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वाईब्रेंट गुजरात: पीएम के साए में नोबल विजेताओं ने की जीएम की बात

मोदी न सिर्फ इस आयोजन से खुश हैं बल्कि उनके मन में इसे लेकर एक संतोष और इत्मीनान के भी भाव हैं.

Updated On: Jan 12, 2017 11:57 AM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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वाईब्रेंट गुजरात: पीएम के साए में नोबल विजेताओं ने की जीएम की बात

सुर की लहरियों पर तैरता जय-जय गर्वी गुजरात का कोरस-गान जैसे ही अपने चरम पर पहुंचा, गीत में मग्न प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अंगुलियां डेस्क पर तबला बजाने के अंदाज में थिरक उठीं.

वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन के उद्घाटन के मौके पर 100 देशों के प्रतिनिधि मौजूद थे. इनमें कुछ राष्ट्राध्यक्ष भी थे लेकिन इस भारी-भरकम मौजूदगी के बीच मोदी एकदम सहज और शांत दिखे.

मोदी की इस छवि की तुलना 2003 के उस हालात से कीजिए, जब उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री गुजरात विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद पहली बार वाइब्रेंट गुजरात का आयोजन किया था. तब मोदी की भरसक कोशिश के बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इस सम्मेलन का उद्घाटन करने को राजी नहीं हुए थे.

हालांकि, लालकृष्ण आडवाणी ने जरुर सम्मेलन में शिरकत की. लेकिन वाइब्रेंट गुजरात के इस कार्यक्रम ने बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व में एक किस्म की बेचैनी डाल दिया था. सभी के मन में जो सवाल कौंध रहा था कि गुजरात के पास निवेशकों को दिखाने और उन्हें वहां आने के लिए बाध्य करने के लायक आखिर ऐसा क्या है जिसे वाइब्रेंट कहा जाए?

गोधरा कांड का भूत

ये सच है कि उस समय भी  2002 के गोधरा कांड और इसके बाद हुए दंगे का भूत भागा नहीं था. मोदी को 2002 के विधानसभा चुनाव में भले ही जीत हासिल हुई हो लेकिन उनकी इस जीत को लेकर बीजेपी के भीतर भी पहले जैसा उत्साह नहीं था. बीजेपी के भीतर भी ये माना जा रहा था कि इस जीत में हार के बीज छिपे हैं.

2005 से लेकर 2011 तक वाइब्रेंट गुजरात का सफर उथल-पुथल भरा रहा. अमेरिका और यूरोप के देश आधिकारिक तौर पर इस आयोजन की अनदेखी कर रहे थे और दुश्मनी पर अड़ी केंद्र की यूपीए सरकार वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन में भागीदारी करने वाले उद्योगपतियों को आयकर के नोटिस थमा रही थी.

2017 का ‘वाइब्रेंट गुजरात’ कई मायनों में अनोखा है. इस सम्मेलन का दायरा इतना बड़ा था कि बड़ी आसानी से इसकी तुलना दावोस जैसे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों से की जा सकती है. कार्यक्रम में तकरीबन सौ देशों के राजदूत जिसमें तीन राष्ट्राध्यक्ष और सभी बड़े देशों के सरकारी नुमाइंदे शामिल हुए.

इन लोगों का भारत के शीर्ष उद्योगपतियों और दुनिया के बेहतरीन सीईओ के साथ एक ही छतरी के नीचे एक साथ, एक मंच पर होना अपने आप में असाधारण बात है. आयोजन में कहीं किसी तरह की कोई कमी का न होना खुद में सबूत है कि राज्य प्रशासन और उसके अधिकारिय अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम को आयोजित करने में पारंगत हो चुके हैं.

नोबेल विजेताओं का डायलॉग

लेकिन वाइब्रेंट गुजरात की असली कहानी कुछ और ही है. सुबह में एक सत्र ‘नोबेल डायलॉग’ का था जिसमें नौ नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने शिरकत की. इनका एक स्वर में कहना था कि विज्ञान को लेकर राजनेताओं की अज्ञानता चिंता का विषय है.

नोबेल पुरस्कार विजेताओं के एक गुट ने एनजीओ-समुदाय, खासकर ग्रीनपीस पर सीधा निशाना साधा. ग्रीनपीस जीन-संवर्धित (जीएम) बीजों के इस्तेमाल का विरोध कर रहा है. डा वेंकटरमण रामकृष्णन ने इस विसंगति की तरफ ध्यान दिलाया कि जो लोग रोगों के उपचार के लिए जीन-संवर्धित दवाइयों का इस्तेमाल कर रहे हैं वही लोग जीएम बीजों के उपयोग के खिलाफ हैं.

सुबह के सत्र के वक्ताओं में शामिल डॉ हेरॉल्ड वरमस, डा. रेंडी शेकमैन, डा. रिचर्ड रॉबर्टस और डा. रामकृष्णन का कहना था कि परंपरागत तरीके की खेती कर के हम देश की बढ़ती हुई आबादी का पेट नहीं भर  सकते हैं, जब तक हम इसका साथ देने के लिए खेती में टेक्नालॉजी (प्रौद्योगिकी) का इस्तेमाल शुरू न कर दें. एनजीओ के भय और इसका समर्थन कर रहे राजनेताओं के डर को वक्ताओं ने अवैज्ञानिक और  बेतुका करार दिया.

भारत को लेकर सबसे तीखा स्वर या यूं कहे कि आरोप भौतिकी विज्ञानी डा. डेविड ग्रॉस का था. उनका कहना था कि भारत को असफलतों से डरना छोड़ना चाहिए, तभी वो कुछ बड़ा कर पाएगा. ये पूछे जाने पर कि क्या विज्ञान के क्षेत्र में होने वाला विकास देश को आर्थिक समृद्धता देने के साथ-साथ हो सकता है?

विज्ञान को बढ़ावा

इसके जवाब में डॉ ग्रॉस ने कहा कि भारत तीन दशक पहले ही चीन से ज्यादा अमीर देश था. उन्होंने साफ कहा कि आर्थिक हालत कैसी भी हो विज्ञान को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. उन्होंने ध्यान दिलाया कि अगर ऐसा नहीं होता है तो, ‘आप सिर्फ सेवा क्षेत्र पर निर्भर अर्थव्यवस्था बनकर रह जायेंगे और विनिर्माण के क्षेत्र में कहीं कोई कोई बढ़त नहीं होगी.’ उनके अनुसार, भारत में किसी भी विकसित देश की तुलना में प्रति दस हजार आबादी पर तकनीक के जानकार लोगों या वैज्ञानिकों की संख्या बहुत कम है.

वाइब्रेंट गुजरात का इस बार का आयोजन वैज्ञानिकों और उद्योग जगत को आपसी बातचीत का मंच मुहैया कराने के लिहाज से अनोखा कहा जायेगा. पूरे गुजरात के अलग-अलग कॉलेजों से आये छात्रों ने दुनिया के शीर्ष वैज्ञानिकों से बातचीत की. साथ ही उद्योगपतियों को नोबेल पुरस्कार विजेताओं से बात करने और विज्ञान की अलग-अलग शाखाओं को बढ़ावा देने के लिए विश्व स्तर की संस्था बनाने की दिशा में सोचने का मौका दिया.

2017 के वाइब्रेंट गुजरात के ‘नोबेल डायलॉग’ का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष ये निकला कि इसमें शामिल हुए सभी वैज्ञानिकों ने ‘जीएम फूड’ (आनुवांशिक रुप से संवर्धित आहार) का एक सुर में समर्थन किया. इसे इस आयोजन का सबसे अहम सियासी उपलब्धि माना जायेगा. अगर हम ध्यान दें तो पाएंगे कि संघ-परिवार के एक धड़ा और विपक्षी नेताओं का एक समूह को जीएम फूड का विरोध कर रहा है. इसे पीएम मोदी की महत्वकांक्षी दूसरे हरित क्रांति की योजना के लिए एक बाधा माना जा रहा है.

तकनीक को अपनाया जाए

वाइब्रेंट गुजरात ने हर बात में लकीर का फकीर रहने की समझ पर सवाल उठाये हैं और संदेश दिया है कि सिर्फ खेती-किसानी ही नहीं, जीवन की तमाम बातों में विज्ञान और टेक्नॉलॉजी को अपनाया जाना चाहिए.

2017 का वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन हर लिहाज से भरपूर कामयाब कहा जायेगा. प्रधानमंत्री के रुप में मोदी के कंधे पर अब बड़ी सियासी जिम्मेवारी है लेकिन वाइब्रेंट गुजरात के लिए वे दो दिनों तक गांधीनगर में ठहरे. इससे जाहिर होता है कि वाइब्रेंट गुजरात के इस कार्यक्रम को वे कितना अधिक महत्व देते हैं.

मोदी ने साल 2003 में वाइब्रेंट गुजरात की शुरुआत की और तभी से उनके इस आयोजन को शक-संदेह की नजर से देखा जाता रहा और इसके नाकाम होने की आशंका जतायी जाती रही. लेकिन मोदी ने अपने दिल से आती आवाज को सुना और आयोजन को सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

आज की तारीख में वाइब्रेट गुजरात उद्योग-जगत, विज्ञान और समाज के बीच संवाद का एक अंतर्राष्ट्रीय मंच बन चला है और इस मंच के सहारे मोदी ने अगल-अलग रंगों के सियासी और सामाजिक संदेश दिए हैं. ‘जय जय गर्वी गुजरात’ की धुन पर डेस्क पर थिरकती उनकी अंगुलियां इस बात का संकेत थी वे न सिर्फ इस आयोजन से खुश हैं बल्कि उनके मन में इसे लेकर एक संतोष और इत्मीनान के भी भाव हैं.

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