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भारतीय राजनीति में मुसलमान: सेक्युलर या कट्टर, हर पार्टी ने छला है

क्या भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी की तरह ही कथित सेक्युलर पार्टियां जैसे कांग्रेस भी मुसलमानों को हाशिए पर धकेल रही हैं?

Tufail Ahmad Tufail Ahmad Updated On: Mar 22, 2018 05:16 PM IST

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भारतीय राजनीति में मुसलमान: सेक्युलर या कट्टर, हर पार्टी ने छला है

भारतीय राजनीति में मुसलमानों की दशा और दिशा पर हाल ही में दो लेख लिखे गए. पहला सामाजिक क्षेत्र के कार्यों में लगे हर्ष मंदर ने लिखा और दूसरा उसका जवाब प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने दिया. हर्ष मंदर को इस पर लिखने का आइडिया गुजरात चुनावों के दौरान मिला जिसमें उन्होंने महसूस किया कि कांग्रेस अपने चुनाव प्रचार में मुसलमानों की अनदेखी कर रही है. मंदर ने कांग्रेस और पार्टी के उस दलित नेता की आलोचना की जिसने मुसलमानों को अपनी रैलियों में भारी संख्या में शामिल होने को तो कहा लेकिन ताकीद की वो अपनी टोपी और बुर्के के बिना आएं. मंदर की इस बात की आलोचना गुहा ने की और कहा कि मंदर बुर्के के पीछे छिपी धार्मिक कट्टरता को नहीं पकड़ सके.

इन दोनों लेखों के केंद्र में बहस का मुख्य मुद्दा ये है कि क्या भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी की तरह ही कथित सेक्युलर पार्टियां जैसे कांग्रेस भी मुसलमानों को हाशिए पर धकेल रही हैं? लेख में इस बात भी चर्चा हुई है कि क्या लंदन के मेयर सादिक खान जैसे और नेता मुसलमानों के बीच से सामने आ सकते हैं या फिर भारतीय राजनीति सादिक खान या बराक ओबामा जैसे शानदार राजनीतिज्ञों को सामने लाने में सहायक साबित हो सकती है अथवा नहीं?

साथ लड़े, फिर अलग कैसे हुए?

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ हिंदुओं और मुसलमानों ने खूब मोर्चा लिया था, दोनों ने एक साथ मिलकर अग्रेजों के पांव भारत से उखाड़ने की पुरजोर कोशिश की. इस युद्ध के बाद वैसे तार्किक रुप से होना ये चाहिए था कि देश में हिंदू और मुसलमान मिलकर एक साथ शांति से रहें लेकिन देश की मुस्लिम लीडरशिप ने अपने लिए अलग राष्ट्र पाकिस्तान का राग अलापना शुरु कर दिया. 1947 में देश का धार्मिक आधार पर बंटवारा होने और हिंदुस्तान बनने के बाद हिंदू नेतृत्व ने भी भारत में बचे मुसलमानों को अल्पसंख्यक का दर्जा दे दिया. उस समय राजनीतिक दलों ने भी उनकी मदद के लिए अपनी पार्टियों में अल्पसंख्यक विंग का गठन कर एक तरीके से उन्हें बराबर के नागरिकों से अलग करके दूसरे खांचे में बांध दिया.

मुसलमानों को अलग मानने में कोटा की राजनीति और दंगों के अलावा मुस्लिम धर्म गुरुओं को भी बड़ा योगदान रहा. इधर हिंदुओं ने भी मुसलमानों को अलग-थलग करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी चाहे वो सेक्युलर हिंदू हों या कट्टर हिंदू, दोनों ने मुख्यधारा से उन्हें अलग रखने की कोशिश की. पाकिस्तान के निर्माण के बाद जब अधिकतर मध्यम वर्ग के मुसलमान पाकिस्तान चले गए तो मुस्लिम धर्मगुरुओं ने नेतृत्वकर्ताओं के रुप में कमान संभाल ली. जवाहरलाल नेहरु से लेकर सोनिया गांधी और अरविंद केजरीवाल से लेकर अखिलेश यादव सभी ने मुल्ला मौलवियों को प्रश्रय देकर उनका मुसलमानों पर प्रभाव बढ़ाने में सहायता ही की.

तेल क्रांति से बदला मुस्लिम

1970 के दशक और उसके बाद अरब में आए तेल क्रांति ने मुसलमानों पर दो प्रमुख प्रभाव डाला. यहां के मुस्लिम धर्मगुरुओं ने अरब से चंदा इकट्ठा करके देश में कट्टरपंथी वहाबी इस्लाम को बढ़ावा देना शुरु किया. और दूसरा जब मिडिल ईस्ट देशों से मुस्लिम कामगार वापस लौटे तो उन्होंने भारतीय इस्लाम को परिपूर्ण मानने से इंकार कर दिया. नाजिया ईरम ने इस संबध में अपनी किताब ‘मदरिंग ए मुस्लिम’ में लिखा भी है. इस किताब में ईरम एक भारतीय मुसलमान के द्वारा कही गयी बात को उद्धृत करते हुए कहती है कि सउदी अरब से लौटा एक मुसलमान यहां के मुसलमानों से इस्लाम के बारे में इस तरह से बात करता है जैसे वो किसी गैर मुस्लिम से बात कर रहा हो. इस प्रक्रिया ने देश में बुर्के के प्रचलन को आगे बढ़ाया जो कि कुछ दशक पहले देश में शायद ही कहीं दिखता रहा हो.

रामचंद गुहा बुर्का के बारे में लिखते हैं कि बुर्का भले ही हथियार नहीं हो लेकिन इसका गहरा सांकेतिक मतलब है और ये त्रिशूल के जैसा ही है. गुहा के मुताबिक बुर्का प्रतिक्रियात्मक और रुढ़िवादी आस्था का प्रतीक है. कभी-कभी कपड़ा कपड़ा न होकर एक विचार में तब्दील हो जाता है. बुर्का के साथ चयन नहीं जुड़ा होता है. ये केवल तभी चयन बनता है जब इसे पहनने वाले के पास इसे न पहनने का भी विकल्प होता है. इसे ऐसे समझ सकते हैं, मान लीजिए उदाहरण के तौर पर अगर शोभा डे बुर्का पहनना चाहें तो ये उनकी इच्छा पर निर्भर करेगा लेकिन बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाओं के लिए बुर्का पहनना जरुरी होता है. बुर्का उनके दिमाग को वश में करने वाला साबित होता है. गुहा सही कहते हैं कि उदार लेखकों को मुस्लिम समाज की रुढ़िवादिता पर प्रश्न उठाना चाहिए.

A member of Khawateen Markaz, a Kashmiri women's separatist group, attends a protest against recent riots, in Srinagar

राजनीति से दूर हो गए हैं मुस्लिम

जहां गुहा उदार लेखकों के मुस्लिम समाज में फैली रुढ़िवादिता को चुनौती देने में नाकामयाब रहने की बात उठाते हैं, वहीं मंदर का अपना विश्लेषण भी सटीक है. मदंर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न्यू इंडिया में हिंदू-मुसलमान मुद्दे के एक पक्ष को संबोधित कर रहे हैं. मंदर सही कहते हैं कि आज के दिन में मुसलमानों की स्थिति परित्यक्त के समान बनी हुई है और वो आज खुद को राजनीतिक रुप से अस्पृश्य महसूस करते हैं. मुसलमानों को समाज की मुख्यधारा से अलग करने की कोशिश हिंदुत्व की राजनीति को बढ़ावा देने वाली बीजेपी और आरएसएस से जुड़े संगठन करने में लगे हैं.

इस लेख के लेखक ने हाल ही में सोशल मीडिया में वायरल दो वीडियो को देखा. पहले वीडियो में था कि हिंदू युवाओं का एक समूह एक बूढ़े मुसलमान को रोकता है और उन्हें जबरदस्ती जय श्री राम का नारा लगाने को कहता है. दूसरे वीडियो मे हिंदू युवाओं का एक समूह एक बस को रोकता है और उसमें सवार एक उम्रदराज मुसलमान से पूछता है कि बस के पीछे पाकिस्तानी झंडा क्यों लगा हुआ है. जब वो वृद्ध मुसलमान इससे अनभिज्ञता जाहिर करता है तो उसे और उसकी मां को जमकर गालियां दी जाती हैं. युवकों का समूह उस मुस्लिम को पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगाने को कहा जाता है. यहां ये बात महत्वपूर्ण है कि इन दोनों जगहों पर मुसलमानों की पहचान उनकी टोपी और दाढ़ी से हुई. यहीं पर गुहा गलत हैं और मंदर सही.

गुहा इस तथ्य को नजरंदाज करते हैं कि कपड़ों को भी किसी संप्रदाय के खिलाफ नफरत का आधार बनाया जा सकता है. ये नफरत एक विशेष तरह की राजनीतिक संस्कृति में पैदा होती हैं और इसे एक विशेष तरह के राजनीतिक दल, धार्मिक संगठन और उसके नेताओं का संरक्षण भी मिलता है. मुस्लिम महिलाओं के दिमाग को वश में करने के लिए बुर्के की निश्चित रुप से आलोचना होनी चाहिए लेकिन टोपी और दाढ़ी तो भारतीय मुसलमानों की धर्मनिष्ठता की परंपरागत पहचान रही हैं. वैसे भी भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के तहत धर्म के आधार पर सभी को अपने तरह के कपड़े पहनने का अधिकार है.

मंदर का ये दावा कि मुसलमानों के खिलाफ नफरत अब सामान्य बात है, बिल्कुल सही प्रतीत होता है यहां तक कि मुस्लिम अभिभावक अपने बच्चों को सलाह देते हैं कि ट्रेन में सफर करने के दौरान वो अभिवादन के लिए ‘अस्सलाम वालेकुम’ का इस्तेमाल न करें. गौरक्षकों ने हाल ही में ट्रेन में कपड़ों के आधार पर पहचाने गए मुस्लिम युवाओं पर हमला किया, कई जगह पर मुसलमान होने की वजह से मुस्लिमों पर हमले किए गए. इस साल की परीक्षा में सीबीएसई ने परीक्षार्थियों को उत्तर पुस्तिका पर अपने नाम लिखने का निर्देश दिया है इससे मुसलमान छात्रों में संशय की स्थिति बनी हुई है कि कहीं उनके नाम पर अंक न कट जाएं.

बीजेपी उदाहरण है

बीजेपी हिंदुत्व के नाम पर भारतीयों को हिंदू और मुसलमान के रुप में बांटने पर लगी हुई है. ठीक उसी तरह से जिस तरह से कभी सेक्युलर पार्टियों ने जातियों के नाम पर भारतीयों का बंटवारा किया. बीजेपी का कहना है कि वो सभी भारतीयों के साथ एक जैसा व्यवहार करती है, लेकिन वास्तविक रुप से ऐसा है नहीं, बीजेपी के खाने के दांत और दिखाने के दांत और हैं. आजादी के बाद से भारतीय जनता पार्टी पहली ऐसी सत्तारुढ़ पार्टी बनी है जिसके लोकसभा में एक भी मुस्लिम सांसद नहीं है. आकार पटेल ने इस मामले पर ध्यान आकृष्ट कराते हुए कहा भी है कि बीजेपी के पास गुजरात, यूपी, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और झारखंड में भी कोई मुस्लिम विधायक जीत कर नहीं आया है.

Protest against lynching of Muslims

चलिए इसको गुजरात मॉडल की पॉलिटिक्स मान लेते हैं, जहां राष्ट्रभक्ति केवल जय श्री राम और भारत माता की जय के नारों से नापी जाती है. आज ये नारे मुसलमानों को जरूरत के हिसाब से डराने में इस्तेमाल किए जा रहे हैं. एंटी मुस्लिम राजनीति को भुनाने के लिए जगह-जगह तिरंगा यात्रा निकाली जा रही है. मंदर और गुहा दोनों के पास अपनी सटीक दलीलें हैं. जहां मंदर वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में मुसलमानों का भूमिका पर अपनी राय रख रहे हैं वहीं गुहा इस निष्कर्ष पर पहुंचते है कि विकृत उदार राजनीति ने मुसलमानों का बेड़ागर्क किया है. चाहे शाहबानो का मामला हो या इमाम बुखारी और तौकीर रजा जैसे धर्मगुरुओं को प्रश्रय देने का मामला इन सबके तुष्टीकरण से देश में हिंदूत्व को मजबूती मिलती गई है.

गुहा तीन अच्छे मुस्लिम नेताओं के उदाहरण भी पेश करते हैं. इनके नाम हैं- शेख अब्दुल्ला, हमीद दलवई और आरिफ मोहम्मद खान. ये तीनों नेता जमीन से जुड़े रहे हैं. इस लेख के लेखक कोई इतिहासकार नहीं हैं इसके बावजूद वो समझते हैं कि इन तीनों में से केवल हामिद दलवई ही एक मात्र ऐसे नेता हैं जो कि वास्तविक विचारक हैं. सर सैय्यद अहमद खान जिन्होंने अपने जमाने में मुसलमानों के लिए आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा की वकालत की थी जिससे कि पिछड़े मुसलमानों को आगे आने का मौका मिल सके, जबकि दलवई मुसलमानों के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था के उस मुद्दे की पहचान कर रहे हैं जिसमें मुसलमानों को भी समान नागरिक समझा जाता है.

उच्च शिक्षा और समान नागरिक की भावना की जरूरत

मुसलमानों के लिए आज के समय में केवल दो बातें जरूरी हैं, पहली सर सैयद अहमद की बात जो कि मुसलमानों की बेहतरी के लिए शिक्षा पर जोर देने की वकालत करते रहे और दूसरी दलवई की बात जो कि मुसलमानों को समान नागरिक समझने पर गौर करने को कह रहे हैं. उदार लेखकों ये बात समझनी चाहिए कि हमारा संविधान 6-14 साल तक सभी बच्चों को मुफ्त अनिवार्य शिक्षा एक जायज विद्यालय से ग्रहण करने का अधिकार देता है न कि मदरसा, गुरुकुल और हिंदू स्कूलों से. सरकार को चाहिए कि मदरसे और गुरुकुल को वो विद्यालय मानने से इंकार कर दे. इसके अलावा मुफ्त अनिवार्य शिक्षा की उम्र को 14 साल से बढ़ाकर 18 साल कर देनी चाहिए. अभी मदरसों ने बच्चों को स्कूल जाने के समय में पढ़ाने की राज्य सरकार की जिम्मेदारी खुद अपने कंधों पर ले रखी है.

जहां तक 6 साल से कम उम्र के बच्चों का सवाल है संविधान का आर्टिकल 45 कहता है कि राज्य सरकार को प्रयास करना चाहिए कि वो कम उम्र के बच्चों का ख्याल रखे और 6 साल पूरा होने तक उसकी शिक्षा का प्रबंध करे. हालांकि उदार सिद्धांतों के मुताबिक बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी सरकार की नहीं होनी चाहिए लेकिन वास्तविकता ये है कि आज भी देश में इतनी गरीबी है कि कई लोगों के पास पेट भरने के लिए खाना नहीं है ऐसे में उनसे अपने बच्चों की शिक्षा पर खर्च की बात बेमानी है. ये जरुरी है कि संविधान में की गई व्यवस्था को सही तरीके से लागू किया जा सके और बच्चों को कम उम्र से ही सही तरह के स्कूलों में दाखिला दिलाया जाए, जिससे कि वो उन धार्मिक स्कूलों में पढ़ने को विवश न हो सकें जहां उनके दिमाग को बचपन से ही प्रदूषित करने का काम किया जाता है.

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए ये सोचना गलत होगा कि मुस्लिम समाज या भारतीय शासन व्यवस्था में सादिक खान या बराक ओबामा जैसे नेताओं का उदय होगा. अमेरिकन और ब्रिटिश राजनीतिक व्यवस्था भारत से बेहतर है क्योंकि वहां पर शिक्षा का स्तर ऊंचा है ऐसे में वहां पर ऐसे नेताओं के उभरने की संभावना ज्यादा है. पहचान की राजनीति का मतलब प्रजातंत्र से अलग हो जाना नहीं है लेकिन मंदर को अपने पहचान की राजनीति पर जोर देने से थोड़ा अलग हटकर गुहा की इस बात का समर्थन करना चाहिए कि उदारवादियों को हिंदू और मुसलमान दोनों कट्टरपंथियों की आलोचना और विरोध करने का साहस होना चाहिए. वैसे मंदर और गुहा दोनों अपनी अपनी जगह आलोचनाओं में सही हैं और एक दूसरे के पूरक हैं.

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