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किसान आंदोलन: कर्जमाफी नहीं है खेती की बुनियादी खामियों का हल

किसानों का अस्तित्व बचाए रखने के लिए हालात में आमूलचूल बदलाव की जरूरत है.

Akshaya Mishra Updated On: Jun 09, 2017 06:05 PM IST

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किसान आंदोलन: कर्जमाफी नहीं है खेती की बुनियादी खामियों का हल

किसानों का विरोध प्रदर्शन मंदसौर से मध्य प्रदेश के दूसरे हिस्सों में भी पहुंच रहा है और इसकी लपटें दूसरे राज्यों में भी फैलने का खतरा पैदा हो गया है. लेकिन, किसानों की कर्ज माफी इस समस्या का समाधान नहीं है. यह समस्या के लक्षणों को तो हल करता है, लेकिन इससे बीमारी खत्म नहीं होगी. इससे तत्काल रूप से तो राहत मिलती है, लेकिन इसके फिर से न पनपने की कोई गारंटी नहीं मिलती.

कर्ज माफी पर 2.57 लाख करोड़ का खर्चा

कर्ज माफी से केवल सरकारी खजाने पर भारी बोझ ही पड़ता है. एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, अगर सभी राज्य 2019 में आम चुनावों से पहले किसानों के कर्ज माफ करने का फैसला कर लें तो इससे खजाने पर 2,57,000 करोड़ रुपए का बोझ पड़ेगा. यह एक बड़ी रकम है.

यह चीज हमें मौजूदा विरोध प्रदर्शन के दूसरे पहलुओं और इसके केंद्र में मौजूद शख्स यानी किसान के बारे में सोचने के लिए मजबूर करती है. इस मसले पर चल रहे मौजूदा राजनीतिक ड्रामे को भूल जाइए. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को मंदसौर में पहुंचने से पहले ही पकड़ लिया गया.

हालांकि, बाद में उन्हें छोड़ दिया गया और पीड़ितों से मिलने की इजाजत दे दी गई. बीजेपी को लगता है कि जिस वक्त मंदसौर जल रहा है, राहुल गांधी वहां राजनीतिक रोटियां सेंकने का मौका भुना रहे हैं. इस वक्त मंदसौर की घटना को लेकर पूरा राजनीतिक माहौल गर्माया हुआ है. चीजें साफ होने की बजाय और ज्यादा उलझती दिख रही हैं.

फसल अच्छी हो या बुरी किसान दरिद्र ही रहता है. भारतीय किसानों के लिए हालात और ज्यादा मुश्किल भरे होते जा रहे हैं. अगर किसान कम उपज पैदा करता है तो उसके लिए मुश्किल है, अगर पैदावार ज्यादा होती है तो किसान के लिए मुश्किल है. इसके अलावा, किसान जो पैदा करता है उस पर उसका कोई कंट्रोल नहीं है. अगर कम बारिश होती है तो किसानों के लिए मुश्किलें पैदा हो जाती हैं, यही चीज ज्यादा बारिश के मामले में भी है.

किसान महाजनों से या बैंकों से खेती के लिए पैसे उधार लेते हैं. यह एक तरह से जुआ होता है जिसमें किसान फसल तो बोते हैं और दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन इसके बाद भी ऐसे तमाम फैक्टर होते हैं जिन पर उनका कोई कंट्रोल नहीं होता है.

कड़ी मेहनत के बाद भी किसान को नहीं पता होता कि उसकी फसल कैसी होगी, फसल बेचने से उसके आर्थिक हालात में कोई सुधार होगा या नहीं और वह लिए गए कर्ज को चुका भी पाएगा या नहीं. कर्ज के जाल में फंसे किसानों के पास इससे निकलने का कोई चारा नहीं होता.

कर्ज अपने आप में ही बड़ा जाल है.

कर्ज अपने आप में ही बड़ा जाल है.

हर साल 12000 आत्महत्याएं

आर्थिक मुश्किलों में जकड़े किसान आत्महत्या का सहारा लेने लगते हैं. हालात इतने खराब हैं कि देश में 12,000 किसान हर साल आत्महत्या करते हैं.

इसी साल की शुरुआत में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह आंकड़ा जमा किया है. किसान केवल फसल के बर्बाद होने या कर्ज की दिक्कतों की वजह से ही आत्महत्या नहीं करते, बल्कि कृषि सेक्टर में जिस तरह के निराशाजनक हालात बने हुए हैं उनके चलते भी किसान आत्महत्या करने का फैसला करते हैं.

हैरत की बात यह है कि हर पार्टी के चुनाव घोषणापत्र में किसान समुदाय का जोरशोर से जिक्र किया जाता है. किसानों को छोड़कर किसी दूसरे समुदाय के लिए इतनी सहानुभूति नहीं दिखाई जाती.

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50% आबादी और महज 17% जीडीपी में योगदान

किसान पूरे देश का पेट भरते हैं. किसान अगर दिन-रात हाड़तोड़ मेहनत न करें तो शायद हमें खाना नसीब न हो. हम इससे वाकिफ हैं. हमें आंकड़े भी पता हैं. कृषि और इससे जुड़ी हुई गतिविधियों पर देश की करीब आधी आबादी टिकी हुई है. लेकिन, जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी 17 फीसदी से थोड़ी ज्यादा है. ये आंकड़े अच्छे नहीं हैं. इनसे पता चलता है कि देश की इकनॉमी ने इतने समय में मैन्युफैक्चरिंग पर शिफ्ट नहीं किया है.

अप्रत्याशित है खेतीबाड़ी

कृषि अपने ऊपर निर्भर वर्ग के लिए उतनी फायदेमंद नहीं है. खेतीबाड़ी आज भी उतनी ही अप्रत्याशित है, जैसी अब से सदियों पहले थी. भारत में खेतीबाड़ी के हालात दूसरे देशों के मुकाबले इस वजह से भी मुश्किल भरे हैं क्योंकि यहां लोगों के पास जोत कम है. खेत छोटे-छोटे हैं, जिससे बड़े पैमाने पर कमर्शियल तरीके से खेती नहीं हो पाती है.

समस्याएं छोटी नहीं, स्ट्रक्चरल हैं

एक्सपर्ट कहते हैं कि कृषि सेक्टर में स्ट्रक्चरल कमजोरियां काफी गहरी और व्यापक हैं. किसी फसल को बोने से लेकर इसके खाने की टेबल तक आने के दौरान सबसे ज्यादा कमाई बिचौलियों को होती है.

कोल्ड स्टोरेज का अभाव बड़े पैमाने पर फलों और सब्जियों को खराब कर देता है. राज्यों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का ऐलान करना केवल किसानों को कम पैदावार के लिए बढ़ावा देता है.

Farmer Unyoked Gagged Oxen Countryside Karnataka

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महाजनी कुचक्र और अपर्याप्त सिंचाई सुविधाएं

सूदखोर महाजनों का मकड़जाल किसानों को उनकी आर्थिक दरिद्रता से बाहर नहीं निकलने देता. सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्थाएं नहीं हैं. बात यह है कि हम सब किसानों और कृषि सेक्टर की मुश्किलों से अच्छी तरह से वाकिफ हैं. इन सब पर खूब चर्चा और बहस भी होती है. लेकिन राहत पहुंचाने की दिशा में कोई कदम उठता क्यों नहीं दिखाई देता?

हर पार्टी खुद को किसानों का सबसे बड़ा हमदर्द दिखाना चाहती है, उनकी समस्याओं को दूर करने के लंबे-चौड़े वादे करती है. लेकिन ये चीजें कभी चुनावी घोषणा पत्र से निकलकर हकीकत की शक्ल नहीं ले पातीं.

फिस्कल प्रूडेंस के आइडिया की अनदेखी

किसानों के कर्ज माफ करने को इन सब मुश्किलों का सबसे आसान तरीका मान लिया गया है. नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी सरकार फिस्कल प्रूडेंस (राजकोषीय समझदारी) को लेकर काफी गंभीर रही है और केंद्र सरकार ने खुद को लोकलुभावन घोषणाएं करने से दूर ही रखा है. लेकिन, पार्टी के मुख्यमंत्री इस आइडिया पर चलने को ज्यादा तवज्जो नहीं देते.

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दूसरे राज्यों में भी बढ़ेगी कर्ज माफी की मांग

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के किसानों के 36,000 करोड़ रुपये के कर्ज माफ करने का एलान करने के बाद से दूसरे राज्यों में भी कर्ज माफ करने की मांग की एक नई लहर पैदा हो गई है. देवेंद्र फडणवीस की अगुवाई वाली महाराष्ट्र सरकार ने भी इसी तरह के कदम का वादा कर दिया है. शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश में ऐसा फैसला ले सकते हैं.

स्ट्रक्चरल बदलाव की जरूरत

इससे साफ हो रहा है कि बीजेपी भी कांग्रेस के रास्ते पर चल पड़ी है. लेकिन, कर्ज माफ करना क्या कृषि सेक्टर की मुश्किलों का कोई लॉन्ग-टर्म समाधान हो सकता है? निश्चित तौर पर ऐसा नहीं है. इससे केवल इस तरह की मांगों को और बढ़ावा मिलता है. किसानों को इसके लिए दोष नहीं देना चाहिए. किसानों का अस्तित्व बचाए रखने के लिए हालात में आमूलचूल बदलाव की जरूरत है. बेहतर होगा कि सरकार इस पर गौर करे.

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