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ये कैसी राजनीति! शहाबुद्दीन कोर्ट की नजर में अपराधी हैं और आरजेडी के सम्मानित नेता?

सीवान का बाहुबलि शहाबुद्दीन देश की अदालतों के लिए तो अपराधी है लेकिन राष्ट्रीय जनता दल की नजर में एक सम्मानित नेता बना हुआ है.

Updated On: Oct 31, 2018 08:47 AM IST

Kanhaiya Bhelari Kanhaiya Bhelari
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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ये कैसी राजनीति! शहाबुद्दीन कोर्ट की नजर में अपराधी हैं और आरजेडी के सम्मानित नेता?
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बिहार में सत्ता पक्ष हमेशा से सवाल उठाते रहे हैं कि आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव के दिल में सिवान के माफिया डॉन मोहम्मद शहाबुद्दीन के लिए बेइंतेहा प्यार है. डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी अक्सर आरोप लगाते हैं कि आरजेडी चीफ ने शहाबुद्दीन को दल की अति महत्वपूर्ण यूनिट-'राष्ट्रीय कार्यकारणी' में जगह देकर सम्मानित किया है.

आरजेडी चीफ शहाबुद्दीन के लिए अपने प्रेम का प्रकटीकरण समय-समय पर करते रहे हैं. निचली अदालतों ने शहाबुद्दीन को डबल मर्डर केस में जब आजीवन करावास की सजा सुनाई तो लालू यादव की प्रतिक्रिया थी, ‘जबतक सुप्रीम कोर्ट उस सजा पर अपनी मुहर नहीं लगा देता तबतक किसी को गुनहगार नहीं माना जा सकता है’. सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद लालू यादव के साथ ही आरजेडी के तमाम नेता इस विषय पर मौन हैं.

बहरहाल, जिस केस में मोहम्मद शहाबुद्दीन को आजीवन कारावास की सजा मिली है उसके बारे में बताने के साथ-साथ सिवान के डॉन की करतूत की भी विवेचना जरूरी है.

देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के गृह जिले सीवान के बहुत ही छोटे व्यापारी चन्द्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू 2004 में तत्कालीन एसपी के आवास पर रात को बिलखते पहुंचे. एसपी के पैर पकड़कर चंदा बाबू ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘माई बाप मेरे दो जवान बेटों को मोहम्मद शहाबुद्दीन ने तेजाब से नहलाकर मार दिया. अभी जेल में बंद है और वहीं से मुझे भी जान से मारने की धमकी दी है तथा मेरे तीसरे बेटे राजीव रंजन को बेसब्री से खोज रहा है’.

बकौल चंदा बाबू ‘मेरी बात सुनते ही एसपी साहब उखड़ गए. चिल्लाकर बोलने लगे कि मैं स्वयं उस आदमी से परेशान हूं. ईश्वर से प्रार्थना कर रहा हूं कि मेरा स्थानांतरण किसी दूसरे जिले में हो जाए. मेरी सलाह है कि फौरन शहर छोड़कर भाग जाओ. नहीं तो अल्लाह भी तुम्हें शहाबुद्दीन की एके 47 की गोली से नहीं बचा सकते हैं.’

उस दौर में शहाबुद्दीन का जबरदस्त खौफ था. इसी डर के दम पर शहाबुद्दीन ने 1990 से स्टार्ट करके डेढ़ दशक तक सीवान जिले में समानांतर सरकार चलाई. लेकिन नवंबर 2005 में नीतीश कुमार की सरकार आने के बाद शहाबुद्दीन के खिलाफ इमानदारी से कार्रवाई शुरू की गई. वैसे 2004 के अंत में ही राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद शहाबुद्दीन पर अंकुश लगाने की कार्रवाई शुरू कर दी गई थी.

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बचपन से ही शहाबुद्दीन की इच्छा क्राइम की दुनिया का बेताज बादशाह बनने की थी. कम उम्र में ही शहाबुद्दीन छोटी-छोटी चोरी की घटनाओं को अंजाम देने लगा था. 1986 में उसके खिलाफ पहला अपराधिक केस रजिस्टर हुआ तो वह जमशेदपुर भाग गया तथा तब के शातिर अपराधी साहब सिंह का शूटर बन गया.

फरवरी 1989 में एक साथ 3 दबंगों की हत्या कर वहां से वापस सीवान आ गया. जमशेदपुर अदालत में आज भी उसके खिलाफ मुकदमा चल रहा है.

तब सीवान की धरती नक्सलियों की चपेट में थी. पीड़ित किसानों को एक मजबूत संरक्षक की जरूरत थी. मोहम्मद शहाबुद्दीन ने दर्जनों नक्सली नेताओं का कत्ल कराकर नक्सलियों से पीड़ित किसानों का दिल जीत लिया. जल्द ही शहाबुद्दीन लोगों के लिए ‘साहब’ बन गया और 1990 का विधानसभा का चुनाव र्निदलीय प्रत्याशी के रूप में जीरादेइ क्षेत्र से भारी मतों से जीत गया.

शहाबुद्दीन खुद गर्व से बताता रहा है कि चुनाव के समय उसकी उम्र मात्र साढ़े 23 साल थी. विरोधियों ने उम्र के सवाल पर केस भी किया था लेकिन जजमेंट आते-आते दूसरा चुनाव आ गया और मुद्दा खत्म हो गया.

लालू यादव बिहार के सीएम बन गए थे. बिना समय गंवाए, ‘साहब लालू यादव के शरण में चले गए.’ सीएम के आर्शीवाद से ‘साहब’ का क्राइम फलता-फूलता रहा. लालू यादव और राबड़ी देवी की सरकार में सीवान में सैकड़ों लोगों की हत्याएं हुईं जिसमें जेएनयू के अध्यक्ष चंद्रशेखर प्रसाद, बीजेपी के कई ताकतवर नेता, 3 पुलिस अफसर, सीपीआई लिबरेशन के कई नेता और चंदा बाबू के दो बेटे प्रमुख थे.

दर्जनों पुलिस अधिकारियों, जिसमें एक एसपी भी थे, पर शहाबुद्दीन ने कातिलाना हमले के अलावा कई हाई-प्रोफाइल व्यक्तियों का अपहरण करवाया. हत्या, अपहरण तथा हमलों में ‘साहब’ आरोपित हुए लेकिन ‘राजा’ की कृपा से उनके खिलाफ कोई पुलिस अफसर कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा सका.

16 मार्च 2001 को शहाबुद्दीन ने एक डीएसपी की बेरहमी से पिटाई की. इस घटना ने सीवान पुलिस प्रशासन को बागी बना दिया. अपमान का बदला के लिए तत्कालीन एसपी के.एस. मीना के नेतृत्व में सैकड़ों पुलिस वालों ने शहाबुददीन के पैतृक गांव प्रतापपुर को घेर लिया. दोनों तरफ से हजारों राउंड गोलियां चलीं जिसमें ‘साहब’ के 8 गुर्गे मारे गए. इसके अलावा 2 पुलिसकर्मियों को भी जान गंवानी पड़ी.

शहाबुद्दीन भागने में सफल रहा. खबर के मुताबिक वो बुर्का पहनकर गन्ने के खेत में छिप गया था. मजेदार बात ये है कि बिहार सरकार ने प्रतापपुर कांड पर जांच कमेटी बनाई जिसने ‘साहब’ को बेकसूर तथा पुलिस को दोषी माना. जबकि पुलिस ने उसके घर से सर्च के बाद कई आपत्तिजनक सामान बरामद किए थे. इसमें घातक हथियार, नाइट विजन चश्मा, सेना द्वारा इस्तमाल में लाया जाने वाले हथियार और विदेशी मुद्रा शामिल थी.

मोहम्मद शहाबुद्दीन को एक बार बीजेपी के एक सांसद के आवास से दिल्ली में गिरफ्तार किया गया था. इंटेलिजेंस ब्यूरो की रपट है कि शहाबुद्दीन का सीधा संबंध अंडरवर्ल्ड के कई कुख्यात गिरोहों से है. कश्मीर से आने वाले सेब से भरे ट्रकों में एके 47 असॉल्ट राइफल छिपाकर बिहार में लाने की शुरुआत शाहबुद्दीन ने ही की थी.

बिहार के पूर्व डीजीपी डी.पी. ओझा बताते हैं, ‘मोहम्मद शहाबुद्दीन जैसा शातिर अपराधी मैंने अपनी जिंदगी में नहीं देखा. एक सम्मानित पत्रकार ने जब उसके खिलाफ खबर छापी तो उसका कत्ल पटना के पाटलिपुत्र इलाके में दिन-दहाड़े करवा दिया गया. पटना से प्रकाशित एक हिंदी दैनिक के नामी-गिरामी कलमजीवी को उसने जान से मारने की सुपारी दी थी जिन्हें मैने सिक्योरिटी दी थी. दिल्ली से प्रकाशित तहलका मैगजीन के संपादक तरुण तेजपाल को खत्म करने की भी उसने सुपारी ली थी ताकि तब की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को अस्त-व्यस्त किया जाए’.

मोहम्मद शहाबुद्दीन के खिलाफ कुल 75 अपराधिक मुकदमे राज्य के विभिन्न पुलिस थानों में दर्ज हैं. 20 मुकदमों में उसकी रिहाई हो गई है जबकि 10 में सजा. अभी 45 मुकदमों की सुनवाई उसके खिलाफ अदालतो में लम्बित है.

चंदा बाबू के दो बेटों की निर्मम हत्या में शहाबुद्दीन को सीवान कोर्ट से 2015 में आजीवन कारावास की सजा हो चुकी है. सजा के खिलाफ शहाबुद्दीन ने पटना उच्च न्यायालय में अपील दायर की. जिसकी सुनवाई के क्रम में ही 7 सितंबर 2016 को हाईकोर्ट से उसे जमानत मिल गई जो राज्य में राजनीतिक भूचाल का कारण बनी थी.

जेल से छूटते ही शहाबुद्दीन ने नीतीश के खिलाफ बयान दिया था. हालांकि जमानत के 23 दिन बाद 30 सितंबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने उसकी बेल रद्द कर दी. दोबारा जेल जाने से पहले शहाबुद्दीन ने पत्रकारों से कहा, ‘मेरी जमानत सीएम नीतीश कुमार ब्रेक कराई है और मेरे समर्थक चुनाव में उनको उनका औकात बता देंगे’. हाईकोर्ट ने सजा को बरकरार रखा जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने कल मुहर लगा दी.

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बहरहाल 51 वर्षीय शहाबुद्दीन ने 1990 और 1995 में सीवान जिले की जीरादेई विधान सभा का प्रतिनिधित्व किया. उसके बाद क्रमश: 1996, 1998, 1999 तथा 2004 में सीवान लोकसभा क्षेत्र से आरजेडी का एमपी रहा. मुन्ना चौधरी मर्डर केस में 10 साल की सजा होने के बाद चुनाव से वंचित हो गया. 2009 तथा 2014 लोकसभा चुनाव में उसने अपनी बेगम हीना शहाब को आरजेडी का कैंडिडेट बनवाया जो बीजेपी के ओमप्रकाश यादव से बुरी तरह हार गई.

शहाबुद्दीन की इस्लाम धर्म में अगाध निष्ठा है. मुझे एक बार बताया था, ‘मैं किसी भी हालत में नमाज अदायगी नहीं छोड़ सकता हूं. दारू को मैं हराम समझता हूं. भुना हुआ बकरे का गोश्त मेरा सबसे प्रिय भोजन है’.

जेल प्रवास के क्रम में ही उसने पोस्ट ग्रेजुएट की डिग्री हासिल की और फिर पी.एच.डी. की उपाधि भी अपने नाम दर्ज कराई. अब नाम डॉक्टर मोहम्मद शहाबुद्दीन है. शहाबुद्दीन का दावा है कि वो सेलिब्रेटी के श्रेणी में हैं जो केवल पुस्तकों से प्यार करता है. जेल में रहते हुए मैंने 500 किताबें पढ़ी हैं, जिनमें दीनदयाल उपाध्याय से लेकर मनमोहन सिंह तक की लिखी किताबें शामिल हैं. मेरे नेता लालू प्रसाद यादव हैं लेकिन मैं अटल बिहारी वाजपेयी को भी एक बेहतरीन राजनीतिज्ञ मानता हूं. शहाबुद्दीन महंगे कपड़े पहनने का काफी शौकीन है. जींस और टी शर्ट उसकी पसंदीदा ड्रेस है.

मोहम्मद शहाबुद्दीन को एक बेटा और दो बेटियां हैं. बेटा लंदन में वकालत का कोर्स कर रहा है जबकि एक बेटी एम.बी.बी.एस पढ़ रही है तो दूसरी बेटी अभी कॉलेज में है.

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