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पकौड़े के पीछे अपने सरकार की विफलता छुपा रहे हैं मोदी और शाह

बीजेपी अगर लगातार यह तर्क देती रही कि सड़कों पर पकौड़े बेचने वालों की बढ़ती संख्या सरकार की नीतियों का संकेत है, तो पार्टी अपनी चुनावी किस्मत को बदलने का जोखिम उठा रही है

Sandipan Sharma Sandipan Sharma Updated On: Feb 06, 2018 12:07 PM IST

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पकौड़े के पीछे अपने सरकार की विफलता छुपा रहे हैं मोदी और शाह

हिंदी की एक बेहद मूढ़ और लोकप्रिय कहावत के मुताबिक, ‘अगर किस्मत में हैं हथौड़े, तो कहां से मिलेंगे पकौड़े’. यानी अगर आपकी किस्मत में दर-दर की ठोकरें खाना लिखा है, तो जिंदगी में ऐशो-आराम और सुख-चैन की उम्मीद करना बेमानी है. लगता है बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी इस अनूठी उत्तर भारतीय कहावत पर यकीन करते हैं. तभी तो उन्होंने राज्यसभा में अपने पहले भाषण के दौरान पकौड़ों की दलील दे डाली.

देश में बेरोजगारी की बढ़ती समस्या पर अमित शाह ने तर्क दिया कि, 'बेरोजगार होने से बेहतर है, पकौड़े बेचना'. अमित शाह के तर्क का मतलब यह हुआ कि, पकौड़े या उस जैसी नाश्ते की दूसरी चीजें बेचने वाले बेरोजगार लोगों को खुद को बेहद भाग्यशाली समझना चाहिए.

आखिर पकौड़ा कौन बेचता है?

फिर भी गहराई से सोचा जाए तो, अमित शाह के तर्क को चुटकी भर नमक से ज्यादा तवज्जो नहीं दी जानी चाहिए. यानी हमें उनके इस बयान को विस्तृत रूप के बजाए लघु और तात्कालिक स्तर पर देखना होगा. पकौड़े बेचना शायद ही किसी की पसंद या करियर विकल्प हो. आमतौर पर पकौड़े बेचने जैसे व्यवसाय का फैसला वह इंसान करता है, जिसके पास अन्य विकल्पों का अभाव होता है. भूख और बेरोजगारी जैसी चुनौतियों के सामने अपने अस्तित्व को बनाए रखने की मजबूरी में ही लोग ऐसा रोजगार चुनते हैं. मैं शर्त लगा सकता हूं कि भारत में कोई भी ऐसा इंसान नहीं होगा, जो गलियों में, सड़क पर, टीवी स्टूडियो के बाहर और शराब की दुकानों के नजदीक पकौड़े बेचने का सपना देखता होगा.

इसलिए, अगर अमित शाह और उनसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सरकार की कामयाबी की दास्तान के तौर पर पकौड़ाशास्त्र (पकौड़ों का अर्थशास्त्र) को बेचने की कोशिश कर रहे हैं, तो उन्हें याद दिलाया जाना चाहिए कि, वास्तव में यह उनकी नाकामी है.

देश ने पकौड़ा बेचने के लिए बीजेपी को नहीं चुना था

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भारत की जनता ने बीजेपी को इसलिए वोट नहीं दिए थे कि उन्हें और ज्यादा पकौड़े खरीदने पड़ें. लोगों ने बीजेपी को इसलिए बंपर जीत नहीं दिलाई थी कि देश के बेरोजगार युवा गलियों, सड़कों, नुक्कड़ों और चौराहों के किसी कोने पर पकौड़े तलें, अंडे उबालें या पानीपूरी (गोलगप्पों) के स्टॉल लगाएं. भारत की जनता ने अच्छे दिनों की आशा में बीजेपी को वोट दिए थे. लोगों ने बीजेपी को इसलिए चुना था, ताकि उन्हें रोजगार मिल सके, चौतरफा विकास हो और वे इज्जत और उम्मीद के साथ जिंदगी बसर कर सकें. लेकिन अब अपने बचकाने पकौड़ा तर्क के जरिए बीजेपी केवल अपनी विफलता को छिपा रही है.

Amit Shah and Narendra Modi in Ahmedabad

इसके अलावा, अगर एक युवा किसी सड़क के किनारे अपनी दुकान लगाता है, तो इसमें भला सरकार का क्या योगदान होता है? मजबूरी के हालात में जिंदा रहने के लिए वह अपने लिए स्टोव, तेल, मसाले और कुछ ग्राम आटा खरीदता है. क्या सरकार इस मामले में युवाओं की कोई मदद करती है? वास्तव में शाह और मोदी ने अपनी दलीलों के जरिए एक निराशाजनक उपाय सुझाया है. उनकी दलीलें देश की जनता की आशाओं और सपनों के अंत का संकेत दे रही हैं. ऐसा लग रहा है कि मोदी सरकार ने विपरीत परिस्थितियों के सामने हथियार डालकर समर्पण कर दिया है. कोई भी सरकार अगर इसका श्रेय लेने का दावा करती है, तो यह समझिए कि वह अपनी नाकामी के लिए खुद पर ही हंस रही है.

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यूपीए सरकार के दौरान पकौड़े बेचना एक मजबूरी भरा विकल्प था. क्योंकि यूपीए सरकार के वक्त अर्थव्यवस्था कड़ाही (फ्राइंग पैन) में थी. यानी उस दौरान देश की अर्थव्यवस्था में खासी उथल-पुथल मची हुई थी. यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान आर्थिक विकास की दर नई सहस्राब्दी के शुरुआती वर्षों के उच्च स्तर के मुकाबले काफी नीचे आ गई थी. जो कि आर्थिक विकास की गणना की पुरानी पद्धति के मुताबिक पांच फीसदी से भी कम थी. इसलिए, 2014 के चुनाव में भारत की जनता ने अच्छे दिनों की उम्मीद के साथ बीजेपी को वोट दिए थे.

30 साल लग जाएंगे नौकरियां पैदा करने में

ज्यादातर लोगों ने सोचा था कि बीजेपी की सरकार बनने के बाद 'पांचों उंगलियां घी में होंगी'. मतदाताओं को लगता था कि नरेंद्र मोदी अपने अभिनव विचारों और नई ऊर्जा के साथ भारत को विकास और संपन्नता की तेज राह पर ले जाएंगे. युवाओं का मानना था कि मोदी हर साल एक करोड़ नौकरियों के अवसर पैदा करने का अपना वादा जरूर पूरा करेंगे. लेकिन, जैसा कि 'द हिंदू' अखबार में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि नई नौकरियों के सृजन की वर्तमान दर से मोदी सरकार को अपना वादा पूरा करने में 30 साल लग जाएंगे.

देश में हर साल लगभग 13 मिलियन युवा कार्यबल (वर्क फोर्स) में शामिल होते हैं. यानी सालाना करीब 1 करोड़ 30 लाख नए लोग नौकरी या रोजगार की तलाश में सामने आते हैं. मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान इनमें से सिर्फ 3.4 लाख लोगों को ही नौकरियां मिल पा रही हैं. यह कोई हवाई तथ्य नहीं हैं, बल्कि यह आंकड़े श्रम मंत्रालय द्वारा साल 2016 में कराए गए एक सर्वेक्षण (सर्वे) में सामने आए हैं. मोदी सरकार में नौकरियों के सृजन की दर यूपीए-2 सरकार (2009-2014) के मुकाबले आधी है. जाहिर है, ऐसे में जिन लोगों को रोजगार नहीं मिल पाता है, उन्हें जीविका चलाने के लिए पकौड़े बेचने ही पड़ेंगे.

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नई नौकरियां तब पैदा होती हैं जब अर्थव्यवस्था में अच्छी दर के साथ विकास होता है. कंपनियां अपने यहां लोगों को नौकरियों पर तब भर्ती करती हैं, जब वे अपने उत्पादों और सेवाओं की मांग बढ़ने पर अपनी क्षमताओं और कारोबार के विस्तार में निवेश करती हैं. विकास के मोर्चे पर मोदी सरकार का रिकॉर्ड उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहा है. जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का तर्क है कि मोदी सरकार अपने पहले चार वर्षों के कार्यकाल में यूपीए सरकार के दौरान दर्ज विकास दर के मुकाबले औसत दर को भी हासिल करने में नाकाम रही है.

डांवाडोल अर्थव्यवस्था की वजह से नौकरियां कम

मोदी सरकार में डांवाडोल अर्थव्यवस्था की वजह कई गतिरोध और विघटनकारी उपाय हैं, जैसे- नोटबंदी और जल्दबाजी में जीएसटी का कार्यान्वयन. इन्हीं कुछ वजहों के चलते विकास और निवेश में गिरावट दर्ज की गई. सरकार के वादे के मुताबिक, हर साल एक करोड़ नई नौकरियों के चलते बेरोजगारी कम होना चाहिए थी, लेकिन हो इसका उल्टा रहा है. मोदी सरकार के कार्यकाल में बेरोजगारी दर में इजाफा हुआ है. यूपीए सरकार के दौरान बेरोजगारी दर जहां 4.9 फीसदी थी, वहीं मोदी सरकार में यह संख्या बढ़कर 5 फीसदी हो गई है.

youth

बीजेपी के साथ समस्या यह है कि नौकरियों के मोर्चे पर अपनी असफलता को स्वीकार करने के बजाय, वह पकौड़ों की दलीलों की आड़ में खुद को बचाने की कोशिश कर रही है. अमित शाह ने अपनी सरकार का बचाव करते हुए आरोप लगाया है कि, 55 सालों के शासन के दौरान कांग्रेस नौकरियां पैदा करने में विफल रही है. उनकी यह दलील 2014 के चुनाव में लोगों को रिझाने में भले ही कामयाब रही हो, लेकिन अब यह दलील बासी नजर आती है. अमित शाह की इस दलील में मोदी सरकार की नाकामी की बदबू आ रही है.

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साल 2014 में भारत आशा के उच्च शिखर पर था. लेकिन अब उस आशा की जगह संदेह, अविश्वास और गुस्सा लेता जा रहा है. देश की जनता की मनोदशा में आए इस बदलाव का पहला संकेत हाल ही में गुजरात में देखने को मिला, जहां बीजेपी बड़ी मुश्किल से विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाब हो पाई. बीजेपी से मतदाताओं के मोहभंग का दूसरा संकेत बीते हफ्ते राजस्थान में नजर आया, जहां तीन महत्वपूर्ण सीटों पर हुए उपचुनावों में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा. राजस्थान के उप चुनाव में बीजेपी को शहरी, अर्द्ध-शहरी और ग्रामीण इलाकों में 10 फीसदी से ज्यादा वोटों का नुकसान हुआ है. बीजेपी के लिए यह वेक अप कॉल है. यानी बीजेपी अगर अब भी नहीं जागी, तो उसके सिंहासन के नीचे से जमीन खिसकने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा.

अपने भविष्य को लेकर युवाओं की चिंताएं बढ़ रही हैं. जैसे ही नौकरियों के अवसर कम होते हैं, वैसे ही अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगती है. आधुनिक मशीनें लोगों का रोजगार छीन रही हैं. मानव श्रम और विशेषज्ञ लोगों की जगह स्वचालित यंत्र लेते जा रहे हैं. लिहाजा लोगों का भय बढ़ रहा है. उनके सामने पकौड़े बेचने के अलावा कोई और विकल्प नहीं छोड़ा जा रहा है. ऐसे में बीजेपी अगर लगातार यह तर्क देने का प्रयास करती रही कि सड़कों पर पकौड़े बेचने वालों की बढ़ती संख्या सरकार की नीतियों का संकेत है, तो समझ लीजिए कि पार्टी अपनी चुनावी किस्मत को बदलने का जोखिम उठा रही है.

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