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मोदी विरोध की इमारत कैसे बनेगी जब विपक्ष की जमीन ही खिसक गई है

मोदी विरोधी राजनीति की सियासत करने वाले दलों के हालात तो यही कहानी कहती है

Amitesh Amitesh Updated On: May 12, 2017 01:51 PM IST

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मोदी विरोध की इमारत कैसे बनेगी जब विपक्ष की जमीन ही खिसक गई है

फिलहाल देश की राजनीति में समर्थन और विरोध के एकमात्र केंद्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नजर आते हैं. विपक्ष अक्सर मोदी विरोधी मुहिम और उन्हें घेरने के तरीकों को लेकर कोशिश करता रहता है. कभी चर्चा इस बात की होती है कि कैसे राष्ट्रपति चुनाव में एक साझा उम्मीदवार के जरिए मोदी को मात दी जाए तो कभी बहस इस बात पर होती है कि 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए कैसी चक्रव्यूह की रचना की जाए जिसमें मोदी को घेरा जा सके.

लेकिन, मोदी विरोधी राजनीति को केंद्र में रखकर सियासत करने वाले सभी सियासी दलों के हालात को देखकर एक बार कोई भी सोचने पर मजबूर हो जाता है. जब तक विरोध के लिए जमीन बनाने की तैयारी होती है, इन दलों की खुद की जमीन खसकने लगती है.

'महासमस्या' से निकलें तब तो हो महागठबंधन

सत्ता के गलियारों में चर्चा महागठबंधन की होती है. कैसे मोदी के खिलाफ बिहार की तर्ज पर यूपी के भीतर भी दो धुर-विरोधी एसपी-बीएसपी एक हो जाएं, लेकिन फिलहाल इन दोनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी ही पार्टी के भीतरी संकट से उबर कर एक होने की है.

मायावती की पार्टी में ताजा बवाल इस बात का ही प्रमाण है. लगभग 35 सालों से पार्टी से जुड़े रहने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी को बीएसपी से बाहर का रास्ता दिखा दिया तो सिद्दीकी ने ऑडियो टेप की ऐसी बरसात कर दी जिसने पूरी पार्टी को झकझोर कर रख दिया है.

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नसीमुद्दीन सिद्दीकी के खुलासे ने बीएसपी के भीतर के उस संकट को सामने लाकर रख दिया है, जो अबतक बाहर-बाहर ही दिख रहा था. लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव में मायावती के मुंह की खाने के बाद से ही पार्टी का संकट खुलकर सामने आ गया है. पैसों की लेन-देन की बात हो या फिर दूसरे मुद्दे बीएसपी इस वक्त सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रही है.

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जो है हाल तेरा, वही हाल मेरा

बात अगर सामजवादी पार्टी की करें तो अखिलेश यादव के नेतृत्व में 5 साल तक सत्ता में रहने के बाद भी पार्टी जनता के मन में वो छाप छोड़ने में सफल नहीं हो पाई, जिसकी उम्मीद की जा रही थी. युवा नेतृत्व के बावजूद पार्टी और परिवार के बीच मचे घमासान में अखिलेश उलझ कर रह गए.

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लगता है कि हार के बावजूद समाजवादी पार्टी ने सबक नहीं लिया है. शिवपाल यादव के अलग पार्टी बनाने के एलान के बाद एसपी के भीतर का संकट एक बार फिर से सामने आ गया है.

ऐसी सूरत में एसपी और बीएसपी के साथ आने और बीजेपी को चुनौती देने की बात महज चर्चा बनकर रह जाती है.

ऑरिजिनल महागठबंधन में भी सब ठीक नहीं

बात अगर बिहार की करें तो वहां भी हालात कुछ अलग नहीं हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी छवि के सहारे सभी गैर-बीजेपी दलों को साधने की कोशिश में लगे रहते हैं. लेकिन, नीतीश के साथी और 'बड़े भाई' लालू प्रसाद यादव इस वक्त एक-के-बाद एक मुश्किलों से गुजर रहे हैं जिसने महागठबंधन के भीतर उनकी स्थिति कमजोर बना दी है.

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कभी मिट्टी घोटाला, तो कभी चारा घोटाला तो कभी जेल में बंद शहाबुद्दीन के साथ लालू की बातचीत लीक होने के मामले ने लालू और उनके परिवार को मुश्किलों में डाल दिया है. ऐसी सूरत में मोदी विरोधी मुहिम का दंभ भरने वाले आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव के लिए अब मोदी विरोधी मुहिम को हवा दे पाना मुश्किल ही लग रहा है.

Nitish Kumar

दिल्ली में भी यही हाल

कुछ ऐसा ही हाल आम आदमी पार्टी का है. आप के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध का झंडा लगातार उठाते रहे हैं. केजरीवाल मोदी विरोधी मुहिम के केंद्र में खुद को स्थापित करने की कोशिश में भी लगे रहते हैं.

केजरीवाल अपने-आप को एक विकल्प के तौर स्थापित करने का सपना भी देखने लगे थे, लेकिन, पंजाब और गोवा की हार और एमसीडी की पराजय ने इस पूरी मुहिम की हवा निकाल दी. अब रही सही कसर कपिल मिश्रा और दूसरे भीतरघातों ने पूरी कर दी है.

कभी कुमार विश्वास तो कभी कपिल मिश्रा के तेवर से केजरीवाल असमंजस में हैं. आप के सूत्रों के मुताबिक, फिलहाल एमसीडी चुनाव में हार के बाद केजरीवाल की कोशिश मोदी पर हमले के बजाए अपने काम पर फोकस करने पर है. लेकिन, आप के भीतर की कश्मकश ने केजरीवाल और उनकी पार्टी को परेशान कर दिया है.

ऐसे में अब विरोधी खेमे के भीतर बेचैनी इस बात को लेकर हो रही है कि मोदी को घेरा कैसे जाए. क्योंकि विपक्ष बिखरा दिख रहा है और मोदी अपनी सरकार के तीन साल पूरा होने के मौके पर ‘मोदी फेस्टिवल’ मनाने की तैयारी में हैं.

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