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सीएम शिवराज के खिलाफ अरुण यादव को उतारने के कांग्रेसी दांव के पीछे क्या है रणनीति

कांग्रेस ने शिवराज के खिलाफ अरुण यादव को मैदान में उतारा है, यादव राज्य में पार्टी के ओबीसी चेहरा हैं और मध्य प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष भी रह चुके हैं

Updated On: Nov 09, 2018 01:09 PM IST

Abhishek Tiwari Abhishek Tiwari

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सीएम शिवराज के खिलाफ अरुण यादव को उतारने के कांग्रेसी दांव के पीछे क्या है रणनीति
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कांग्रेस ने गुरुवार रात को मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों की अपनी 6वीं और आखिरी लिस्ट जारी कर दी. कांग्रेस राज्य की 230 में से 229 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और एक सीट पार्टी ने लोकतांत्रिक जनता दल के लिए छोड़ा है. आखिरी लिस्ट में अरुण यादव का नाम है जो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उनके घर मे चुनौती देंगे. राजनीतिक विश्लेषक बता रहे हैं कि यह कांग्रेस का साहसिक और सोच-समझकर लिया गया है फैसला है.

सीएम शिवराज सिंह चौहान लगातार तीन बार से अपने गढ़ सीहोर जिले की बुधनी सीट से चुनाव जीत रहे हैं. इस बार भी शिवराज बुधनी से ही चुनाव मैदान में हैं. कुछ दिन पहले तक चर्चा थी कि पार्टी शिवराज को दो जगह या बुधनी के अलावा किसी अन्य सीट से चुनाव लड़ाएगी. पार्टी के आंतरिक सर्वे में बुधनी से शिवराज के खिलाफ रिपोर्ट आई थी. हालांकि पार्टी ने मुख्यमंत्री पर भरोसा जताया है और उनकी सीट नहीं बदली गई है. पिछले चुनाव में शिवराज सिंह चौहान बुधनी और बिदिशा दो जगह से मैदान में थे.

कांग्रेस ने शिवराज के खिलाफ अरुण यादव को मैदान में उतारा है. यादव राज्य में पार्टी के ओबीसी चेहरा हैं और मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. कमलनाथ से पहले अरुण यादव के हाथ में ही कांग्रेस की कमान थी. पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव खंडवा से दो बार सांसद भी रह चुके हैं. 2014 के चुनाव में बीजेपी के नंद किशोर चौहान ने अरुण यादव को हराया था.

कांग्रेस ने क्यों शिवराज के खिलाफ अरुण यादव को खड़ा किया?

कई लोग इस सोच में पड़े हैं कि आखिर कांग्रेस ने शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ अरुण यादव को टिकट क्यों दिया है? हालांकि पार्टी इस बात को लेकर निश्चिंत हैं. पार्टी ने आंतरिक सर्वे और स्थानीय नेताओं से मिली जानकारी के मुताबिक शिवराज के खिलाफ अरुण यादव को चुनाव मैदान में उतारने का फैसला लिया है.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस बार के चुनाव में कांग्रेस बहुत संभल कर चल रही है और पहले की गलतियों को नहीं दोहरा रही है. इस बार कांग्रेस ने किसी भी चीज में जल्दबाजी नहीं की. पार्टी ने जिन गलतियों को गुजरात और कर्नाटक में दोहराया था उसे इस बार के चुनाव में ठीक कर लिया है. मजबूत और सोची समझी रणनीति के तहत पार्टी कदम बढ़ा रही है. अरुण यादव को बुधनी से टिकट देने का फैसला भी इसी कड़ी का हिस्सा है.

shivraj singh chauhan

शिवराज सिंह चौहान और अरुण यादव दोनों ही ओबीसी समुदाय से आते हैं. बुधनी विधानसभा क्षेत्र में किरार जाति (शिवराज सिंह चौहान इसी जाति के हैं) से लगभग दोगुनी संख्या यादवों की है. कांग्रेस को लग रहा है कि जातिगत आधार और शिवराज के खिलाफ लोगों की नाराजगी को भुना कर मुख्यमंत्री को उनके घर में ही हराया जा सकता है. ये तो आने वाला वक्त बताएगा कि कांग्रेस अपनी रणनीति में कितनी सफल होती है.

कांग्रेसी याद दिला रहे 1984 का लोकसभा चुनाव

गुरुवार रात को कांग्रेस ने अरुण यादव को शिवराज के खिलाफ चुनाव लड़ने की घोषणा की थी. टिकट मिलने के बाद से अरुण यादव अपने प्रचार-प्रसार में लग गए हैं. सोशल मीडिया पर उनके मैसेजेस काफी तेजी से फैल रहे हैं. इन मैसेजेस में अरुण यादव के समर्थक माधवराव सिंधिया और अटल बिहारी वाजपेयी के बीच हुए चुनाव की याद दिला रहे हैं. 1984 लोकसभा चुनाव में सिंधिया ने वाजपेयी को हरा दिया था.

अरुण यादव के समर्थक यह बता रहे हैं कि जब अटल बिहारी वाजपेयी को हमारे नेता हरा सकते हैं तो मामा (मध्य प्रदेश में शिवराज को मामा के नाम से भी जाना जाता है) क्या चीज हैं. यानी जीत के दावे अभी से होने लगे हैं. लेकिन कांग्रेस को यह समझना होगा कि ग्वालियर का क्षेत्र सिंधिया परिवार का गढ़ रहा है जबकि यह चुनाव बुधनी विधानसभा क्षेत्र में हो रहा है. जिस लोकसभा चुनाव में माधवराव सिंधिया ने वाजपेयी को हराया था वह चुनाव 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुआ था. इसमें कांग्रेस को जनता की सहानुभूति प्राप्त थी और पार्टी ने 400 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की थी.

एक बात और, मध्य प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ चुनाव लड़ना अरुण यादव के लिए किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है. अगर यादव शिवराज को हरा देते हैं तो उनकी सुस्त पड़ी राजनीतिक गाड़ी तेजी पकड़ लेगी अन्यथा उन्हें आगे के राजनीतिक जीवन के लिए नए रास्ते तलाशने होंगे.

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