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नजीब जंग को देने के लिए मोदी सरकार के पास क्या?

दिल्ली के उप-राज्यपाल पद से इस्तीफा देने वाले नजीब जंग का अब अगला कदम क्या होगा

Updated On: Dec 24, 2016 08:15 AM IST

Sanjay Singh

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नजीब जंग को देने के लिए मोदी सरकार के पास क्या?

दिल्ली के उप-राज्यपाल पद से इस्तीफा देने वाले नजीब जंग देश के दूसरे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के राज्यपालों से अलग हैं.

उप-राज्यपाल जैसे सम्मानित पद से अचरज भरा इस्तीफा दे देना पक्के तौर पर नजीब जंग को बड़ा बना देता है- उन्होंने अपनी व्यवहार कुशलता से केंद्र में दो अलग सरकारों के साथ काम किया.

दिल्ली, केंद्र शासित प्रदेश के हिसाब से बने कानूनों का पालन करते हुए चले, ये सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने दिल्ली के चुने हुए मुख्यमंत्री के साथ लड़ाई लड़ी. जब उन्हें लगा कि अब काफी हो गया है और ब्रेक लेना चाहिए तो भविष्य में अगली जिम्मेदारी संभालने से पहले खुद को तैयार करने के लिए उन्होंने अपना इस्तीफा सौंप दिया.

क्या केंद्र से इस्तीफा मंजूर होगा?

बड़ा सवाल बना हुआ है कि क्या केंद्र और मोदी सरकार उन्हें जाने देंगे? जंग के इस्तीफा भेजे 24 घंटे से ज्यादा हो चुके हैं लेकिन इसपर केंद्र की ओर से अब तक कुछ नहीं कहा गया है. ये थोड़ा अजीब है.

केंद्र से अगर नजीब जंग को रुकने के लिए कहा गया, तो ये पता नहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके डेप्युटी मनीष सिसोदिया इसपर कैसी प्रतिक्रिया देंगे.

दिल्ली की इस सबसे ऊंची कुर्सी के ख्वाब देखने वाले कई रिटायर्ड नौकरशाह निराश हो जाएंगे. फिलहाल इसे लेकर सिर्फ कयास ही लगाए जा सकते हैं.

नजीब जंग का प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) जाना लेकिन अपने इस्तीफे के कारणों पर एक शब्द भी नहीं बोलना कई तरह की अटकलों को जन्म देता है.

शांत, सुशील और गंभीर चाल-चलन वाले जंग के मजबूत इरादों ने उन्हें वैधानिकता के मुद्दे पर केजरीवाल और उनकी पूरी सरकार से टक्कर लेने की ताकत दी. उन्होंने ये काम जनता में बिना एक शब्द गलत कहे या फिर किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में अरविंद केजरीवाल के साथ बिना विवाद में पड़े हुए किया. दिल्ली की सत्ता के शीर्ष पर रहे जंग ऐसे ही व्यक्ति थे, जैसा मोदी सरकार चाहती थी.

मोदी सरकार के लिए 'हथियार' की तरह हैं

एनडीए के एक वरिष्ठ मंत्री के साथ हुई निजी मुलाकात में उनके कहे शब्दों में अगर कहें तो, ‘केंद्र की बीजेपी सरकार के लिए जंग किसी ‘हथियार’ की तरह हैं’. वह एक मुसलमान हैं, उनका चयन यूपीए की सरकार के दौरान हुआ और वह एक बेहतर प्रशासक हैं. उन्होंने अपनी भूमिका बेहतर ढंग से निभाई. और केजरीवाल के साथ लड़ाई लड़कर उसमें कुशलता से जीत हासिल की.

आम तौर पर दो सबसे बड़े संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के बीच के झगड़े में काफी कड़वाहट देखने को मिलती है. लेकिन नजीब जंग इस मामले में शालीन बने रहे और नपे-तुले शब्दों का प्रयोग किया.

जुलाई 2013 में यूपीए सरकार ने नजीब जंग को दिल्ली का उप-राज्यपाल बनाया था. नरेंद्र मोदी की सरकार के आदेश पर जब यूपीए के बनाए गवर्नर एक के बाद एक अपना इस्तीफा दे रहे थे, तब भी जंग अपने पद पर बने रहे. लगा जैसे उन्हें यूपीए ने कभी बनाया ही न था.

राज्यपाल और उप-राज्यपाल ज्यादातर तब सुर्खियों में आते हैं, जब नई सरकार उन्हें हटाती है या फिर वो संवैधानिक गरिमा से हटकर कुछ अलग करते हैं.

जो लोग गवर्नरों की नियुक्ति से जुड़ी खबर पर नजर रखते हैं, उनके लिए ये बड़ी खबर होती है लेकिन आम जनता को इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता.

जंग का मामला अलग है. उनका कार्यकाल, चयन, पद पर बने रहना और उनके इस्तीफे की चर्चा लंबे समय तक होती रहेगी. भारत की राजनीति पर नजर रखने वाले इसे 'केस स्टडी' के तौर पर लेंगे.

शालीनता दिखाकर एक-दूसरे से विदा 

नजीब जंग ने इस्तीफा क्यों दिया... दिल्ली की जनता, मीडिया और राजनीति से जुड़े लोगों के मन में इसको लेकर सवाल है. क्या उन्हें राजभवन का ऐशो आराम पसंद नहीं आया. और दिल्ली सरकार का 'बॉस' (हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार सीएम अरविंद केजरीवाल दिल्ली के बॉस नहीं हैं) बनकर शासन चलाना अच्छा नहीं लगा. लोगों के लिए ये समझ पाना मुश्किल है कि जंग ने केंद्र के नहीं मांगने के बावजूद भी अपनी इच्छा से इस्तीफा दिया है.

Najeeb Jung with Arvind Kejriwal

जंग के इस्तीफे से एक और अच्छी बात जुड़ी रहेगी जो उन्होंने और केजरीवाल ने आपस में शिष्टता दिखाकर की. दोनों लोग अपने-अपने अधिकार क्षेत्र को बचाने की खातिर एक-दूसरे से लड़े. लेकिन आखिर में शालीनता दिखाकर एक-दूसरे से विदा ली. जंग का केजरीवाल को अपने यहां नाश्ते पर बुलाना और केजरीवाल का उनके घर से हंसते हुए बाहर निकलना यही दिखाता है.

उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी नजीब जंग से मिले और पिछले दो साल के अच्छे समय को याद किया. इस दौरान उनके बीच पिछले दो साल से चली आ रही कड़वाहट की झलक कहीं नहीं दिखी.

मोदी सरकार क्या 'ऑफर' करेगी?

नजीब जंग ऊंचे खानदान से आते हैं. उन्होंने देश और विदेश में सबसे बेहतर शिक्षण संस्थानों से पढ़ाई-लिखाई की है. वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी बने और उसे बीच में छोड़कर कुछ अलग और बेहतर करने की खातिर घरेलू और बहुमुखी संस्थानों से जुड़ गए. बाद में शिक्षा के क्षेत्र में 2009 से 2013 तक जामिया मिलिया इस्लामिया के वाइस चांसलर रहे. जहां से फिर उन्हें दिल्ली का उप-राज्यपाल बनाया गया.

अगर नजीब जंग छोड़कर जाते हैं, तो सम्मान के साथ विदा होंगे. वह केंद्र की वर्तमान सरकार और ताकतवर लोगों से दोस्ती बनाने में कामयाब रहे हैं. उनके अवकाश या वह क्या काम करते हैं, कैसे अपनी छुट्टियां बिताते हैं, इसे लेकर अटकलें लगाई जाएंगी. लेकिन उतनी नहीं जितनी इस बात पर कि मोदी सरकार उन्हें आने वाले समय में क्या ऑफर करेगी?

अगर नजीब जंग अपने पद पर बने रहते हैं तो हर हाल में चीजें पहले से अलग होंगी. कुछ भी हो, जंग ने अपने पूर्वजों की तरह इतिहास में खुद के लिए जगह बना ली है.

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