ चुनाव कराने का लगातार समर्थन करते रहे हैं.

ऐसे में तेलंगाना में चार महीने के अंदर होने वाले दो चुनावों के मद्देनजर जनता के पैसे के 'दुरुपयोग' के बारे में दोनों पार्टियां किस तरह से स्पष्टीकरण पेश करेंगी? खास तौर पर जब मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल जून 2019 तक है.

हालांकि, रिश्तों में इस मधुरता का मतलब यह नहीं होगा कि टीआरएस और बीजेपी राज्य विधानसभा चुनाव एक साथ लड़ेंगी. कम से कम खुलकर तो ऐसा नहीं होगा. ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि के. चंद्रशेखर राव तेलंगाना में मुस्लिम समुदाय का वोट गंवाना पसंद नहीं करेंगे, जिसे उन्होंने ईद से पहले तोहफे बांटकर और अन्य योजनाओं के जरिये काफी मेहनत से अपनी तरफ लुभाया है. राव ने मुसलमान परिवारों को विवाह में मदद के लिए शादी मुबारक जैसी योजना पेश की है और एआईएमआईएम के साथ दोस्ती गांठकर भी मुसलमानों के बीच पॉजिटिव संकेत देने का प्रयास किया है.

जहां तक बीजेपी का सवाल है तो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राज्य के नेताओं को उन सीटों की पहचान कर उस पर फोकस करने को कहा है, जहां 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी दूसरे या तीसरे स्थान पर रही थी. उन्होंने तेलंगाना चुनाव को ध्यान में रखते हुए आरएसएस से जुड़े बी.एल. संतोष को हैदराबाद में तैनात किया है. संतोष ने कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में अहम भूमिका निभाई थी.

बीजेपी अध्यक्ष ने बीजेपी के प्रचार अभियान की शुरुआत करने के लिए तेलंगाना के महबूबनजर जिले में अगले हफ्ते एक जनसभा को संबोधित करने का वादा भी किया है. बीजेपी की राज्य इकाई की योजना 17 सितंबर को भी कुछ करने की है. दरअसल, 1948 में इसी तारीख को हैदराबाद को निजाम के शासन से मुक्त कराकर इसका विलय भारतीय संघ में किया गया था. भारतीय जनता पार्टी इस दिन को हिंदू बहुल हैदराबाद द्वारा अपने मुसलमान शासक को हटाए जाने के तौर पर पेश करेगी. दरअसल, इसी तारीख को नरेंद्र मोदी का जन्मदिन भी है, इसलिए उसे इस अभियान में और मदद मिलेगी.

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