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नगालैंड चुनाव 2018: चुनाव बहिष्कार और नामांकन के बीच फंसी बीजेपी

केंद्र सरकार की एनएससीएन (आईएम) से बातचीत की असफलता को देखते हुए चुनाव बहिष्कार की घोषणा की गई है. अगर बीजेपी इसका पालन करती है तो इससे सिर्फ विपक्ष के आरोप ही सही साबित होंगे

Updated On: Feb 06, 2018 10:23 AM IST

Kangkan Acharyya

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नगालैंड चुनाव 2018: चुनाव बहिष्कार और नामांकन के बीच फंसी बीजेपी

नगालैंड में 27 फरवरी को प्रस्तावित विधानसभा चुनाव का एनएससीएन (आईएम) और नगा सिविल सोसाइटी कड़ा विरोध कर रहे हैं. इस स्थिति में नगालैंड में राजनीतिक दल पहले बीजेपी की तरफ से नामांकन दाखिल होने का इंतजार कर रहे हैं.

सूत्रों का कहना है कि अधिकतर राजनीतिक दल चुनाव के लिए तैयार हैं लेकिन उन्होंने अब तक नामांकन दाखिल नहीं किया है. अगर वो ऐसा करते हैं तो इसे एनएससीएन (आईएम) और नगा सिविल सोसायटी के चुनाव बहिष्कार का उल्लंघन माना जाएगा. इन दलों को उम्मीद है कि बीजेपी अपने उम्मीदवारों से नामांकन पत्र दाखिल कराकर बहिष्कार का विरोध करेगी. नामांकन की आखिरी तारीख सात फरवरी है.

फंस गई है बीजेपी

नवगठित एनडीपीपी के एक नेता ने फ़र्स्टपोस्ट से कहा, '6 फरवरी को बीजेपी उम्मीदवारों के नामांकन दाखिल करने के बाद अधिकतर दलों के उम्मीदवार पर्चा दाखिल करेंगे. राजनीतिक दलों के लिए चुनाव बहिष्कार का विरोध चतुराई भरा निर्णय नहीं होगा. कई राजनीतिक दलों को उम्मीद है कि नामांकन दाखिल करने का पहला कदम बीजेपी उठाएगी और इस तरह वह चुनाव बहिष्कार के खिलाफ जाने का राजनीतिक जोखिम भी लेगी.'

एनएससीएन (आईएम) और नगा सिविल सोसायटी समूहों का नगालैंड की राजनीति में भारी दखल है, इसलिए उनको नाराज करना राजनीतिक रूप से गलत होगा.

चुनाव बहिष्कार का आह्वान इतिहास को दोहराने जैसा है. 1998 के विधानसभा चुनाव में भी एनएससीएन (आईएम) ने चुनाव बहिष्कार की घोषणा की थी. उस चुनाव मे अधिकतर दलों ने उम्मीदवार नहीं उतारे थे. तब अधिकतर सीटों पर कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो गए थे.

नेशनल डेमोक्रेटिक पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष चिंगवांग कोन्याक का कहना है, 'हम किसी भी राजनीतिक दल को इस बार वॉक ओवर नहीं देना चाहते. इसलिए अगर दूसरी पार्टियां उम्मीदवार उतारती है तो हम भी ऐसा करेंगे.'

नगा शांति प्रक्रिया से अलग हो चुकी है बीजेपी

गौरतलब है कि बीजेपी ने खुद को उस समझौते से भी अलग कर लिया, जिसमें सभी राजनीतिक दलों में यह सहमति बनी थी कि नगा शांति प्रक्रिया का हल निकलने से पहले अगर चुनाव हुए तो कोई दल उम्मीदवार नहीं उतारेगा.

विधानसभा चुनाव की घोषणा से ही नगालैंड में मुश्किल दौर से गुजर रहा है. एनएससीएन (आईएम) समेत कई समूहों ने चुनाव से पहले नगा शांति वार्ता की पहेली सुलझाने की मांग की थी. इनकी मांग है कि चुनाव से पहले इस मुद्दे का हल निकाला जाए. इन समूहों ने राजनीतिक दलों को चुनाव में उम्मीदवार नहीं उतारने वाले समझौते पर दस्तखत करने के लिए बाध्य भी किया. समझौते के मुताबिक नगा शांति वार्ता का हल खोजे जाने तक कोई भी राजनीतिक दल चुनाव में हिस्सा नहीं लेगा.

नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड- इसाक मुइवा या एनएससीएन-आईएम और छह अन्य नगा राष्ट्रीय राजनीतिक समूहों की कार्यकारिणी समिति ने एक साझा घोषणापत्र जारी किया था. घोषणा में कहा गया है कि वो नगा आदिवासी निकायों और नागरिक समाज की इस मांग का समर्थन करते हैं कि चुनाव प्रक्रिया से पहले शांति वार्ता का मुद्दा हल किया जाए. इस मांग पर केंद्र सरकार ने कोई वादा नहीं किया है.

साझा घोषणापत्र में यह भी कहा गया कि, 'जब समूचे नगा लोगों ने चुनाव में हिस्सा नहीं लेने का सामूहिक निर्णय किया है, तो हम निहित स्वार्थी तत्वों और दूसरे लोगों को चेतावनी देते हैं कि वो नामांकन दाखिल करके और चुनाव प्रक्रिया में शामिल होकर बातचीत की ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को बर्बाद नहीं करें.'

बहिष्कार का समर्थन नहीं कर सकती पार्टी

हालांकि बीजेपी के एक नेता ने इस घोषणापत्र पर दस्तख्त किए थे, लेकिन जल्द ही पार्टी ने कहा कि जिस नेता ने दस्तखत किए उसने शीर्ष नेताओं से इसकी अनुमति नहीं ली थी. बाद में बीजेपी ने इससे पल्ला झाड़ लिया.

विसासोली लहोनुगु ने कहा, 'हमने किसी पार्टी नेता को समझौते पर दस्तख्त के लिए अधिकृत नहीं किया था. जिस व्यक्ति ने इस पर दस्तखत किए वो ऐसा करने के लिए अधिकृत नहीं था.'

बीजेपी ने समझौते पर दस्तख्त करने वाले नेता को निलंबित कर दिया है. बीजेपी के लिए दिक्कत यह है कि वो चुनाव बहिष्कार के आह्वान का समर्थन नहीं कर सकती. अगर वो ऐसा करती है तो इससे विपक्ष को केंद्र सरकार पर हमला करने का मौका मिल जाएगा.

केंद्र सरकार पिछले ढाई साल से एनएससीएन (आईएम) से वार्ता कर रही है. केंद्र सरकार की कथित विफलता को देखते हुए चुनाव बहिष्कार की घोषणा की गई है. अगर बीजेपी किसी डील के लिए चुनाव बहिष्कार के आह्वान का पालन करती है तो इससे सिर्फ विपक्ष के आरोप ही सही साबित होंगे.

तीन फरवरी को बीजेपी ने उम्मीदवारों की सूची जारी की. इसके बाद सभी पार्टियां चुनाव लड़ने की तैयारी करने लगी. बीजेपी ने एनडीपीपी के साथ सीट बंटवारे का समझौता किया है. इसके तहत बीजेपी महज 20 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और बाकी 40 सीटों पर उसकी सहयोगी दल उम्मीदवार उतारेगी. रोचक यह है कि बीजेपी को छोड़ किसी भी दल ने अब तक उम्मीदवारों का एलान किया है.

दूसरी पार्टियों को बीजेपी का इंतजार

सत्ताधारी एनपीएफ के महासचिव केजी केन्ये ने फ़र्स्टपोस्ट से कहा कि संगठनों के विरोध के चलते पार्टी मौजूदा हालात का अध्ययन कर रही थी, लेकिन अब वो चुनाव का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है. उन्होंने कहा, 'हम नामांकन दाखिल करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. मंगलवार तक हम उम्मीदवारों के नामों पर निर्णय कर लेंगे और इसके तुरंत बाद नामांकन दाखिल कर दिया जाएगा.'

लेकिन पार्टी सूत्रों का कहना है कि अधिकतर दलों ने उम्मीदवारों पर फैसला कर लिया है लेकिन सिविल सोसायटी समूहों और एनएससीएन (आईएम) की नाराजगी से बचने के लिए इसका ऐलान नहीं किया है.

एक सूत्र के मुताबिक, 'अगर बीजेपी के उम्मीदवार सबसे पहले नामांकन दाखिल करते हैं तो चुनाव बहिष्कार के विरोध का ठीकरा पूरी तरह बीजेपी पर फूटेगा. इसके बाद सभी पार्टियां भी नामांकन दाखिल करेंगी और ये दलील देंगी कि अगर वो उम्मीदवार नहीं उतारतीं तो बीजेपी को वॉक ओवर मिल जाता.'

दूसरी तरफ, नगालैंड कांग्रेस के अध्यक्ष के थैरी का कहना है कि उनकी पार्टी आखिरी दिन नामांकन दाखिल करेगी. उन्होंने कहा, 'पहले बीजेपी और एनपीएफ के उम्मीदवारों को नामांकन करने दीजिए. हम इसके बाद नामांकन करेंगे.'

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