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पत्थलगड़ीः ग्राम स्वराज की मांग पर क्यों हांफ रही है झारखंड सरकार

आदिवासियों का उनका कहना है कि यहां कोई भी सरकारी अधिकारी बिना ग्रामसभा की अनुमति के न तो घुस सकता है न ही विकास का काम करा सकता है

Updated On: Mar 22, 2018 06:05 PM IST

FP Staff

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पत्थलगड़ीः ग्राम स्वराज की मांग पर क्यों हांफ रही है झारखंड सरकार
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झारखंड की राजधानी रांची से सटा खूंटी जिला आज देशभर में चर्चा का केंद्र बना हुआ है. मामला ये है कि राज्य सरकार के मुताबिक वहां ग्रामीण राज्य और केंद्र सरकार की सत्ता को चुनौती दे रहे हैं. कह रहे हैं कि न लोकसभा न विधानसभा, सबसे ऊपर ग्रामसभा. वह गांव के मुहाने (प्रवेशद्वार) पर पत्थलगड़ी यानी सीमांकन कर रहे हैं. सरकारी स्कूलों का बहिष्कार कर रहे हैं. सरकारी योजनाओं को छोड़ने की धमकी दे रहे हैं.

उनका कहना है कि यहां कोई भी सरकारी अधिकारी बिना ग्रामसभा की अनुमति के न तो घुस सकता है न ही विकास का काम करा सकता है. ग्रामसभा की घोषणा के मुताबिक सरकारी स्कूलों का बहिष्कार कर दिया गया है. सभा की ओर से चुने गए शिक्षक पेड़े के नीचे बच्चों को पढ़ा रहे हैं.

इतनी ही बातों पर ग्रामीणों का पक्ष है ग्रामसभा को मजबूत करने का या सबसे अधिक अधिकार देने का प्रावधान तो संविधान में है. यानी अनुसूची के मुताबिक यह तो पहले ही मिल जाना चाहिए था. पेसा एक्ट के तहत इन अधिकारों के लिए तो ग्राम पंचायत को लड़ने की जरूरत ही नहीं थी, इसके नाम पर ही झारखंड का गठन हुआ, लेकिन अभी तक मिला कुछ नहीं. आदिवासियों के भगवान और आजादी की लड़ाई के प्रमुख अगुवाओं में एक बिरसा मुंडा के इस इलाके में विकास कोसों दूर है.

थोड़ा पीछे चलते हैं. बीते साल अगस्त माह में खूंटी जिले में पत्थलगड़ी की सूचना पाकर कुछ पुलिसकर्मी वहां पहुंचे. वहां ग्रामीणों ने बैरिकेडिंग कर रखी थी. थानेदार जब कुछ पुलिसबल के साथ वहां पहुंचे तो उन्हें बंधक बना लिया. सूचना पाकर जिले के एसपी अश्विनी कुमार, एएसपी, डीएसपी, सीआरपीएफ कमांडेंट सहित लगभग 300 पुलिसबल उन्हें छुड़ाने पहुंचे. लेकिन उलटे ये वहां बंधक बन गए. लगभग रातभर उन्हें बिठाए रखा, सुबह जब जिलाधिकारी वहां पहुंचे तब लंबी बातचीत के बाद गांववालों ने उन्हें छोड़ा. इसके बाद यह मामला तूल पकड़ता गया.

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क्या है पत्थलगड़ी

आदिवासी मामलों के जानकार अश्विनी पंकज कहते हैं यह मुंडा आदिवासियों की सदियों पुरानी परंपरा है. यह कई तरीके से होती है, नया गांव बसाते हैं तब करते हैं, परिवार का मुखिया मरते हैं तब करते हैं. सेंस यह होता है कि उनकी यादों को सुरक्षित रखा जाए. अभी जो हो रहा है वह नए किस्म का पत्थलगड़ी है. यह लोकतांत्रिक समाज में अपने अधिकारों को लागू करने का घोषणा करने का तरीका है.

रांची के स्वतंत्र पत्रकार नीरज सिन्हा का कहना है कि आदिवासी समुदाय और गांवों में विधि-विधान/संस्कार के साथ पत्थलगड़ी (बड़ा शिलालेख गाड़ने) की परंपरा पुरानी है. इनमें मौजा, सीमाना, ग्रामसभा और अधिकार की जानकारी रहती है. वंशावली, पुरखे तथा मरनी (मृत व्यक्ति) की याद संजोए रखने के लिए भी पत्थलगड़ी की जाती है. कई जगहों पर अंग्रेजों–दुश्मनों के खिलाफ लड़कर शहीद होने वाले वीर सूपतों के सम्मान में भी पत्थलगड़ी की जाती रही है.

इस आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं का मानना है कि आदिवासियों का मानना है कि वोटर कार्ड और आधार कार्ड आदिवासी विरोधी दस्तावेज हैं तथा आदिवासी लोग भारत देश के मालिक हैं, आम आदमी या नागरिक नहीं. संविधान के अनुच्छेद 13 (3) क के तहत रूढ़ि और प्रथा ही विधि का बल यानी संविधान की शक्ति है.

क्या है कानूनी पक्ष

शिड्यूल फाइव एरिया को अंग्रेजों ने घोषित कर दिया था. गवर्मेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 ये अधिसूचित क्षेत्र मतलब एक ऐसा इलाका जहां आदिवासियों की परंपरा, रहनसहन, खान पान, को संरक्षण दिया जाए. इसे अंग्रेज सरकार ने पारित किया था. गवर्नर का एजेंट था विल्किंसन ने कानून बनाया था कि इन इलाकों में मानकी मुंडा ही टैक्स वसूलेंगे, नियम बनाएंगे, सरकार चलाएंगे. आदिवासी फिर से इसे लागू करने की मांग कर रहे हैं. जबकि सरकार का कहना है कि भारत का संविधान बनने के साथ ही अंग्रेजों के बनाए कानून स्वतः निरस्त हो चुके हैं.

आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के अध्यक्ष तथा आदिवासी मामलों के जानकार प्रेमचंद मुर्मू कहते हैं कि पत्थलगड़ी झारखंडी परंपरा है, लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह से इसकी व्याख्या की गई है, वह गलत है. इसके तहत ब्रिटिश काल के जीओआइ एक्ट 1935 (गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट) की वकालत की जा रही है जिसे आजादी के बाद देश के संविधान में निरस्त किया गया है. उन्होंने कहा कि अगर पांचवी अनुसूची के तहत पेसा कानून (पंचायत राज एक्सटेंशन टू शिड्यूल एरिया एक्ट, 1996) को लागू करने में सरकार की मंशा ठीक होती तो शायद ये परिस्थितियां नहीं बनती और नक्सली समस्याओं से भी नहीं जूझना पड़ता.

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क्यों परेशान है सरकार

झारखंड सरकार इसे देशविरोधी ताकतों की करतूत बता रही है. सीएम रघुवर दास का कहना है कि भोले-भाले आदिवासियों को कुछ देश विरोधी, समाज विरोधी लोग बरगला रहे हैं. उन्हें विकास की मुख्यधारा से अलग करना चाहते हैं. इन ताकतों के साथ सरकार सख्ती से निपटेगी. उन्होंने यह भी कहा कि पत्थलगड़ी झारखंड की परंपरा है, लेकिन विकास के काम रोकने तथा भोलेभाले आदिवासियों को बरगलाने के लिए नहीं. वे कहते हैं कि इन्हीं शक्तियों ने भगवान बिरसा को अंग्रेजों के हाथों पकड़वाया था.

हालिया अपडेट

मामले में हालिया अपडेट ये है कि पत्थलगड़ी अभियान का नेतृत्व करनेवालों में एक विजय कुजूर को झारखंड पुलिस ने बीते मार्च को दिल्ली के महिपालपुर इलाके से गिरफ्तार किया था. इसके अलावा कृष्णा हांसदा को झारखंड के ही सरायकेला इलाके से गिरफ्तार किया जा चुका है.

दूसरा एंगल यह निकल कर आ रहा है कि इस अभियान का केंद्र गुजरात है. वहां के कटासवाण नामक इलाके से इसका संचालन किया जा रहा है. यह इलाका भील समुदाय का माना जाता है. जो भारत सरकार को नहीं मानती है. यहां के दिवंगत कुंवर केसरी सिंह का परिवार इससे संबंधित दिशा-निर्देश जारी करता है. पत्थलगड़ी कार्यक्रम को संबोधित करनेवाले युसूफ पूर्ती भी इस बात को स्वीकारते हैं.

साफ दिख रहा है कि मामला लगभग सरकार के नियंत्रण से बाहर है. ऐसा तब हो रहा है जब खूंटी के सांसद और विधायक दोनों सत्तारूढ़ बीजेपी से हैं. रघुवर दास मामले को पुलिस और ब्यूरोक्रैट के स्तर पर निपटना चाह रहे हैं. यही वजह है कि अब तक सांसद करिया मुंडा से पूरे मसले पर सलाह तक नहीं ली गई है. वहीं विधायक नीलकंठ सिंह मुंडा के लिए न गिललते बन रही है न उगलते बन रही वाली स्थिति बनी हुई है. साल 2019 के चुनाव में यह मुद्दा पूरे झारखंड में छाने जा रहा है.

(फोटो साभारः न्यूज 18\ अजय शर्मा, पत्रकार खूंटी) 

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