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नेहरू, इंदिरा और बेनजीर की तरह वोटरों पर बनी रहेगी मोदी की पकड़

जब देश ऊंचे आर्थिक विकास के दौर में होता है तब देश या राज्य में जो पार्टियां सत्ता में होती हैं वो दोबारा सत्ता में लौटती है

Updated On: Jan 02, 2017 05:40 PM IST

Aakar Patel

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नेहरू, इंदिरा और बेनजीर की तरह वोटरों पर बनी रहेगी मोदी की पकड़

किसी नेता की लोकप्रियता का आकलन करने में उसके प्रदर्शन की कितनी अहमियत होती है? तर्क कहता है कि अपने लोगों की जिंदगियां खुशहाल बनाने की काबिलियत रखने वाला नेता लोकप्रिय होता है. लोकतांत्रिक नीतियों में यह एकमात्र सबसे महत्वपूर्ण गुण दिखाई देता है, इसलिए जब देश ऊंचे आर्थिक विकास के दौर में होता है तो तब देश या राज्य में जो पार्टियां सत्ता में होती हैं, वो दोबारा सत्ता में लौटती है.

जानकारों के मुताबिक, यही वो कारण है जिसकी वजह से पिछले दो दशकों से कई भारतीय नेताओं ने एंटी-इनकंबेंसी (सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ लहर) फैक्टर में भी वापसी की है. उड़ीसा में नवीन पटनायक, बिहार में नीतीश कुमार, मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी जैसे मुख्यमंत्री इसकी मिसाल हैं. इन लोगों ने मुख्यमंत्री के तौर पर अपने राज्य को तेज रफ्तार विकास दी है.

आर्थिक मोर्चे पर अच्छे प्रदर्शन के बूते इन्हें सत्ता विरोधी लहर में भी जीतने में मदद मिली. इससे यह तर्क बनता है कि जो नेता अार्थिक मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन करने में नाकाम साबित होते हैं, उन्हें जनता नकार देती है. माना जाता है कि वोटर जिन नेताओं को गद्दी सौंपते हैं, वो चाहते हैं  कि उनकी उनकी जिंदगियों में आर्थिक तौर पर खुशहाली लाएं.

आंकड़े दिखाते हैं दूसरी तस्वीर  

इस सिद्धांत के साथ दिक्कत यह है कि इसका समर्थन करने के लिए कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है. 2004-2014 के दशक के दौरान भारत ऐतिहासिक रूप से सबसे तेज विकास करने वाला देश था. इस दौरान कांग्रेस का शासन था. लेकिन, लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया. लोकसभा में पार्टी घटकर अपने न्यूनतम संख्याबल पर पहुंच गई थी.

अर्थव्यवस्था से जु़ड़े आंकड़े का चुनाव के नतीजों पर असर नहीं होता

अर्थव्यवस्था से जु़ड़े आंकड़े का चुनाव के नतीजों पर असर नहीं होता

यह कहा जा सकता है कि दूसरी चीजों का भी चुनाव पर असर हुआ है. पहला मनमोहन सिंह सरकार पर लगा भ्रष्टाचार का आरोप और दूसरा नरेंद्र मोदी की मौजूदगी और उनका आक्रामक प्रचार भी इसके कारण रहे. ऐसे में हम 2014 के चुनावों को एक अपवाद मान सकते हैं.

दुर्भाग्य से इसके पहले के आंकड़े और भी ज्यादा चौंकाने वाले हैं. हालिया वक्त में दूसरा सबसे तेज विकास का दौर अटल बिहारी वाजपेयी का साल 2004 तक चलने वाला पांच साल का शासनकाल रहा. वह जीत को लेकर इतने आश्वस्त थे कि उनका चुनावी कैंपेन एडवरटाइजिंग कैंपेन की दी गई टैगलाइन 'शाइनिंग इंडिया' के नाम से लॉन्च किया गया. वाजपेयी हार गए और इसकी असली वजह पता नहीं चल पाई.

इस हार के बाद जो कयास लगाए गए थे वो ये कि भारतीय जनता पार्टी जिस भरोसे के साथ चल रही थी कि उसने देश में खुशहाली लाई है, उनका वो दावा हकीकत से दूर था. और अगर वाजपेयी ने वास्तव में काम किया होता तो भी क्या वे चुनाव जीत पाते?

आर्थिक प्रदर्शन से चुनावी जीत नहीं

मैं इससे सहमत नहीं हूं. इसके पहले के कई दशक बताते हैं कि इस उपमहाद्वीप में आर्थिक प्रदर्शन और नीतियां चुनावी जीत की कोई अनिवार्य शर्त नहीं है.1950 और 1960 के दशक के दौरान कांग्रेस का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लिहाज से प्रदर्शन बेहद खराब रहा. यह दौर 3 फीसदी या उससे कम विकास दर (जिसे हिंदू विकास दर भी कहा जाता है) का गवाह बना. हालांकि कांग्रेस को इस दौरान बड़ी चुनावी जीत हासिल की.

जिसे हम आज गुड गवर्नेंस कहते हैं, उसकी चर्चा उस दौर में शायद ही होती हो. तो क्या आज हम वैसे बिलकुल भी नहीं हैं जैसे 1960 के दशक के दौरान थे? मैं कहूंगा कि ऐसा नहीं है. भारत जैसे प्राचीन देश में शायद ही इतनी तेजी से कोई बदलाव होता है. इसीलिए चुनावी जीत के पीछे आर्थिक प्रदर्शन को सबसे बड़ा कारण मान लिया जाए इसका कोई सबूत नहीं है.

हम इस मुद्दे पर इस समय ये चर्चा सिर्फ ये समझने के लिए कर रहे हैं कि नोटबंदी का मौजूदा संकट 2017 में नरेंद्र मोदी की पार्टी पर किस तरह से असर डाल सकता है. बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश का चुनाव एक बड़ा दांव है. साथ ही पंजाब और गोवा जैसे छोटे राज्यों और बाद में गुजरात के चुनाव भी अहम साबित होने वाले हैं.

बीजेपी की विरोधी पार्टियां को लगता है कि, मोदी की नेतृत्व वाली सरकार जिस तरह से आर्थिक क्षेत्र में खराब प्रदर्शन और नोटबंदी से मचे हाहाकार के बाद पीएम मोदी को आगामी चुनावों में हार का सामना करना पड़ सकता है.

करिश्मा, साख और गल्प

मुझे यह सब इतना आसान नहीं लगता है. करिश्मा, साख और कहानियां अभी भी मोदी के साथ है. मतदाताओं की नाराजगी को गुस्से में तब्दील करने के लिए विरोधी पार्टियों को काफी मेहनत करनी पड़ेगी.

Indira Gandhi

नेहरू और इंदिरा गांधी की भारतीय जनमानस पर गहरी पकड़ थी

अगर नोटबंदी का असर फरवरी महीने तक भी जारी रहता तो भी मतदाता बीजेपी का साथ छोड़ देंगे और दूसरे दलों विरोधी की तरफ चले जाएंगे ऐसा होना मुश्किल लगता है.

यहां तक कि अगर हम यह मानकर चलें कि नोटबंदी के चलते अर्थव्यवस्था पर बुरा असर होगा और अगली कुछ तिमाहियों तक विकास दर कम रहेगी, तब भी इससे मोदी की लोकप्रियता शायद ही कम होगी.

जैसे नेहरू और उनकी बेटी इंदिरा की अपने मतदाताओं पर मजबूत पकड़ बनी हुई थी या फिर जैसे जुल्फिकार अली भुट्टो और उनकी बेटी बेनजीर की पाकिस्तान के वोटरों पर धाक थी, फिर चाहे  वे लोग आर्थिक प्रदर्शन के मोर्चे पर खोखले ही क्यों नहीं साबित हुए हो, हमें इस बात की पूरी उम्मीद करनी चाहिए कि मोदी की पकड़ भी मतदाताओं पर वैसे ही कायम रहेगी. ऐसे में अगर बीजेपी 2017 में अपनी सफलता के झंडे गाड़ना जारी रखती है तो हमें इस पर अचरज नहीं होना चाहिए.

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